Bastar Dussehra: 600 साल से बस्तर दशहरा में क्यों दी जाती है 12 बकरों की बलि? ये है इसके पीछे का कारण
Bastar Dussehra 2023: ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म निशा जात्रा पूजा विधान गुरूवार की देर रात संपन्न हुआ। जगदलपुर शहर के अनुपमा चौक स्थित निशा जात्रा गुड़ी में पूजा-अनुष्ठान के साथ ये विधान संपन्न हुआ, जो ऐतिहासिक बस्तर दशहरा का आखिरी पूजा विधान माना जाता है।
पूजा-अनुष्ठान के बाद बस्तर सहित देश की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए देवी को मछली, कुम्हड़ा व बकरों की बलि दी गई। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव, राजपुरोहित, राजगुरु, मावली व मंदिर के पुजारी भोग व पूजा सामग्री के साथ निशा जात्रा गुड़ी पहुंचे।

इस दौरान रात करीब 12 बजे मंदिर के पुजारियों ने भैरमदेव और खेमेश्वरी देवी की पूजा की। पूजा विधान में ही 11 बकरों की बलि दी गई। भैरमदेव की पूजा कर हवन स्थल पर 12 बकरों की बलि भी दी गई।
इसके बाद मावली मंदिर में दो, सिंहड्योढ़ी व काली मंदिर में एक-एक बकरे की बलि दी गई। जबकि दंतेश्वरी मंदिर में एक काले कबूतर व सात मोंगरी मछलियों व श्रीराम मंदिर में उड़द दाल व रखिया कुम्हड़ा की बलि दी गई।
इससे पहले 12 गांव के 12 ग्रामीण सालों से चली आ रही परंपरा के अनुसार इस विधान को पूरा करने के लिए 12 कांवड में 24 मटकों में भोग प्रसाद लेकर निशा जात्रा भवन में पहुंचे थे। इस विधान में शामिल कविआसना निवासी बस्तर राजपरिवार के पुरोहित सुकनाथ ने बताया कि उनके साथ मावली मंदिर के पुजारी भी ग्रामीणों के साथ निशा जात्रा गुड़ी पहुंचे थे।
यहां दंतेश्वरी माईं की पूजा के बाद 24 मटकों में रखे गए प्रसाद को 12 मटकों में भरा गया और खाली बचे हुए 12 मटकों को वहीं फोड दिया गया। राजपुरोहित ने बताया कि ग्रामीण जो भोग प्रसाद लेकर निशा जात्रा जाते हैं, उनमें चावल, दाल और सब्जी होते हैं।
संवाद सूत्र: ऋषि भटनागर, जगदलपुर/छत्तीसगढ़












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