Ambikapur : बारिश ने बढ़ाई तिब्बती किसानों की चिंता, टाउ की खेती हो रही प्रभावित, 60 साल पहले शुरू हुई थी खेती
छत्तीसगढ़ के शिमला के प्रसिद्ध सरगुजा जिले के मैनपाट में तिब्बती शरणार्थी टाउ की खेती करते हैं। मैनपाट की मौसम और भूमि दोनों ही टाउ की फसल के लिए उपयोगी है। लेकिन इस साल बारिश के चलते टाउ की पैदावार भगवान भरोसे है। यहां लगभग 600 किसान अपने खेतों में टाऊ की खेती करते हैं। लेकिन बारिश से टाऊ की बुवाई को पिछड़ चुकी है। वहीं अब तक बारिश का सिलसिला जारी है।

तिब्बती शरणार्थियों ने शुरू की टाउ की खेती
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में 50 से 60 साल पहले टाऊ की खेती को कोई नहीं जानता था। स्थानीय व कृषि अधिकारियों के अनुसार जब तिब्बती शरणार्थियों को मैनपाट में बसाया गया। तब टाउ के बीजों को अपने साथ विरासत के रूप में लेकर छत्तीसगढ़ पहुंचे थे। तिब्बत की तरह मैनपाट का वातावरण और जलवायु होने के कारण टाऊ की पैदावार शुरू की, तो यहाँ भी इसकी पैदावार शुरू हो गई। अब तिब्बत्तीयों से सीखकर यहां के स्थानीय लोगों ने भी इसकी खेती शुरू कर दी है।

सरगुजा संभाग के 3000 हेक्टेयर में होती है टाउ की खेती
छत्तीसगढ़ में टाऊ की खेती सरगुजा संभाग के पहाड़ी इलाकों में की जाती है। अम्बिकापुर के आसपास के 8 से 10गांवों में करीब 600 किसानों के द्वारा लगभग 3000 हेक्टेयर में इसकी खेती हो रही है। इसके अलावा जशपुर जिले में भी इसकी खेती की जा रही है। यहां से टाउ विदेश भी भेजे जाते है। टाउ की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नही होती है। इसके अलावा इसमें बीमारी का खतरा भी नहीं होता है। लेकिन इसके लिए भुरभरी और नमी युक्त भूमि की आवश्यकता होती है। किसानो को इसकी बुआई के लिए अच्छी जुताई के साथ यूरिया खाद की आवश्यकता होती है।

25 दिन पिछड़ी टाउ की बुआई, बारिश से किसान परेशान
दरअसल हरसाल टाउ की बुवाई 15 सितंबर तक पूरी हो जाती थी, लेकिन इस बार बारिश लगातार होने के कारण किसानों को खेत की तैयारी करने और बुवाई में देर हो चुकी है। इस साल लगभग 25 दिन बाद टाऊ की बुवाई की गई है। जिससे किसान परेशान हैं। किसानों के अनुसार सही समय पर बुवाई से पैदावार अच्छी होती है। वही बुवाई के बाद अब हो रही बारिश ने भी किसानों को चिंता में डाल रखा है। क्योंकि अधिक पानी से टाउ की फसल बर्बाद हो जाती है। इसे बुवाई के समय और फूल आने के बाद सिर्फ दो बार पानी की जरूरत पड़ती है। बाकी समय जमीन की नमी से यह पक कर तैयार होता है।

गेंहू के अधिक फायदेमंद है टाउ का आटा
गेंहू के समान ही टाउ से आटा बनाया जाता है। यह आता बेहद ही लाभकारी होता है। अब इसके आटे से कुकीज भी बनाये जा रहें हैं। इस कुकीज में बाकी कुकीज की तरह वसा नहीं होता। बल्कि इसमें मौजूद प्रोटीन और आयरन सेहत को बेहतर बनाने में कारगर हैं। उपवास के दौरान टाउ का आटे का उपयोग किया जाता है। टाऊ के आटे से अब कुकीज बनाकर एक नया प्रोडक्ट बनाने से किसानों की आय बढ़ाने में मददगार साबित होगी।

बिचौलिए ही किसानों से खरीदते हैं टाउ, नहीं मिलती कीमत
किसानों के अनुसार खेतों में प्रति एकड़ टाऊ की पैदावार 10 से 12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसकी खरीदी शहर के बिचौलिए करते हैं। जो किसानों से टाऊ की खरीदी 3500 से 3800 रूपए प्रति क्विंटल पर करते है। जो की बहुत कम है। बिचौलियों के कारण किसानो को पूरी कीमत नहीं मिल पाता। इससे तैयार आटे की शहरों में डिमांड है। इसका आटा लगभग 150 से 200 रूपए प्रति किलो की दर से बेचा जाता है। यह आटा व्रत एवं उपवास के दौरान फलाहार के रूप में उपयोग किया जाता है।

इन गुणों से भरपूर है टाउ का आटा, छिलकों का गद्दों में होता है इस्तेमाल
टाऊ को दूसरे देशों में बक व्हीट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें प्रोटीन, ऐमिनो ऐसिड्स, विटामिन्स, मिनरल्स, फाइबर एवं एन्टी ऑक्सिडेन्ट प्रचुर मात्रा में होने के कारण टाऊ काफी पौष्टिक खाद्य माना जाता है। इसमें ग्लुटेन नहीं पाया जाता। इसमें अनेक औषधीय गुण भी पाए जाते हैं जिसकी वजह से अनेक बीमारियों से बचाव में यह उपयोगी है। यह हृदय रोग, डायबिटीज, कैन्सर और लिवर के लिए फायदेमंद है। इसके छिलकों का उपयोग मेडिकेटेड गद्दों और तकियों के निर्माण में किया जाता है।
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