कभी झाड़ू लगाकर स्क्रैप बेचने वाला ये व्यक्ति कैसे बन गया 35000 हजार करोड़ का मेटल किंग

कभी झाड़ू लगाकर स्क्रैप बेचने वाला ये व्यक्ति कैसे बन गया 35000 हजार करोड़ का मेटल किंग

नई दिल्ली। समय देखने के लिए नहीं थी घड़ी, ट्रेन की आवाज से टाइम का पता चलता था। घऱ में टॉयलेट तक नहीं था। एक बेडिंग लेकर बिहार से मुंबई पहुंचें और संघर्ष की कहानी शुरू हो गई। 27 रुपए के किराए में जगह खरीदी, ताकि रात गुजराने के लिए पनाह मिल जाए। झाड़ू से कबाड़ इकट्ठा करते और उसे बेचकर जो थोड़े बहुत पैसे मिलते उससे पेट भी भरना था और अपने सपनों को भी साकार करना था। लेकिन तमाम मुश्किलों के बाद भी दिल में जज्बा था कुछ कर गुजरने का, अपनी पहचान बनाने का। जो शख्स बिहार के छोटे से गांव से मात्र एक जोड़ी कपड़े और एक टीन का बक्सा लेकर निकाल था आज वो 35000 करोड़ का मालिक है।

 न टाइम देखने के लिए घड़ी थी, न घर में टॉयलेट

न टाइम देखने के लिए घड़ी थी, न घर में टॉयलेट

ये कहानी है माइनिंग और मेटल किंग के नाम से पॉपुलर वेदांता रिसोर्सेज के चेयरमैन अनिल अग्रवाल की, जिन्होंने अपने संघर्ष के दम पर आज करोड़ों को कारोबार खड़ा कर दिया। मूलरूप से राजस्थान के रहने वाले अनिल अग्रवाल का जन्म बिहार में हुआ। 15 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई का रास्ता चुन लिया। पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सके। हाल ही में उन्होंने अपने संघर्ष के बारे में बात की और बताया कि उन्हें आज भी वो दिन याद है जब ट्रेन के आने-जाने से पता चलता था कि कितना बजा है। चौमूं और रींगस जिस घर में रहते थे उनके उस घऱ में बाथरूम भी नहीं था।

दिल में अरमान इतने थे कि कुछ कर गुजरना है

दिल में अरमान इतने थे कि कुछ कर गुजरना है

अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश मैं ज्यादा पढ़ नहीं सका। जरूरत थी, इसलिए जल्दी काम शुरू कर लिया। पहली बार मुंबई के लिए ट्रेन में बैठा था। मेरे साथ लोहे का एक बक्सा और एक बेडिंग थी। वहां पहुंचा तो जिंदगी की असलियत से सामना हुआ। स्क्रैप इकट्ठा कर उसे बेचने का काम चालू किया। झाड़ू की मदद से स्क्रैप जमा करता और फिर उसे बेचकर जो थोड़े बहुत पैसे एकत्रित होते उससे मुंबई में खुद को सेटल कर रहा था। मुंबई में 10-15 सालों तक रहने के बाद भी किसी ने रिकॉग्नाइज नहीं किया।

 1970 में शुरू किया कारोबार

1970 में शुरू किया कारोबार

अनिल अग्रवाल ने कहा कि कुछ कर गुजरने का जज्बा था, इसलिए मैं हार नहीं मान रहा था। 1970 में कबाड़ से मेटल की ट्रेंडिंग शुरू की। 10 सालों तक करता रहा और 1980 में स्टरलाइट इंडस्ट्रीज की स्थापना की। 1990 में कॉपर को रिफाइन करने वाली देश की पहली कंपनी खड़ी कर दी। यहीं कंपनी आगे चलकर वेदांता रिसोर्सेज लिमिटड और फिर वेदांता लिमिटेड बनी। 2001 में उनकी कंपनी ने सरकारी एल्युमीनियम कंपनी बाल्को का अधिग्रहण किया, जिसके बाद दुनियाभर में उनकी चर्चा होने लगी। इतना ही नहीं अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी।

 दान की अपनी 75 फीसदी संपत्ति

दान की अपनी 75 फीसदी संपत्ति

अनिल अग्रवाल ने अपनी 75 फीसदी संपत्ति को दान की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि उनके लिए पैसा ही सब कुछ नहीं है। उन्होंने अपनी मेहनत से जो कमाया उसका कुछ हिस्सा समाज को लौटाना चाहता हूं। उन्होंने बिल गेट्स से प्रेरित होकर दान के बारे में सोचा।

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