कश्मीर में सिनेमा तो खुल गए पर देखने नहीं आ रहे लोग

भारतीय कश्मीर में सिनेमा

नई दिल्ली, 03 अक्टूबर। 14 साल बाद भारतीय कश्मीर में सिनेमा हॉल खुले हैं. श्रीनगर में खुले एक मल्टीप्लेक्स में कई स्क्रीन हैं जहां अलग-अलग फिल्में दिखाई जा रही हैं. इसी हफ्ते वहां ताजातरीन फिल्म 'विक्रम वेधा' रिलीज हुई है. 520 सीटों वाले तीन सिनेमाघरों की तीन स्क्रीनों पर यह फिल्म दिखाई जा रही है.

श्रीनगर के सर्वोच्च सुरक्षा वाले इलाके में स्थित इस मल्टीप्लेक्स को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है. पास में ही भारत सेना का मुख्यालय भी है, लिहाजा सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है. इसके बावजूद 'विक्रम वेधा' को देखने के लिए शनिवार की सुबह करीब एक दर्जन लोग ही लाइन में लगे थे.

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तीन साल पहले भारत सरकार ने जब जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा 370 खत्म की, तो इलाके में बीते कुछ सालों में तनाव में जो थोड़ी बहुत कमी आई थी, वह भी जाती रही. सिनेमा घर तो उससे दस साल पहले ही बंद हो चुके थे, 370 खत्म होते ही इंटरनेट और फोन भी बंद कर दिए गए और डेढ़ साल तक बंद रहे. लोग महीनों तक कर्फ्यू में रहे और बाजार व उद्योग-धंधे ठप्प रहे.

लोग कहां हैं?

ऐसे हालात से गुजरे कश्मीर में सिनेमाघरों के खुलने को भारत सरकार स्थिति के सामान्य होने के प्रतीक के तौर पर दिखाती प्रतीत होती है. लेकिन स्थानीय लोगों की राय इस बारे में बंटी हुई है. फिल्म देखने आए ज्यादातर लोग टिप्पणी नहीं करना चाहते. एक दर्शक फहीम बात करने को राजी होते हैं लेकिन वह अपना पूरा नाम नहीं बताते. वह कहते हैं, "सिनेमा के बारे में अलग-अलग राय है लेकिन मेरे हिसाब से यह एक अच्छी बात है. यह तरक्की का प्रतीक है."

'विक्रम वेधा' के दोपहर और शाम के शो भी करीब-करीब खाली थे. बुकमाईशो डॉट कॉम के मुताबिक दस प्रतिशत से भी कम टिकट बिके.

यह मल्टीप्लेक्स एक स्थानीय उद्योगपति ने देश की प्रमुख मल्टीप्लेक्स चेन आईनॉक्स के साथ मिलकर खोला है. 20 सितंबर को राज्यपाल मनोज सिन्हा ने इसका उद्घाटन किया था. स्थानीय लोगों में से कुछ को उम्मीत है कि 1989 के पहले जैसे हालात होंगे जब राज्य में सिनेमा घर थे और खूब चलते थे.

जब खुला था श्रीनगर

1989 में कश्मीर में हिंसक बगावत भड़की थी जिसे कुचलने में भारत सरकार ने कोई नरमी नहीं बरती. उससे पहले श्रीनगर में आठ सिनेमाघर थे जो आतंकवाद की भेंट चढ़ गए. आतंकवादियों ने सिनेमाघरों को भारत का सांस्कृतिक आक्रमण बताया और इस्लाम-विरोधी बताते हुए बंद करवा दिया.

सिनेमाघरों में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी है

1990 के दशक में भारतीय सेना ने ज्यादातर सिनेमाघरों को सुरक्षा बलों के कैंप, हिरासत केंद्र या पूछताछ केंद्रों में तब्दील कर दिया. लिहाजा, जहां जाना लोगों के लिए खास मौका हुआ करता था, वही जगह डर का प्रतीक बन गई.

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1999 में भारतीय सरकार ने फिर कोशिश की और आर्थिक मदद दी ताकि तीन स्थानीय सिनेमाघरों को खोला जा सके. उस कोशिश का मकसद भी हालात को सामान्य बनाना या दिखाना था. लेकिन उन सिनेमाघरों के खुलने के कुछ ही समय बाद एक के सामने बम धमाका हुआ. उस धमाके में एक व्यक्ति मारा गया और कई घायल हो गए.

14 साल बाद वापसी

उस घटना के बाद वह सिनेमाघर बंद हो गया और डरे हुए लोगों ने आमतौर पर बाकियों में भी जाना छोड़ दिया. लिहाजा एक और सिनेमाघर सालभर में बंद हो गया. श्रीनगर के सबसे पुराने सिनेमाघरों में से एक नीलम ने लंबा संघर्ष किया. वह 2008 तक भी चलता रहा लेकिन उसके बाद उसने भी दम तोड़ दिया.

अब 14 साल बाद राज्य में सिनेमा लौटा है. अधिकारियों का कहना है कि इलाके के हर जिले में एक सिनेमाघर खोला जाएगा. इसकी शुरुआत हो चुकी है. राज्यपाल मनोज सिन्हा ने पुलवामा और शोपियां में भी सिनेमाघरों का उद्घाटन किया है. ये जिले आतंकवाद के सक्रिय गढ़ों में गिने जाते हैं.

सिन्हा ने पत्रकारों से कहा, "सरकार जम्मू और कश्मीर के बारे में अवधारणा बदलने को प्रतिबद्ध है. हम जानते हैं कि लोग मनोरंजन चाहते हैं और वे फिल्में देखना चाहते हैं. हालांकि सिनेमाघरों के बाहर खड़े इक्का-दुक्का लोग और अंदर खाली पड़ी कुर्सियां फिलहाल तो सिन्हा की बात से मेल नहीं खातीं.

वीके/सीके (एपी)

Source: DW

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