Delhi Water Crisis: क्यों प्यासी है दिल्ली? जानिए जल संकट के ये बड़े कारण
Delhi Water Crisis: भीषण गर्मी झेल रहे दिल्ली पर दोहरी मार पड़ रही है। पहला तो भयंकर गर्मी से जनजीवन पूरी से बेहाल है तो दूसरी तरफ पानी की किल्लत से लोगों को बुरी तरह जूझना पड़ रहा है। एक बाल्टी पानी के लिए लोगों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर राजधानी दिल्ली प्यासी क्यों हैं?
टोक्यो के बाद दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर दिल्ली, जिसकी आबादी 33.8 मिलियन है। एक बार फिर गर्मी के आते ही भयंकर पानी की किल्लत से दो-चार हो रही है। भीषण गर्मी के बीच दिल्ली सरकार ने बढ़ते जल संकट के समाधान के लिए तत्काल हस्तक्षेप के लिए सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया है।

ऐसे में आखिर दिल्ली में पानी की कमी क्यों है और इस समस्या को कैसे ठीक किया जा सकता है। अगर इन सवालों पर गौर करें तो दिल्ली अपनी पेयजल मांग का लगभग 90 प्रतिशत पूरा करने के लिए अपने पड़ोसी राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश पर निर्भर है।
पूरी तरह से बाहरी सोर्स पर निर्भर दिल्ली
दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के अनुसार राजधानी में वाटर सप्लाई चार प्राइमरी सोर्स से होती है, जिसमें 40 प्रतिशत यमुना से, जो हरियाणा के मिलता है। 25 प्रतिशत गंगा से, 22 प्रतिशत भाखड़ा नांगल बांध से और बाकि 13 प्रतिशत रन्नी कुंओं और ट्यूबवेल जैसे भूमिगत स्रोतों से।
इस पानी को 9 वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (डब्ल्यूटीपी) के जरिए पूरे शहर में 15,473 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन नेटवर्क और भूमिगत जल जलाशयों के माध्यम से आपूर्ति की जाती है। डीजेबी के समर बुलेटिन में खुलासा हुआ है कि 21 मई से 31 मई तक दिल्ली का कुल जल उत्पादन 977.79 और 993.76 मिलियन गैलन प्रति दिन (एमजीडी) के बीच उतार-चढ़ाव करता रहा।
हालांकि, यह 1290 एमजीडी या प्रति व्यक्ति 60 गैलन की दैनिक मांग से काफी कम है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के हस्तक्षेप के बावजूद यमुना भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक बनी हुई है, जिसका दिल्ली की स्वच्छ जल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ रहा है।
वहीं पानी का अत्यधिक उपयोग और बर्बादी दिल्ली की वर्तमान स्थिति का एक कारण भी है। एक रिपोर्ट के अनुसार औसत भारतीय अपनी दैनिक आवश्यकता का 30 प्रतिशत पानी बर्बाद कर देता है।
जलसंकट के कई कारक
दिल्ली में बढ़ते जल संकट को बनाए रखने के पीछे कई कारक है, जिसमें भूजल का अत्यधिक दोहन, जल स्रोतों का प्रदूषण, प्रवासी आबादी में इजाफा, जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव, अकुशल जल प्रबंधन प्रथाएं और अंतर-राज्यीय जल विवाद शामिल हैं। मांग-आपूर्ति के अंतर को पाटने के प्रयास में डीजेबी ने पिछले 5 वर्षों में भूजल दोहन में लगातार वृद्धि की है।
रिपोर्ट के अनुसार यह निकासी 2020 में 86 एमजीडी से बढ़कर 2024 में लगभग 135 एमजीडी हो गई। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) ने 1 दिसंबर, 2023 को जारी अपनी 'भारत के गतिशील भूजल संसाधन 2023' रिपोर्ट में खुलासा किया कि दिल्ली के 1,487.61 वर्ग किलोमीटर के लगभग 41.49 प्रतिशत क्षेत्र को भूजल दोहन के उच्च स्तर के कारण "अति-दोहन" माना जाता है। भूजल का यह अधिक दोहन भूजल स्तर में कमी को बढ़ाता है।
इसी के साथ बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने या वर्षा जल संचयन और अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को प्राथमिकता देने में पूरी तरह से विफल है। दिल्ली में जल संकट को बढ़ाने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक, जो विश्व स्तर पर आम है, लेकिन घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में विशेष रूप से तीव्र है वह है बढ़ता तापमान और चिलचिलाती गर्मी की लहरें।
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाली प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से नवीकरणीय जल संसाधनों में 20 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है। वजीराबाद तालाब में यमुना के प्रदूषण के स्तर ने इस मुद्दे को और बढ़ा दिया है। भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार पीने के पानी में अमोनिया की अनुमेय सीमा 0.5 पीपीएम को पार कर यमुना के पानी की गुणवत्ता, प्रवाह और जल धारण क्षमता पर नदी के तल में जमा गाद, रेत, तलछट, खरपतवार और मलबे का और भी असर पड़ता है।
चुनौती को और बढ़ाते हुए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा हरियाणा के साथ जल-बंटवारे का विवाद है। दिल्ली सरकार ने अक्सर हरियाणा सरकार की 1994 के एमओयू में तय की गई सीमा से कम पानी छोड़ने के लिए आलोचना की है। जवाब में हरियाणा ने कहा है कि आंतरिक कुप्रबंधन के कारण दिल्ली में पानी की कमी हो रही है।












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