राजनीति अदालतों पर निर्भर होती चली जा रही है

नई दिल्ली, 29 जून। यूं तो विधायकों का दल बदलना भारत में कोई नई बात नहीं है. बल्कि इस समस्या से निपटने के लिए देश में दल-बदल विरोधी कानून 1985 में ही लाया गया था. उससे भी पहले 1967 में हरियाणा में गया लाल नाम के विधायक ने एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदल कर "आया राम गया राम" के मुहावरे को जन्म दिया था.

रिसर्च संस्था पीआरएस के मुताबिक 1967 से 71 के बीच 142 बार सांसदों ने और 1,969 बार अलग अलग विधान सभाओं में विधायकों ने दल बदले. महज इन चार सालों में 32 सरकारें गिरीं. यानी दल बदल कर विधायिकाओं में संवैधानिक संकट पैदा करने की परिपाटी दशकों पुरानी है.

राजनीतिक उठापठक के मामले अक्सर सुप्रीम कोर्ट पहुंच रहे हैं

लेकिन अब इस तरह की घटनाओं की आवृत्ति बढ़ गई है. मार्च 2020 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरने से ठीक पहले भी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए गए थे. वजह थी कांग्रेस के विधायकों का अपनी ही पार्टी के खिलाफ बागी हो जाना.

(पढ़ें: महाराष्ट्र में कांग्रेस-शिव सेना-एनसीपी के सत्तारूढ़ गठबंधन को झटका)

पार्टी क्यों बदलते हैं विधायक

उससे पहले नवंबर 2019 में कर्नाटक में भी कांग्रेस के विधायकों की ही बगावत के बाद फिर से सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी और बाद में कांग्रेस की सरकार गिर ही गई.

जुलाई 2020 में राजस्थान में भी ऐसी ही उठापटक देखने को मिली, लेकिन कांग्रेस किसी तरह बागी विधायकों को वापस ले आई और राज्य में अपनी सरकार को गिरने से बचा लिया. उस प्रकरण में भी राजस्थान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों को हस्तक्षेप करना पड़ा था.

दल बदलने के बढ़ते मामलों से लोकतंत्र कमजोर हो रहा है

बार बार इस तरह विधायकों का दल बदलना उनका लोभ और पार्टियों में सत्ता का लालच दिखाता है. हालांकि कोई भी विधायक लोभ के आरोप को स्वीकार नहीं करता है. आप अक्सर विधायकों को कहते हुए पाएंगे कि वो अपनी पार्टी का दामन छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल इसलिए हो गए क्योंकि उनके हिसाब से उनकी पुरानी पार्टी अपने लक्ष्यों से भटक गई थी. दोनों पार्टियों की बिलकुल विपरीत विचारधारा की विसंगति पर कोई विधायक प्रकाश नहीं डालता.

(पढ़ें: बिना चुनाव जीते योगी सरकार में मंत्री बने दानिश आजाद कौन हैं)

दल बदल के इस नए दौर के संभवतः यही मायने हैं कि भारत में राजनीति में विचारधारा नेपथ्य में चली गई है. राजनेताओं के लिए पार्टियों के बीच की सीमा लांघना कोई दुविधा का विषय नहीं रह गया है. कोई भी नेता किसी भी दिन किसी भी पार्टी में जा सकता है, कोई भी पार्टी किसी भी दिन किसी भी दूसरी पार्टी के साथ गठबंधन जोड़ सकती है और तोड़ भी सकती है.

लोकतंत्र पर सवाल

विचारधारा की राजनीति के कमजोर होने का समाज पर क्या असर पड़ा है, यह तो राजनीतिशास्त्रियों और सामजशास्त्रियों के लिए अध्ययन का विषय है, लेकिन लोकतंत्र के लिए इसके मायने स्पष्ट हैं. याद कीजिए आपने पिछली बार कब मतदान किया था. अपना वोट किसको देना है ये किसी न किसी आधार पर तो तय किया होगा.

विधायकों का दल बदलना मतदाता के साथ ठगी है

या आपको वो उम्मीदवार पसंद होगा, या उसकी पार्टी पसंद होगी. चुनाव जीतने के बाद अगर उम्मीदवार की सोच में बदलाव आ जाए और वो उन सब बातों से मुकर जाए जिन से संतुष्ट हो कर आपने उसे वोट दिया था तो आपको कैसा लगेगा. विशेष रूप से चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलना एक तरह की ठगी है, मतदाता के साथ धोखाधड़ी है.

(पढ़ें: बीजेपी के खिलाफ करियर शुरू कर बीजेपी में शामिल हुए हार्दिक पटेल)

इसी पर लगाम लगाने के लिए दल बदल विरोधी कानून लाया गया था. लेकिन स्पष्ट है कि वह कानून बुरी तरह से असफल हो चुका है. ऐसे में कैसे यह परिपाटी रुकेगी और कैसे चुनावी लोकतंत्र की शुचिता बढ़ेगी, इस सवाल का जवाब खोजने की जरूरत है.

Source: DW

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+