23 साल पुरानी इस तस्वीर में है एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट IPS ऑफिसर, क्या पहचान सकते हैं आप?
सुपर कॉप, सिंघम, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट... अक्सर फिल्मों में जांबाज पुलिस अफसरों के लिए ऐसे नाम सुनने को मिलते है। लेकिन, कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे भी हैं, जो रियल लाइफ में भी इन नामों से पुकारे जाते हैं। बात हो रही है देश के एक ऐसे ही आईपीएस अफसर की, जिन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहा जाता है।
यहां हमने जो तस्वीर आपको दिखाई है, उसमें यही एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसर शामिल हैं। चलिए आपको पहचान के लिए एक और हिंट देते हैं। यूपी कैडर के इस आईपीएस अधिकारी की बहादुरी के चर्चे इतने मशहूर हैं कि इनके ऊपर एक वेब सीरीज भी बन चुकी है। अब तो आप पक्का पहचान गए होंगे, अगर नहीं तो चलिए हम ही बता देते हैं।

ये तस्वीर है आईपीएस ऑफिसर नवनीत सिकेरा की, जो खुद उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर शेयर की है। तस्वीर के साथ उन्होंने वो कहानी भी शेयर की है, जो इससे जुड़ी हुई है।
1996 के एक ऐसे आईपीएस अफसर जिनकी कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। तस्वीर में दिख रहे अधिकारी एटा जिले में जन्मे नवनीत सकेरा हैं, जिनका बोलबाला ऐसा था कि अपराधी उनका नाम सुनते ही थर-थर कांपने लगते थे। अपराधियों के प्रति शुरुआत से ही उनका काफी कड़ा रुख था।
नाम सुनते ही थर-थर कांपते थे अपराधी
लेकिन जितना कड़ा रुख वे अपराधियों के प्रति रखते थे, उतना ही नर्म रवैया उनका लोगों के प्रति था। सोशल मीडिया पर नवनीत काफी एक्टिव रहते हैं और हाल ही में फेसबुक पर उन्होंने 23 साल पुराने ऐसे किस्से का जिक्र किया, जिसमें भावुकता और प्रेम कूट कूटकर भरा हुआ है।
23 साल पुरानी यादें हुईं ताजा
23 साल पुरानी तस्वीर में आईपीएस अधिकारी के अलावा काफी लोग नजर आ रहे हैं। अपनी कहानी में वे उत्तराखंड में बसे खूबसूरत हिल स्टेशन मसूरी का जिक्र करते हैं। वे बताते हैं कि परिवार संग उत्तराखंड गए थे तो कसार देवी मां के मंदिर जाते हुए भोटिया नस्ल के पहाड़ी कुत्ते घूम रहे थे। इसके बाद मैंने बच्चों को बताया कि जब मैं पहली बार ट्रैकिंग पर आया था तो रास्ते में भोटिया नस्ल का पिल्ला मिला, जो बड़ा कमजोर और भूखा था। मैंने उसे ये सोचकर अपने बैग में रख लिया कि इसे कुछ खिला पिलाकर छोड़ दूंगा।
कैसे पड़ा एनकाउंटर स्पेशलिस्ट नाम?
इससे पहले आगे की कहानी पढ़ें, जान लेते हैं कि आईपीएस अधिकारी नवनीत सकेरा एनकाउंट स्पेशलिस्ट के नाम से भी फेमस हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत अधिकारी उन्होंने रेप, अपहरण और कई सारी आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने वाले अपराधियों का एक एक कर सफाया किया। मुजफ्फरनगर में जिस तरह से वे अपराधियों का एनकाउंटर करते गए, उनका नाम ही सुपर कॉप पड़ गया। नवनीत सकेरा ने करीब 40 एनकाउंटर किए थे।
कुत्ते के लिए नर्म पड़ा दिल
अपने मसूरी के दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं कि कुछ किलोमीटर चलने के बाद कोई दुकान दिखी तो उसको अच्छे से खिलाया और जब ग्रुप का आगे बढ़ने का समय हुआ तो भारी मन से मैं भी आगे चलने को तैयार हो गया, मैं आगे का रास्ता देखूं और पलट कर उस छोटे से बच्चे की आशा भरी आंखों को, जैसे ही मैं आगे बढ़ा, मैंने मन में सोचा अब पलट कर नहीं देखूंगा। मन कमजोर पड़ जायेगा, क्योंकि मैं उसे कैसे पालता, LBSNAA मसूरी में ट्रेनिंग कर रहा था, हॉस्टल में रख नहीं सकता था।
भावुक कर देगी ये कहानी
उन्होंने आगे कहा कि मैं क्या करता, मन मार के मैं आगे बढ़ता गया। काफी दूर चलने के बाद मन नहीं माना सोचा एक बार पीछे पलट के देखूं, अब इस मोड़ से मुझे वो दुकान दिख रही थी जहां मैं उस बच्चे को छोड़ आया था। पलट के देखा तो दिल धक रह गया छोटा सा प्राणी धीमे कदम से मेरे पीछे चला आ रहा था।
भावनाओं का सैलाव सा आ गया था, अब दिमाग ने सोचना बंद कर दिया, अब दिल की बारी थी, बच्चे को उठा कर फिर से ट्रेकिंग बैग में रख लिया और चल दिया ये सोच के की देखा जायेगा।
क्या है गंगा ढाबा वाली आंटी का कहानी?
वे आगे लिखते हैं कि लंबी कहानी है, जैसे तैसे मैं उससे मसूरी ले आया, रास्ते में कितनी सफाई करनी पड़ी होगी आप समझ सकते हो। कहते हैं ना कि जब इरादा नेक हो तो रास्ते अनेक खुल जाते है, वही हुआ। मसूरी में अकादमी के नीचे एक फेमस ढाबा है और जो भी मसूरी में ट्रेनिंग करने गया होगा उसने वहां जरूर चाय पी होगी मैगी खाई होगी। मैने अपनी समस्या गंगा ढाबा वाली आंटी जी को बताई और कहा कि जब तक मैं ट्रेनिंग में हूं आप इसे रख लो, मैं इसका सारा खर्चा देता रहूंगा।
आंटी ने बड़े प्यार से कहा आप इसे यही छोड़ दो, मैं पूरा खयाल रखूंगी, और आंटी जी ने अपना वादा निभाया, ट्रेनिंग खत्म हुई तो मैंने आंटी जी को लिफाफे में रख कर कुछ खर्चा पानी दिया, लेकिन वो मुस्कराई बोली ये मैं हरगिज नहीं लूंगी , मेरे लिए तो ये मेरे बेटे जैसा हो गया था, मुझे बहुत याद आयेगी इसकी।
एसीपी मेरठ बनने के बाद किया ये काम
चूंकि ट्रेकिंग से लाया था उसका नाम ट्रेकी ही रख दिया। क्या बताऊं कितना प्यार दिया ट्रैकी ने। ASP Meerut बना तो मेरा घर अब उसका घर था। बेमिसाल यादें देकर गया, थोड़े से खाने के बदले में इतना प्यार और समर्पण कोई नहीं से सकता। ट्रैकी ने अपनी उम्र पूरी की और एक दिन चला गया।
पहाड़ पर हर भूटिया को देखकर यही कहानी संस्मरण मेरे जहन में घूम रहे थे। साथ ही मेरे बच्चों की जिद बढ़ती जा रही थी। पापा एक भूटिया चाहिए, चाहिए ही चाहिए, मैं परेशान कि यहां बच्चा कैसे मिलेगा, कैसे इतनी दूर ले जायेंगे , मैंने कहा ठीक है तुम लोग जाकर पता करो, मुझे यकीन था कि थोड़ी देर में खाली हाथ लौट आएंगे। पर हुआ कुछ उल्टा, बच्चे दौड़ते हुए आए और मुझे अपने साथ ले गए और इस तरह हम मेहरा परिवार से मिले। हमने कहा आप बताइए कितने में देंगे, Mrs मेहरा ने कहा कि हमारा बच्चा अच्छे घर में जा रहा है आप ध्यान रखना, हम आपको गिफ्ट देंगे। और जब वह उसको फाइनली मुझे दे रही थी उनकी आंखों में आसूं थे, बड़े प्यार से उसको चूमा और मुझे थमा दिया। लगा की गंगा ढाबा वाली आंटी ही फिर से ट्रैकी मुझे दे रही हैं।
ऐसा लगा की पुराना वाला ट्रैकी फिर से वापस घर आ गया हो। आप दोनों का बहुत बहुत शुक्रिया। आपका ट्रैकी बहुत मस्ती कर रहा है और मैं हर महीने आपको इसकी फोटो भेजता रहूंगा।












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