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नर्सों का इम्तिहान है गर्मियों में कोविड की बढ़ी संख्या

जर्मन स्वास्थ्यकर्मी बहुत ज्यादा परेशान हैं

नई दिल्ली, 18 जुलाई। जॉर्ज गोउट्री तक फोन के जरिये पहुंच पाना इन दिनों आसान नहीं हैं. हालांकि रात की दो शिफ्टों और तड़के सुबह वाली एक शिफ्ट करने के बीच ही 21 साल की नर्स ने फोन पर बात करने के लिए कुछ मिनट निकाले तो सबसे पहले हंसते हुए यही पूछा आज क्या दिन है? रविवार है ना? पिछले एक महीने से गोउट्री बर्लिन के चैरिटे हॉस्पिटल की मां और बच्चा विभाग में काम कर रहे हैं. 3000 बिस्तरों वाला यह यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल यूरोप में सबसे बड़ा है.

नर्स बनने के लिए तीन साल की ट्रेनिंग गोउट्री ने कोविड की महामारी के दौर के मध्य में शुरू की. उस दौर में वो और उनके जैसे दूसरे छात्रों ने वही चुनौतियां झेलीं जो देश के ज्यादातर क्लिनिकों के सामने थीं. इस दौरान पूरा वार्ड बंद कर दिया गया था, सारे काम बंद थे और स्टाफ को कोविड-19 के मरीजों की देखरेख के लिए कहीं और भेज दिया गया.

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वर्तमान में जो काम गोउट्री का है वहां भी हालात वैसे ही बनते जा रहे हैं. गोउट्री ने बताया, "मेरा वार्ड अब बंद नहीं किया जा सकता. बच्चे जब तैयार हो जाते हैं तो यहां आते हैं और उन्हें आप दोबारा उसी कतार में नहीं डाल सकते." फिलहाल सारे मरीजों की देखभाल इस तरह की जा रही है जैसे कि वो कोविड-19 से संक्रमित हों, उन्हें तब तक आइसोलेशन में रखा जा रहा है जब तक कि पीसीआर टेस्ट में निगेटिव ना घोषित कर दिया जाये.

बहुत से मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने के बाद संक्रमण का पता चल रहा है

घटती पाबंदियों के बीच आया ओमिक्रॉन का नया वेरिएंट

पिछले दो सालों से कोविड-19 का संक्रमण गर्मियों के दौरान घट जा रहा था, लोग इस दौरान ज्यादा समय घर के बाहर गुजारते हैं. इसका मतलब है कि स्वास्थकर्मियों को गर्म महीनों में थोड़ी राहत मिलती थी.

इस साल हालात दूसरे हैं. गर्मियों में भी संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं और मार्बुर्गर बुंड डॉक्टर्स एसोसिएशन के मुताबिक स्वास्थ्य सेवायें अपनी सीमाओं तक पहुंच रही हैं. जून की शुरुआत में सात दिनों का औसत दर पूरे साल के दौरान सबसे कम था लेकिन उसके बाद से इसमें बहुत तेजी आ गई है.

इसके पीछे एक कारण तो है वायरस का सबवेरिएंट बीए. 5. यह पिछले वेरिएंटों के मुकाबले ज्यादा संक्रामक है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह गर्मियों में भी तेजी से फैल सकता है. जिन लोगों ने वैक्सीन ले रखी है या फिर ओमिक्रॉम वेरिएंट से संक्रमित हुए हैं वो लोग सुरक्षित हैं. फिलहाल सामने आ रहे कोविड के मामलों में दो तिहाई इसी बीए.5 सबवेरिएंट की वजह से हैं.

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संक्रमण को फैलने में कम हुई पाबंदियों से भी मदद मिल रही है. जर्मनी में लोगों के लिए ज्यादातर सार्वजनिक जगहों पर मास्क पहनने की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है. बहुत से लोग अब यात्राएं भी कर रहे हैं और भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं.

खर्च बढ़ने के कारण मुफ्त में होने वाली रैपिड टेस्ट बंद कर दी गई है. स्वास्थ्य मंत्री कार्ल लाउटरबाख ने हाल ही में बताया कि इस सेवा पर हर महीने एक अरब यूरो का खर्च आ रहा था. कुछ मामलों को छोड़ कर अब लोगों को यह टेस्ट कराने के लिए 3 यूरो देने पड़ रहे हैं. क्या इसी वजह से नियमित परीक्षणों में कमी आई है यह देखना बाकी है.

नर्सों के संक्रमित होने से कई अस्पतालों को अपनी सेवाएं बंद करनी पड़ रही हैं

अस्पताल कर्मचारियों में संक्रमण

नर्सों के लिए एक बार फिर वही कहानी दोहराई जा रही है. कोविड-19 की संख्या बढ़ने के साथ ही पतझड़ और सर्दियों के मौसम को लेकर चिंता बढ़ रही है. पिछले अनुभव दिखाते हैं कि संक्रमण कई गुना बढ़ जायेंगे. उत्तरी राज्य श्लेषविग होल्स्टाइन के सबसे बड़े क्लिनिकों में से एक ने जुलाई की शुरुआत में अपने दो सेंटर बंद कर दिये क्योंकि बहुत सारे स्टाफ कोविड की चपेट में आ गये.

हैंबर्ग के अगाप्लेसन हॉस्पिटल की इंटेंसिव केयर यूनिट ने बताया, "इसने हमारे कर्मचारियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, हमारे कर्मचारियों की बीमारी सामान्य की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ गई है और इसके लिए कुछ हद तक कोरोना वायरस जिम्मेदार है." दूसरे अस्पतालों की तरह यहां भी इंटेंसिव केयर यूनिट के साथ ही एक कोविड-19 वार्ड भी बनाया गया है. अस्पताल के प्रेस ऑफिस ने डीडब्ल्यू को लिख कर बताया है, "हमने हालात को देखते हुए पहले ही बेड रिजर्व कर दिये हैं और वो भी गर्मियों के बीच में. जाहिर है कि हमें आने वाले पतझड़ और सर्दियों के मौसम को लेकर चिंता हो रही है."

ज्यादा मरीज और ज्यादा जिम्मेदारी

हालांकि कोविड-19 ही परेशानी के लिए अकेले जिम्मेदार नहीं है. महामारी ने केयर सेक्टर में काम की खराब स्थिति को सामने ला दिया है लेकिन यह समस्या पुरानी है. द वॉक ऑप केयर नाम की पहले इस समस्या से को दूर करने के लिए 2016 से ही काम कर रही है और जॉर्ज गोउट्री भी इस पहले से जुड़े हुए हैं. इस संगठन के बैनर तले हर उम्र के नर्स और इस तरह के दूसरे लोग जुड़ रहे हैं. यह इन कर्मचारियों के लिए बेहतर आर्थिक और संरचनात्मक स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी नीतियों की मांग कर रहे हैं. गोउट्री बताते हैं, "जर्मनी में प्रति नर्स 13 मरीज हैं जबकि हॉलैंड में उदाहरण के लिए महज पांच मरीज. एक साथ कैसे में 13 मरीजों की जिम्मेदारी उठाऊंगा और उन्हें बेहतरीन सेवा दे पाउंगा."

गाउट्री जोर दे कर कहते हैं नर्स कई सालों से ओपीडी और अस्पतालों में अपनी सीमा से परे जा कर काम कर रहे हैं. महिलाओं के लिए यह स्थिति और ज्यादा बुरी है क्योंकि जर्मनी में नर्सिंग के काम में दो तिहाई से ज्यादा कर्मचारी महिला हैं.

जिन लोगों पर ज्यादा बोझ है उन्हें तो आराम करने का भी वक्त नहीं मिलता क्योंकि एक तरफ उन्हें अस्पताल में लोगों का ख्याल रखना है जिसके लिए उन्हें पैसे मिलते हैं. गोउट्री का कहना है कि दूसरी तरफ घर पर बच्चे और दूसरे लोग हैं जो उन्हीं पर आश्रित हैं और भले ही उन्हें इनका ख्याल रखने के पैसे ना मिलें लेकिन देखभाल तो उनकी भी करनी है.

गंभीर रूप से बीमार ओर कृत्रिम श्वांस पर जिंदा आधे मरीजों की जान नहीं बच पा रही है

कम वेतन और ज्यादा तनाव

जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट के मुताबिक देश में 2035 तक 307,000 नर्सिंग स्टाफ की कमी होगी. बीते कई सालों से यह समस्या बढ़ती जा रही है. इसकी वजह से लोग शारीरिक और मानसिक तनाव में हैं. कर्मचारियों की कमी की वजह से अकसर इन लोगों को ओवरटाइम करना होता है और इसके लिए उन्हें पर्याप्त पैसे भी नहीं मिलते.

अस्पताल कर्मचारियों को कैसा महसूस होता है इसका अंदाजा "श्वार्त्सबुख क्रांकेनहाउस," (अस्पताल की काली किताब) नाम की वेबसाइट पर अज्ञात कर्मचारियों के लिखे कमेंट से होता है.

"मेरे पास किसी मरते हुए का भी ख्याल रखने के लिए समय नहीं है"

"मुझे अपनी नौकरी से प्यार है और मुझे इस पर बहुत गर्व है लेकिन मैं यहां जो देखभाल की जा रही है उसे देख कर मैं सदमे में हूं, हालत इतनी खराब है कि मैं दो साल से ज्यादा झेल नहीं सका."

"जब मैं वार्ड में रो रहा था तो वहां के दूसरे नर्सों के पास मुझे संभालने के लिए एक पल का भी समय नहीं था."

बर्नआउट नहीं कूलआउट

इस तरह के बयान मनोवैज्ञानिक तनाव का स्तर दिखाते हैं. नर्सों के बीच बर्नआउट की बहुत चर्चा होती है लेकिन इसके अलावा कूलआउट भी अब एक नया टर्म है जिसका इस्तेमाल जर्मनी में बढ़ता जा रहा है.

गोउट्री ने बताया, "यह वो स्थिती है जब किसी बात की परवाह नहीं करते, कोई भी चीज आपके दिल को नहीं छूती. यह अत्यधिक बोझ की अवस्था है. आप सिर्फ आपातकाल में ही लोगों का ख्याल रखते हैं." गोउट्री का यह भी कहना है कि यह कर्मचारियों को मरीजों के प्रति लापरवाही और हिंसा की ओर भी ले जाती है.

जून 2021 में नेताओं ने सुधार का वादा किया और नर्सिंग सुधार को इस साल से लागू किया गया. इसका लक्ष्य कुशल कामगारों की कमी और नौकरकी के तनाव को दूर करना है. इसके लिए उनके वेतन में बढ़ोत्तरी और नर्सिंग स्टाफ को काम के दौरान ज्यादा फैसले लेने की जिम्मेदारी दी जा रही है.

गोउट्री अब भी करियर में बदलाव कर एक बिल्कुल नई चीज शुरू करने के बारे में सोच रहे हैं, हालांकि इससे उन्हें तकलीफ बहुत है. उन्होंने कहा, "अगर आप खुद को एक देखभाल करने वाले के रूप में देखते हैं तो फिर नर्सिंग में जाने का मतलब बनता है, लेकिन किस कीमत पर?"

Source: DW

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