GDP: दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी में 7.5 फीसदी की गिरावट

GDP: दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी में दर्ज की गई 7.5 फीसदी की गिरावट

नई दिल्ली। मौजूदा वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी में 7.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं पिछले वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी में 4.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने शुक्रवार को जो आंकड़े जारी किए हैं। उसके मुताबिक, कॉन्सटेंट प्राइस (2011-12) के आधार पर 2020-21 की दूसरी तिमाही में जीडीपी 33.14 लाख करोड़ रुपए रही है। 2019-20 की दूसरी तिमाही में ये आंकड़ा 35.84 लाख करोड़ रुपए रहा था।

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    मौजूदा वित्तवर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई थी। जो आजादी के बाद देश की जीडीपी में सबसे बड़ी गिरावट थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी में 8.6 फीसदी की गिरावट का अनुमान लगाया था। दूसरी एजेंसियों ने भी आठ से 12 फीसदी गिरावट का अनुमान जताया था। लगातार दो क्वार्टर में निगेटिव ग्रोथ रहने के बाद अब भारत की अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट में कहा जा रहा है।

    आठ कोर इंडस्ट्रीज के अक्टूबर महीने के आंकड़े भी जारी किए गए हैं। अक्टूबर में आठ प्रमुख उद्योगों के उत्पादन में 2.5 फीसदी की गिरावट आई है। आठ कोर इंडस्ट्रीज का आंकड़ा अक्टूबर में 124.2 पर रहा है। यह अक्टूबर 2019 की तुलना में 2.5 प्रतिशत कम है। अप्रैल से अक्टूबर 2021 की ग्रोथ की बात करें तो इसमें 13 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

    क्या है जीडीपी और कैसे मापी जाती है?

    ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का पैमाना है। भारत में जीडीपी की गणना प्रत्येक तिमाही में की जाती है। जीडीपी का आंकड़ा अर्थव्यवस्था के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में उत्पादन की वृद्धि दर पर आधारित होता है। जीडीपी के तहत कृषि, उद्योग व सेवा तीन प्रमुख घटक आते हैं। इन क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर तय होती है। दो तरह से प्रस्‍तुत होता है जीडीपी जीडीपी को दो तरह से प्रस्‍तुत किया जाता है, क्‍योंकि उत्‍पादन की कीमतें महंगाई के साथ घटती बढ़ती रहती हैं। यह पैमाना है कॉन्‍टैंट प्राइस का जिसके अंतर्गत जीडीपी की दर व उत्‍पादन का मूल्‍य एक आधार वर्ष में उत्‍पादन की कीमत पर तय होता है जबकि दूसरा पैमाना करेंट प्राइस है जिसमें उत्‍पादन वर्ष की महंगाई दर शामिल होती है।

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