बजट 2017-18 से शिक्षा क्षेत्र को क्‍या हैं उम्‍मीदें

1 फरवरी, 2017 को पेश होने वाले बजट से देश के सभी वर्गों को आस होगी कि यह बजट उनकी उम्‍मीदों पर खरा उतरेगा। पर इस बार बजट में शिक्षा तेज को काफी तवज्‍जों दी जा सकती है।

नई दिल्‍ली। 1 फरवरी, 2017 को पेश होने वाले बजट से देश के सभी वर्गों को आस होगी कि यह बजट उनकी उम्‍मीदों पर खरा उतरेगा। पर इस बार बजट में शिक्षा तेज को काफी तवज्‍जों दी जा सकती है। दुनिया भर के शैक्षिक संस्‍थानों और वहां के शैक्षिक स्‍तर पर पहुंचने के लिए इस साल बजट में उससे संबंधित कई नई घोषणाएं की जानी चाहिए। शिक्षाविद्दों का मानना है कि शैक्षिक संस्‍थानों के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और शिक्षा के स्‍तर को बेहतर बनाने के लिए बजट 2017-18 में अच्‍छे खासे फंड को जारी किया जाना चाहिए। शिक्षाविद्द सारायू रामाचंद्रन ने कहा कि बच्‍चे इस देश का भविष्‍य हैं और अपने बच्‍चों को हमें इस तरह की शिक्षा प्रदान करनी चाहिए कि वो वैश्विक स्‍तर पर सोच सकें। इसके लिए हमें वर्ल्‍ड क्‍लॉसरूम और वैसे ही सैलेबस की जरूरत है।

बजट 2017-18 से शिक्षा क्षेत्र को क्‍या हैं उम्‍मीदें

पिछले साल पेश किए बजट में शिक्षा क्षेत्र के बजट के लिए कम बजट का आवंटन किया गया था। उम्‍मीद जताई जा रही है कि इस साल सरकार बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए कुछ ज्‍यादा बजट का आवंटन कर सकती है। उम्‍मीद जताई जा रही है कि इस साल सरकार शिक्षा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए बजट में यह घोषणाएं कर सकती है

क्‍योंकि देश की 50 फीसदी जनसंख्‍या 25 साल की उम्र से कम की है। ऐसे में बजट का सबसे ज्‍यादा असर इसी वर्ग पर पड़ता है। उम्‍मीद है कि इस साल कुल जीडीपी का 10 फीसदी बजट शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित किया जाएगा।

वर्ष 2016 में एजुकेशन सेक्‍टर के लिए बजट में किया गया आवंटन ऊंट के मुंह में जीरा जैस कहावत पर आधारित था। इस बजट में सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की शुरुआत कर और स्किल डेवलपमेंट के लिए 1700 करोड़ रुपए का बजट आवंटित करके एक सही कदम उठाया था। पर शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित बजट में मात्र 72‍,394 करोड रुपए था। वर्ष 2015 के बजट से ज्‍यादा था, पर यह इस क्षेत्र के लिए काफी नहीं था। सरकार ने जो बजट शिक्षा क्षेत्र के लिए दिया था वो जीडीपी के 6 फीसदी से भी कम था।

सिंगापुर मॉडल को अपनाते हुए देश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ाया जाना चाहिए। इसके चलते यह होगा कि देश के युवा विदेशों से जाने से अच्‍छा भारत में ही विदेशी शिक्षा संस्‍थानों में शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। साथ ही देश में शिक्षा ग्रहण करने में उनकी फीस भी कम लगेगी।

दूसरे क्षेत्रों की तरह एजुकेशन क्षेत्र में टैक्‍स की रियायत मिलनी चाहिए। इसकी शुरुआत उच्‍च शिक्षा के लिए लोन पर टैक्‍स छूट देकर की जा सकती है। आज भी देश में अधिकतर युवाओं के लिए उच्‍च शिक्षा ग्रहण करना काफी महंगा है। इसलिए छात्रों की मदद हो सके तो सरकार को माइक्रो फाइनेंसिंग विकल्‍प के विषय में सोचना चाहिए। इसके जरिए छात्रों को अच्‍छी एजुकेशन मिलने में आसानी होगी।

सभी सरकारी और निजी स्‍कूलों को प्राइमरी स्‍तर से मुफ्त शिक्षा के नियम को अच्‍छी तरह से लागू किया जाना चाहिए। सरकार ने पहले भी प्रयास किया है आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सस्‍ती शिक्षा उपलब्‍ध कराई जा सके। मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि सभी के लिए एक समान प्रतियोगिता का स्‍तर तैयार हो सके। ऐसा माहौल तैयार करके ही शिक्षा के क्षेत्र को आरक्षण से दूर रखा जा सकता है।

केंद्र सरकार ने हाल में ही आईआईएम को डिग्री दिए जाने की इजाजत दे दी है। ऐसे में केंद्र सरकार को अब आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम इंस्‍टीट्यूट को और ज्‍यादा स्‍थापित करना चाहिए जिससे ज्‍यादा से ज्‍यादा छात्र ऐसी शिक्षा का फायदा उठा सकें।

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