AGR मामला में सुप्रीम कोर्ट में कल अहम सुनवाई
नई दिल्ली। जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच 11 जून को समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) मामले की सुनवाई करेगी। अदालत ने बकाए पर अपने आदेश को संशोधित करने से भी इनकार कर दिया है। समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) मामले पर दूरसंचार विभाग की याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने 18 मार्च को कहा था कि टेलीकॉम कंपनियों को कोर्ट के आदेश के मुताबिक भुगतान करना ही होगा। एजीआर बकाया पर हमारा फैसला अंतिम है, इसका पूरी तरह से पालन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि की बकाया राशि का पुनर्मूल्यांकन नही होगा।

अपने आदेश में जस्टिस मिश्रा, एस अब्दुल नाजीर और एमआर शाह की तीन-जजों की बेंच ने कहा कि एजीआर बकाए को लेकर कंपनियां खुद आकलन न करें, इसे अवमानना माना जा सकता है। आगे किसी भी आपत्ति पर विचार नहीं किया जाएगा। हमारे फैसले के अनुसार सभी बकाए का भुगतान करना होगा, जिसमें ब्याज और जुर्माना भी शामिल है। सॉलिसिटर जनरल ने उचित समय की मांग करते हुए याचिका दायर की है, हम इस याचिका पर अगली तारीख पर विचार करेंगे।
दूरसंचार विभाग के आकलन के मुताबिक टेलीकॉम कंपनियों पर एजीआर के कुल 1.47 लाख करोड़ रुपए बकाया हैं। भारती एयरटेल पर 35,586 करोड़ और वोडाफोन-आइडिया पर 53,038 करोड़ बाकी हैं। इसमें कंपनियों का लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज शामिल है। लाइसेंस के तौर पर बकाया रकम 92,642 करोड़ रुपये और स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज के तौर पर 70,869 करोड़ रुपये बकाया है। सबसे अधिक बकाया भारती एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया का है।
एजीआर यानी एडजस्ट ग्रोस रेवेन्यू दूरसंचार विभाग द्वारा टेलीकॉम कंपनियों से लिया जाने वाला यूसेज और लाइसेंसिग फीस है। इसके दो हिस्से हैं- स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज और लाइसेंसिंग फीस। अब विवाद इस बात पर है कि, दूरसंचार विभाग का कहना है कि एजीआर की गणना किसी टेलीकॉम कंपनी को होने वाली संपूर्ण आय या रेवेन्यू के आधार पर होनी चाहिए, जिसमें डिपॉजिट इंटरेस्ट और एसेट बिक्री जैसे स्रोत से हुई आय भी शामिल है। दूसरी तरफ, टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि एजीआर की गणना सिर्फ टेलीकॉम सर्विस से होने वाली आय के आधार पर होनी चाहिए।












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