बाबूजी कल्याण सिंह के निधन पर जनपद में शोक की लहर, कहा था- 'बुलंदशहर मेरी कर्मभूमि है'

बुलंदशहर, 22 अगस्त: यूपी के पूर्व सीएम व राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का 21 अगस्त की देर रात निधन हो गया। 89 साल की उम्र में उन्होंने लखनऊ के पीजीआई अस्पताल में अंतिम सांस ली। कल्याण सिंह के निधन की खबर मिलते ही बुलंदशहर जनपद में शोक की लहर फैल गई। बाबूजी (कल्याण सिंह) के निधन पर उनको याद कर लोगों ने श्रद्धाजंति दी। वहीं, 23 अगस्त को बाबूजी का अंतिम संस्कार डिबाई थाना क्षेत्र के नरौरा में गंगा किनारे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

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बता दें, बाबूजी यानी कल्याण सिंह ने 16 जुलाई 2016 को बुलंदशहर में आयोजित एक जनभसा के दौरान कहा था कि 'अलीगढ़ मेरी जन्मभूमि है और बुलंदशहर मेरी कर्मभूमि।' जिसके बाद सभा में एक उत्साह की लहर दौड़ गई थी। बाबूजी का पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति में खासा दखल रहता था। तो वहीं, अब लोग उनके द्वारा दिए गए एक एक बयान को याद कर उन्हें अपनी यादों में याद कर रहे हैं। उन्होंने धर्म के नाम पर फूट पैदा करने वाली राजनीति से दूर रहने की अपील युवाओं से की थी। इतना ही नहीं, उन्होंने खरीद-फरोख्त की राजनीति से बचने की सलाह भी युवाओं को दी थी।

बुलंदशहर से उनके नाते को देखें तो उनका जन्म बेशक अलीगढ़ जनपद में हुआ था, लेकिन बुलंदशहर को वह अपनी कर्मभूमि बताते थे। वर्ष 1991 से अब तक बुलंदशहर लोकसभा सीट के आंकड़े इसकी बानगी पेश करते हैं। दरअसल, बाबू जी का आशीर्वाद पाने वाले प्रत्याशी को ही बुलंदशहर लोकसभा सीट पर विजयश्री हासिल हुई। वर्ष 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मनाने पर बाबूजी ने एक बार फिर भाजपा का दामन थामा था और वर्ष 2002 में बनाई अपनी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का भाजपा में विलय किया था। पूर्व प्रधानमंत्री से हुई सुलह के बाद बुलंदशहर लोकसभा सीट से कल्याण सिंह ने चुनाव लड़ा और पहली बार देश के सर्वोच्च सदन में अपनी आमद कराई थी।

राम लहर के साथ ही अयोध्या मुद्दे पर भाजपा में हीरो साबित हुए कल्याण बुलंदशहर में खासतौर पर लोकसभा चुनावों में पार्टी के कर्णधार रहे। 1991, 1996, 1998 और 1999 में कल्याण सिंह के बल पर ही यहां कमल खिला और छत्रपाल सिंह देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचे। 2004 में कल्याण सिंह ने खुद ताल ठोकी और भाजपा की झोली में एक बार फिर से यह सीट डाली। लेकिन साल 2009 में भाजपा ने उनकी पसंद के प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया और अशोक प्रधान को प्रत्याशी बनाया।

जिसके बाद बाबू जी ने बगावत कर दी और कमल का साथ छोड़कर मुलायम सिंह की साइकिल को समर्थन दे दिया। उस दौरान बुलंदशहर सीट से सपा ने कमलेश वाल्मीकि को मैदान में उतारा था, जिन पर बाबू जी का हाथ माना जाता था। पहली बार भाजपा से बाबू जी का आशीर्वाद हटा तो कमल यहां मुरझा गया और साइकिल दौड़ गई। उस समय भी राजनीतिक पंडितों का कहना था कि जहां कल्याण वहां बुलंदशहर का परिणाम।

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