डॉलर के आगे बेबस रुपया! एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल, कमजोर करेंसी बनने के पीछे के 3 बड़े कारण
Indian Rupee in Retreat: भारत का रुपया इस समय सिर्फ डॉलर के मुकाबले कमजोर नहीं हो रहा, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर बढ़ते कई दबावों का संकेत भी दे रहा है। एशिया की प्रमुख मुद्राओं में भारतीय रुपया सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में शामिल हो गया है। डॉलर के मुकाबले इसमें करीब 6.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब दुनिया पहले से ही युद्ध जैसे हालात, महंगे कच्चे तेल और कमजोर वैश्विक निवेश माहौल से जूझ रही है। आर्थिक जानकार मानते हैं कि यह केवल मुद्रा बाजार की हलचल नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में महंगाई, आयात लागत और आम लोगों के खर्च पर असर डालने वाला बड़ा संकेत हो सकता है।

आखिर रुपया इतना कमजोर क्यों हो रहा है?
रुपये पर दबाव की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। जब तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है।
इसके साथ ही दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ता तनाव भी निवेशकों को सुरक्षित बाजारों की तरफ धकेल रहा है। ऐसे माहौल में निवेशक अमेरिका जैसे देशों की तरफ ज्यादा पैसा भेजते हैं, जिससे डॉलर मजबूत होता है और उभरते देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है।
विदेशी निवेशकों की दूरी क्यों चिंता बढ़ा रही?
पिछले कुछ समय में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाला है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली का सीधा असर रुपये पर पड़ा है। जब निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बेचते हैं तो वे रुपये को डॉलर में बदलते हैं। इससे डॉलर की मांग तेजी से बढ़ती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका में ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की आशंका भी इसका एक बड़ा कारण है। निवेशकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर और सुरक्षित रिटर्न दिख रहा है, इसलिए भारत जैसे बाजारों से पैसा बाहर जा रहा है।
एशिया में बाकी मुद्राओं का हाल क्या कहता है?
भारतीय रुपया अकेला दबाव में नहीं है, लेकिन इसकी गिरावट कई एशियाई देशों से ज्यादा रही है। इंडोनेशियाई रुपिया में करीब 3.4 प्रतिशत और वियतनामी डोंग में 2.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। थाई बाहत भी कमजोर हुआ, लेकिन उसकी गिरावट सिर्फ 1.2 प्रतिशत रही।
दिलचस्प बात यह है कि चीन, जापान और मलेशिया की मुद्राओं ने मजबूती दिखाई। चीनी युआन में 0.4 प्रतिशत, जापानी येन में 0.8 प्रतिशत और मलेशियाई रिंगिट में 2.1 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। इससे साफ है कि एशिया के सभी देश एक जैसी स्थिति में नहीं हैं और निवेशकों का भरोसा अलग-अलग देशों में अलग तरीके से दिख रहा है।
एशियाई मुद्राओं का प्रदर्शन
| मुद्रा | देश | प्रदर्शन | |
|---|---|---|---|
| 1 | भारतीय रुपया (INR) | भारत | -6.10% |
| 2 | इंडोनेशियाई रुपिया (IDR) | इंडोनेशिया | -3.40% |
| 3 | वियतनामी डोंग (VND) | वियतनाम | -2.80% |
| 4 | थाई बाहत (THB) | थाईलैंड | -1.20% |
| 5 | चीनी युआन (CNY) | चीन | 0.004 |
| 6 | जापानी येन (JPY) | जापान | 0.008 |
| 7 | मलेशियाई रिंगिट (MYR) | मलेशिया | 0.021 |
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा असर आयात पर पड़ता है। भारत विदेशों से तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनें और कई जरूरी उत्पाद खरीदता है। रुपया कमजोर होने का मतलब है कि इन चीजों को खरीदने में ज्यादा पैसा खर्च होगा।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेशी यात्रा करने वालों का खर्च भी बढ़ सकता है।
क्या रिजर्व बैंक के सामने चुनौती बढ़ रही है?
रुपये की गिरावट को रोकना रिजर्व बैंक के लिए आसान नहीं माना जा रहा। अगर केंद्रीय बैंक बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देता है तो विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ सकता है। वहीं ब्याज दरों में बदलाव का फैसला भी काफी सावधानी से लेना होगा, क्योंकि इसका असर सीधे आर्थिक विकास पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती बाजार में भरोसा बनाए रखना है। अगर वैश्विक हालात सुधरते हैं और विदेशी निवेशकों की वापसी होती है तो रुपये को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर तेल की कीमतें और बढ़ती हैं या दुनिया में तनाव गहराता है तो भारतीय मुद्रा पर दबाव और बढ़ सकता है।
ये भी पढ़ें: CNG Price Hike: 3 दिन के अंदर दूसरा मंहगाई झटका, दिल्ली-NCR में फिर बढ़े सीएनजी के दाम, क्या है ताजा रेट?












Click it and Unblock the Notifications