Rooh Afza Success Story: तीन देशों का बना हमदर्द, जानिए रूह तक उतरने वाले 'रूह अफजा' की कहानी
Rooh Afza Ki Kahani: 'रूह अफजा' केवल एक पेय मात्र नहीं बल्कि 'रूह' तक उतरने वाला ड्रिंक है, जिसने 117 सालों से मार्केट में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है।

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Rooh Afza Success Story: देश की सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को एक बड़ा फैसला सुनाया, उसने 'दिल अफजा' शरबत के उत्पादन को रोकने वाले हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। जिसके बाद एक बार फिर से देश के सबसे पुराने लेकिन प्रचलित पेय पदार्थ 'रूह अफजा' लोगों के बीच चर्चा में आ गया। लोग इसे लेकर बहुत सारी बातें सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। आपको बता दें कि 'रूह अफजा' महज एक पेय नहीं है बल्कि इसके साथ एक, दो नहीं बल्कि तीन देशों का इतिहास जुड़ा हुआ है। लाल रंग का ये मीठा पेय हम में से बहुत लोगों के बचपन का अहम हिस्सा रहा है इसलिए ये केवल Drink नहीं बल्कि खूबसूरती, दोस्ती, समारोह का उदाहरण भी है।
एक दवा के तौर पर हुई थी पेय की शुरुआत
आपमें से बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत में इस पेय की शुरुआत एक दवा के तौर पर हुई थी। बात साल 1907 की है, पुरानी दिल्ली के लाल कुआं मार्केट में एक हकीम हाफिज अब्दुल मजीद , जो कि यूनानी चिकित्सा के जानकार थे, ने लोगों को ठीक करने के लिए एक दवा इजाद की थी, जो कि लाल रंग की मीठी-मीठी थी। दरअसल उस साल दिल्ली और आसपास के एरिया में काफी गर्मी पड़ी थी ऐसे में लोगों को लू से बचाने के लिए हकीम चाचा ने इस दवा को इजाद किया और ये दवा लोगों की हमदर्द बनकर उनकी रूह में उतरने लगी जिसकी वजह से हकीम चाचा की दुकान लोगों के लिए हमदर्द कंपनी बन गई।
रोजा इफ्तार का अभिनन्न अंग
शुरु-शुरू में तो ये सिरप के रूप में आती थी, जिसे लेने के लिए लोग घरों से बर्तन लाते थे। ये रोजा इफ्तार का अभिनन्न अंग बन गया था। हकीम चाचा के दो बेटे थे। अब्दुल हमीद और मोहम्मद सईद, देश के जब दो हिस्से हुए तो मोहम्मद सईद पाकिस्तान चले गए, उनके पिता का निधन हो चुका था लेकिन अब्दुल हमीद ने अपनी मां सग इंडिया में ही रहने का फैसला किया।
बंटवारे के बाद सरहद पार पहुंचा 'रूह अफजा'
इस तरह से सईद के जरिए 'रूह अफजा' पाकिस्तान पहुंच गया और वहां का मशहूर ब्रांड बन गया तो वहीं भारत में हमदर्द एक ट्र्स्ट बन गया, जिसके डायरेक्टर बने अब्दुल हमीद के बड़े बेटे अब्दुल मोईद जबकि उनके छोटे बेटे हम्माद अहमद ने मार्केटिंग की कमान संभाल ली। इन दोनों भाईयों के ही परिवारों ने इसका प्रोडक्शन इंडिया में जारी रखा।

इसके बाद जब बांग्लादेश का जन्म हुआ तो वहां भी ये पेय पदार्थ हमदर्द बांग्लादेश के नाम से बिकने लगा और देखते ही देखते ही इसने तीनों देशों में अमिट छाप छोड़ दी। हर प्रोडक्ट की तरह इसमें भी काफी बदलाव हुआ। इसकी बॉटेल बड़ी हो गई लेकिन इसको बनाने की विधि आज भी कंपनी वालों को छोड़कर किसी को नहीं पता है।
बहुत सारी चुनौतियों का किया सामना
मार्केट में इस बहुत सारे प्रोडक्ट्स जैसे रसना, सॉफ्ट ड्रिंक्स , शरबत ए आजम जैसे पेय पदार्थें से चुनैतियां मिली। यही नहीं इसकी कंपनी ने दोनों भाई के झगड़े भी देखे लेकिन इसका एक सॉलिड मार्केट रहा और आज भी ये मध्यमवर्गीय लोगों की पहली पसंद बना हुआ है। किसी ने नहीं सोचा था कि दिल्ली की छोटी गली से निकलकर ये पदार्थ तीन देशों में तहलका मचाएगा और एक दिन इसके बारे में देश की सर्वोच्च अदालत फैसला करेगी।












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