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जब इंसान का आमना- सामना होगा उसके डिजिटल हमशक्ल से

डिजिटल ट्विन्स
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डिजिटल ट्विन्स

कभी न कभी आपको किसी दोस्त ने ज़रूर बताया होगा कि आपकी तरह का शक्ल-सूरत वाला कोई शख़्स उसे मिला था. कहीं वो आपका जुड़वां भाई तो नहीं है. लेकिन फर्ज़ कीजिये कि आप खुद अपना जु़ड़वां तैयार कर सकें तो क्या हो? बिल्कुल हू-बहू आपकी कॉपी. लेकिन जो जैविक नहीं डिजिटल ज़िदगी जीता हो.

दरअसल हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां वास्तविक दुनिया में मौजूद हर चीज डिजिटल तौर पर ढाली जा रही है. हमारे शहर, कारें, घर और यहां तक खुद हम भी डिजिटल तौर पर मौजूद हैं.

और जिस तरह मेटावर्स ( एक वर्चुअल,डिजिटल दुनिया जहां आपका अवतार घूम रहा होगा) पर खूब बातें हो रही हैं और उसी तरह डिजिटल ट्विन्स यानी जुड़वां भी नए टेक ट्रेंड में शुमार हो चुका है.

डिजिटल ट्विवन या डिजिटल जुड़वां वास्तविक दुनिया की हू-बहू कॉपी होगा. लेकिन इसका एक मिशन होगा. ये वास्तविक दुनिया की ज़िदगी को बेहतर करेगा या किसी ने किसी उसे फीडबैक देगा ताकि इसमें सुधार हो सके.

शुरुआत में इस तरह के ट्विन्स सिर्फ़ अत्याधुनिक 3डी कंप्यूटर मॉडल का जमावड़ा भर थे. इनमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स लगे होते थे ( ये फिजिकल चीजों को कनेक्ट करने करने के लिए सेंसर का इस्तेमाल करते हैं).

इसका मतलब ये है कि आप डिजिटली कोई ऐसी चीज बना सकते हैं जो मूल यानी असली चीज़ों से लगातार सीख रही हो और उसे बेहतर करने में भी मदद कर रही हो.

जल्द ही मनुष्य का डिजिटल जुड़वां तैयार होगा

टेक्नोलॉजी एनालिस्ट रॉब एंड्रेले का मानना है कि इस दशक के ख़त्म होने से पहले तक जल्द ही मनुष्य का डिजिटल जुड़वां होगा, जो सोच सकेगा.

वह कहते हैं, '' लेकिन इन चीज़ों के सामने लाने से पहले काफ़ी सोच-विचार की ज़रूरत है. इसमें नैतिकता के सवाल भी जुड़े होंगे. जैसे- सोचने में सक्षम हमारा डिजिटल जुड़वां नौकरियां देने वालों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है. ''

फर्ज़ कीजिये आपकी कंपनी आपका डिजिटल जुड़वां बना कर कहे '' सुनिए, आपका डिजिटल जुड़वां मौजूद है. हमें इसे सैलरी भी नहीं देनी होती है. फिर हम आपको नौकरी पर क्यों रखें . ''

एंड्रेले कहते हैं कि आने वाले मेटावर्स के जमाने में डिजिटल जुड़वां का मालिकाना हक एक बड़ा सवाल बन जाएगा. उदाहरण के लिए मेटा (पहले फेसबुक) के वर्चुअल रियल्टी प्लेटफॉर्म, हॉरिजन वर्ल्ड्स पर आप अपने अवतार को अपनी शक्ल दे सकेंगे लेकिन आप इस पैर मुहैया नहीं का सकेंगे क्योंकि अभी इससे संबंधित टेक्नोलॉजी शुरुआती दौर में ही है.

मुश्किल राह लेकिन उम्मीद बड़ी

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सीनियर रिसर्च फेलो प्रोफेसर सैंड्रा वाचटर डिजटल जुड़वां को लेकर पनप रही दिलचस्पियों के बारे में कहती हैं '' ये आपको रोमांचक साइंस फिक्शन की याद दिलाता है. लेकिन फ़िलहाल ये कल्पना के स्तर पर ही मौजूद है. ''

वह कहती हैं, '' क्या कोई लॉ स्कूल में सफल होगा. बीमार पड़ेगा या फिर अपराध को अंजाम देगा'' . किसी की ज़िंदगी में क्या होगा वह लोगों के स्वभाव और उसकी परवरिश पर निर्भर होगा. यह बहस का विषय है.

लोगों की ज़िंदगी कैसी होगी ये उनकी अच्छी और बुरी किस्मत, दोस्तों, परिवार उनके सामाजिक आर्थिक बैकग्राउंड, पर्यावरण और उनकी निजी पसंदगी पर निर्भर करेगी.

वह कहती हैं ''आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई वह लोगों की ज़िंदगी की घटनाओं के बारे में पहले से बता सके. क्योंकि इनसे काफी जटिलताएं जुड़ी हैं.

इसलिए हमें डिजिटल जुड़वां बनाने की दिशा में अभी लंबा सफ़र तय करना है. हम जब तक लोगों की शुरू से आख़िर तक की ज़िंदगी को समझ कर उसका मॉडल नहीं बना लेते तब तक ये संभव नहीं है. इसमें भी हमें इसका अंदाज़ा लगाना होगा कि लोगों की निजी ज़िंदगी में क्या-क्या हो सकता है''.

इसलिए अभी डिजिटल ट्विवन तैयार करने के काम प्रोडक्ट डिजाइनिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और शहरी नियोजन ( अर्बन प्लानिंग) में ही सबसे ज़्यादा और बेहतरीन तरीके से हो रहा है. मिसाल के तौर पर फॉर्मूला वन रेसिंग का मामला लें. मैकलारेन और रेड बुल की टीमें अपनी रेसिंग कारों की डिजिटल ट्विन का इस्तेमाल करती हैं.

दिग्गज डिलीवरी कंपनी डीएचएल अपने गोदामों और सप्लाई चेन का एक डिजिटल मैप तैयार कर रही है ताकि वो अपने कामकाज को और बेहतर कर सके.

फ़िलहाल हमारे शहर तेज़ी से डिजिटल दुनिया में बदले जा रहे हैं. शंघाई और सिंगापुर दोनों शहरों के डिजिटल जुड़वां हैं. इन्हें बिल्डिंग, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और गलियों के डिजाइन में सुधार और परिचालन के लिए बनाया गया है.

सिंगापुर में डिजिटल ट्विन का एक काम लोगों को रास्ता बनाने में मदद करना है और ताकि वे प्रदूषण से घिरी जगहों से गुज़रने के दौरान रास्ता बदल सकें. दूसरी जगहों पर इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अंडरग्राउंड लाइन्स जैसे नए इन्फ्रास्ट्रक्चर को बताने में होगा. मध्य पूर्व के देशों में नए शहर वास्तविक दुनिया और डिजिटल दुनिया दोनों जगह बनाए जा रहे हैं.

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फ्रेंच सॉफ्टवेयर कंपनी दसॉ सिस्टम्स का कहना है कि ऐसी हज़ारों कंपनियां हैं जो डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी में दिलचस्पी दिखा रही हैं. ये कंपनी भी इस दिशा में काम कर रही है और इसने डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी के ज़रिये एक हेयर केयर कंपनी को ज़्यादा दिनों तक चलने वाले शैंपू के बोतल के डिजिटल डिजाइन करने में मदद की है. इसके लिए वास्तविक प्रोटोटाइप नहीं बनाए गए. सारा काम डिजिटली हुआ है. यानी इससे इस प्रयोग में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल बच गया.

ये कंपनी दूसरी कंपनियों को उनके फ्यूचरिस्टिक प्रोजेक्ट्स डिजाइन करने में भी मदद कर रही है. इनमें जेटपैक्स से लेकर ऐसी मोटरबाइक्स हैं जिनमें फ्लोटिंग व्हील्स लगे हैं. ऐसी कारें बनाने की तैयारी में मदद की जा रही है, जो उड़ सकें. हर किसी का फिजिकल प्रोटोटाइप भी बनाया गया है लेकिन शुरुआती मॉडल डिजिटल स्पेस में ही बनाए जा रहे हैं .

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हेल्थकेयर सेक्टर में डिजिटल ट्विन्स की अहमियत

लेकिन डिजिटल ट्विन्स की सबसे ज़्यादा अहमियत हेल्थकेयर सेक्टर में देखी जा रही है.दसॉ के लिविंग हार्ट प्रोजेक्ट ने इंसान के दिल का एक बेहद सटीक वर्चुअल मॉडल तैयार किया है. इसका परीक्षण और विश्लेषण किया जा सकता है. यह हार्ट सर्जन को प्रयोग करने की भी सहूलियत देता है. सर्जन अलग-अलग परिस्थतियों की कल्पना कर तमाम तरह प्रक्रियाओं को मेडिकल डिवाइस के ज़रिये प्रयोग कर सकते हैं.

ये परियोजना डॉ. स्टीव लेविन की परिकल्पना थी. डिजिटल ट्विन बनाने के पीछे उनकी निजी वजह थी. उनकी बेटी को पैदा होने के वक्त से हृदय संबंधी दिक्कत थी. जब वह अपने उम्र के दूसरे दशक के आखिर में थी और हार्ट फेल की जोखिम से जूझ रही थी तो उन्होंने वर्चुअल तौर पर उसका दिल बनाने का फैसला किया.

बोस्टन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल अब इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर वास्तविक हृदय रोगियों की हृदय की स्थितियों की मैपिंग करता है, जबकि लंदन में ग्रेट ऑरमोंड स्ट्रीट हॉस्पिटल में इंजीनियरों की एक टीम क्लीनिक कर्मियों के साथ मिल कर टेस्ट के लिए इस्तेमाल होने वाले ऐसी डिवाइस पर काम कर रही है, जो बच्चों में दुर्लभ दिल की बीमारियों में मदद कर सकती है.

दसॉ में ग्लोबल अफेयर्स की डायरेक्टर सेवरिन ट्रोईले कहती हैं कि डिजिटल हार्ट में प्रयोग से एक फ़ायदा तो यह हुआ है कि इससे जानवरों पर प्रयोग करने से बच जाते हैं. वैज्ञानिक प्रयोग के लिए जानवरों का इस्तेमाल एक विवादास्पद पहलू रहा है. अब ये कंपनी और ज़्यादा ऑर्गन ट्विन बनाने की योजना बना रही है. इनमें मनुष्य की आंख और मस्तिष्क भी शामिल हैं.

वह कहती हैं, '' किसी न किसी समय हम सबका डिजिटल ट्विन होगा ताकि आप डॉक्टर के पास जाएं और तेजी से बीमारी की रोकथाम के लिए दवाइयां बना सकें. साथ ही ये सुनिश्चित कर सकें कि हर इलाज पर्सनलाइज्ड हो जाए''

डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना

इस टेक्नोलॉजी की एक और भी ज़्यादा महत्वाकांक्षी परियोजना है. इसके तहत ये योजना बन रही है कि पूरी दुनिया का ही डिजिटल वर्जन बना लिया जाए. अमेरिकी सॉफ्टवेयर फर्म एनविडिया एक प्लेटफॉर्म चलाती है, जिसे ओमनीवर्स कहते हैं. इसे वर्चुअल वर्ल्ड्स और डिजिटल ट्विन्स बनाने के लिए डिजाइन किया गया है.

इसकी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है डिजिटल दुनिया में पृथ्वी की प्रतिकृति बनाना.

इसे अर्थ-2 यानी पृथ्वी-2 कहा जा रहा है. इसमें डीप लर्निंग मॉडल और न्यूरल नेटवर्क्स का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि यह पृथ्वी के पर्यावरण जैसा ही पर्यावरण डिजिटल स्पेस में बना सके और जलवायु परिवर्तन की समस्या का हल मुहैया कराए.

इस साल मार्च में यूरोपियन कमीशन ने यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कुछ दूसरे संगठनों से मिल कर ऐलान किया था कि वे पृथ्वी का डिजिटल ट्विन बनाएंगे. इसे डेस्टिनेशन अर्थ कहा गया.

इन संगठनों को उम्मीद है कि 2024 के आख़िर तक उनके पास पृथ्वी वास्तविक परिस्थितियों और सिम्यूलेशन के ज़रिये इतना पर्याप्त डेटा होगा कि वे ऐसा डिजिटल ट्विन बना सकें जो बाढ़, सूखा और लू और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने पर फोकस कर सकें. ज्वालामुखी के फटने, सूनामी जैसे हालातों को भांप कर उन देशों को ऐसी समस्याओं से निपटने में मदद की जा सके जो लगातार इससे जूझ रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

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