• search
दिल्ली न्यूज़ के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  

दिल्ली की एक मैथ्स टीचर की आपबीती, पिता को हुआ कोरोना तो क्या-कुछ झेलना पड़ा

By नीता बत्रा, अध्यापिका, दिल्ली
|

दिल्ली की एक मैथ्स टीचर की आपबीती, पिता को हुआ कोरोना तो क्या-कुछ झेलना पड़ा

दिल्ली: 10 दिन में तैयार हुई दुनिया की सबसे बड़ी Covid-19 केयर फैसिलिटी के बारे में सबकुछ जानिए

दिसंबर 2019 में हम लोग सब आपस में बातचीत कर रहे थे कि चीन के लोग कोरोना नाम के एक वायरस केआतंक से बहुत परेशान हैं। हम सब इस बात से अनजान थे कि यह नया मेहमान एक दिन हम सबकी जिंदगी में भी प्रवेश करेगा और भयंकर आतंक मचा देगा। गणित अध्यापिका होते हुए मैंने लॉकडाउन पीरियड में गणित पढ़ने पढ़ाने को लेकर विभिन्न परीचर्चाओं में प्रस्तुति की तथा प्रतिभागी भी बनी रही। इन सबके बीच अचानक से 18 मई को मेरे घर से फोन आया और पता चला कि मेरे पिताजी को बुखार आ गया है। पहले तो बुखार शब्द सुनते ही सर चकरा गया। 20 मई तक पापा का बुखार 99 डिग्री से 101 डिग्री तक ही घूमता रहा और सांस लेने में भी समस्या आने लगी अब हमारे हाथ पांव फूलना शुरू हो गए अब कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए? इतने सारे वेबीनार जो इतनी शिद्दत से किए थे जिसमें आईआईटी जैसे संस्थानों के वेबिनार भी शामिल थे निरर्थक नजर आ रहे थे।

पतंजलि का यू-टर्न, कहा- हमने कोरोना वायरस की दवा बनाने की बात कभी नहीं कही

टेस्ट से लेकर एडमिशन तक आईं कितनी मुसीबतें

टेस्ट से लेकर एडमिशन तक आईं कितनी मुसीबतें

पापा का कोरोना टेस्ट करवाने की कवायद हमने शुरू कर दी। करोना टेस्ट के लिए लैब में फोन करना शुरू किया तो पता चला कि सबसे पहले डॉक्टर की प्रिसक्रिप्शन जिसपर उनका एम् आर सी नंबर हो लानी होगी । अस्पताल से टेस्ट लिखवाया। हमने घर आकर संक्रमण से बचने के सारे उपाय करते हुए, आते ही नहाकर कपड़े गर्म पानी में सर्फ डालकर प्लास्टिक की बाल्टी में डाल दिए, जो मास्क लगाया हुआ था उसे भी फेंक दिया, हाथों के ग्लव्स भी फेंक दिए, अब लैब में फोन करके उन्हें डॉक्टर का पर्चा और आधार कार्ड दोनों कागज व्हाट्सएप कर दिए। झटका हमें तब लगा जब लैब वालों ने कहा कि यह प्रिस्क्रिप्शन नहीं माना जाएगा क्योंकि इस पर अस्पताल की स्टाम्प नहीं है। हमें 23 तारीख का दिन स्टाम्प को लगवाने में लग गया । 24 तारीख को टेस्ट के लिए सैंपल लिया गया और 25 को रिपोर्ट आई । उम्मीद के अनुसार रिपोर्ट में कोरोना संक्रमण की पुष्टि की गई । टेस्ट कराने की जंग जीतने के बाद अब अगली जंग थी अस्पताल में भर्ती करवाना । पापा एक सेमी गवर्नमेंट संस्थान से रिटायर्ड कर्मचारी हैं । प्राइवेट अस्पतालों ने पैनल पर इलाज करने से इंकार कर दिया । कोई अस्पताल पांच लाख, कोई आठ लाख तथा कोई दस लाख की मांग कर रहा था । इसके साथ ही कतार में भी लगने को कह रहे थे । प्राइवेट अस्पतालों की इस मनमर्जी के बाद दिल्ली के सरकारी अस्पताल की तरफ मुंह किया।

अस्पताल में भर्ती मरीज की मनोदशा

अस्पताल में भर्ती मरीज की मनोदशा

अब अस्पताल में यदि आप कोविड-19 की रिपोर्ट के साथ जा रहे हैं तो आपको लक्षणों के आधार पर दाखिला दिया जाता है यदि आपको ऑक्सीजन या वेंटीलेटर की आवश्यकता नहीं है तो आपको क्वॉरेंटाइन सेंटर भेजा जाता है और यदि लक्षण और भी हल्के हैं तो अस्पताल वाले आपको अपने घर पर ही क्वारंटाइन होने की सलाह देते हैं। घर पर क्वारंटाइन होने के लिए बीमार व्यक्ति के लिए एक कमरा तथा एक अलग से टॉयलेट होना आवश्यक है । अब अस्पताल में पापा का दाखिला 25 मई को करवा दिया गया। अब एक अलग ही लर्निंग फेस की शुरुआत हुई । पापा को ऑक्सीजन के साथ सामान्य वार्ड में रखा गया । यहाँ उनके साथ 5 मरीज और भी थे । शुरु शुरु में तो इन्हें बहुत अजीब लगा ।ऐसा लगना स्वाभाविक भी था क्योंकि कोई बहुत जोर-जोर से खांस रहा था, कोई ऑक्सीजन सप्लाई पर था, किसी को सांस लेने में कठिनाई होने के कारण बेचैनी थी। जब कोई व्यक्ति जिसे पता हो कि मैं कोरोना का मरीज हूं और उसके आसपास सारे कोरोना के मरीज हैं तो दिमागी तौर पर बहुत परेशानी होती है।

केवल नेगेटिव मैसेज से बढ़ती है दहशत

केवल नेगेटिव मैसेज से बढ़ती है दहशत

कोरोना का इतना डर सोशल मीडिया मैसेजेस के द्वारा, न्यूज़ चैनल के द्वारा बिठा दिया गया है कि कोरोना को मृत्यु का समानार्थक समझ लिया गया है। सबसे पहले कोरोना को यदि एक प्रकार के बुखार की तरह समझा जाता जिसमें कुछ परेशानियां भी साथ आ जाती हैं जैसे सांस लेने की दिक्कत तो यह रोगी के लिए ज्यादा सुकून भरा होता । ज्यादा परेशानी तब होती है जब सोशल मीडिया पर घूमते घूमते मैसेज किसी बीमार व्यक्ति के पास पहुंचते हैं तब उनकी तबीयत खराब होने के साथ साथ मनोस्थिति भी बिगड़ती है । अब अस्पताल में जाने के बाद यह भी हमें समझना होगा कि डाक्टर तथा नर्सिंग स्टाफ बार-बार नहीं आ पाते हैं। अब जब भी मरीज को सांस लेने में समस्या होती है तो वे घुटा घुटा सा महसूस करते हैं और चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी इन्हें इस स्थिति से कोई बाहर निकाले । ऐसे में यदि हमें यह पता हो कि शुरुआत से ही हमें दिन में तीन बार भांप लेनी है, तीन बार गले को साफ रखने के लिए गरारे करने होंगे, डीप ब्रीथिंग बार-बार करनी होगी तो बहुत मदद मिलती है ।

पड़ोसियों-समाज का व्यवहार भी दुख पहुंचाने वाला

पड़ोसियों-समाज का व्यवहार भी दुख पहुंचाने वाला

यहाँ घर पर मम्मी अकेली थी, वहां अकेलेपन से ज्यादा परेशान कर रहा था समाज वालों का व्यवहार । घर के बाहर लगे लाल रंग की पर्ची ने उस अकेली औरत की जिन्दगी को दूभर बना दिया । कोई उनसे बात करने को तैयार नहीं था । उनको फल सब्जी दूध आदि जरुरी सामान के लिए भी बहुत गिडगिडाना पड़ता, ऐसा लग रहा था जैसे सब अचानक से दुश्मन बन गए थे । एक दिन तो उनका फ़ोन नीचे गिरने की वजह से बिखर गया और मैं उनसे संपर्क नहीं रख पा रही थी । पड़ोसियों को बहुत फ़ोन लगाया कि कोई तो उनकी मदद कर दे परन्तु किसी ने मदद नहीं की। किसी तरह भगवान ने चमत्कार किया और उन्होंने खुद ही प्रयास करके फ़ोन को ठीक किया । घर में लगी लाल पर्ची का विडियो बनकर पूरे एरिया में घूम गया और हमें दिन रात सबके फ़ोन आने लगे, तो इस तरह महसूस हो रहा था कि पता नही मम्मी पापा से कितना बड़ा देश द्रोह हो गया है। मेरे लिए स्थिति जायदा कठिन होती जा रही थी क्योंकि यहाँ पापा को बीमारी से लड़ने की हिम्मत देना, मम्मी को समाज से लड़ने की और खुद को मजबूत बना कर रखना।

डॉक्टर की सलाह पर खुद ही अपना इलाज जरूरी

डॉक्टर की सलाह पर खुद ही अपना इलाज जरूरी

यहाँ अस्पताल में पापा डॉक्टर की सलाह से बहुत असहाय महसूस करने पर ऑक्सीजन लेने लगे । यहां डॉक्टर आपके पास बार बार नहीं आ सकते और दूरी से ही आपसे बात करते हैं और सिर्फ आपके द्वारा बताए गए लक्षणों के आधार पर ही आप का इलाज करते हैं । तो ऐसे में हमें खुद बहुत सी जानकारी और धैर्य की आवश्यकता है । पर बहुत सी जानकारी का मतलब इससे यह कदापि नहीं है कि डॉक्टर से सलाह लिए बिना कुछ भी करना शुरू कर दें जैसे पापा ने ऑक्सीजन सप्लाई ज्यादा ले ली उन्हें लगा कि घबराहट दूर करने के लिए ऑक्सीजन लेने पर आराम मिलेगा और तो ऐसे में उनकी खांसी में बहुत बढ़ोतरी होती जा रही थी । यहां पापा को यह भी लग रहा था कि मुझे मल्टीविटामिन ज्यादा नहीं दिए जा रहे,ग्लूकोज नहीं चढ़ाया जा रहा जबकि डॉक्टर ने बताया कि ग्लूकोस हम ज्यादा नहीं दे सकते जितना खाना मुंह से खाएंगे उतना फायदा जल्दी होगा । दिन में तीन बार भाप लेना, गरारे करना विटामिन सी रेगुलर लेना हमें खुद से सीखना होगा ।

बीमारी से दूरी बनानी है बीमार से नहीं

बीमारी से दूरी बनानी है बीमार से नहीं

पापा को 25 मई से 30 जून तक काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा । बुखार आने तक उन्हें पैरासिटामोल दिया गया । 3 जून से बुखार आना बंद हो गया, ऑक्सीजन सपोर्ट को भी बहुत कम कर दिया और 4 जून से बिल्कुल बंद। यहाँ अपने अनुभव को लिखने का मकसद सिर्फ यही था कि इस महामारी में जब अनिश्चितता का दौर है तो हम ज्यादा से ज्यादा इस बात पर मंथन करें कि इस महामारी से कैसे बचना है ? अगर हो जाए तो कैसे धैर्य के साथ इसका सामना करें। यहाँ हमें सिर्फ बीमारी से दूरी बनानी है बीमार से नहीं और ना ही उसके घरवालों से । बल्कि हम सब एकजुट होकर इस वायरस से लड़ सकते हैं।

ओडिशा में क्वारंटाइन पूरा करने वाले लोगों को सरकार दे रही दो हजार रुपये

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
A math teacher from Delhi told how her father sufferd after tested corona positive
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more