कौन है ये कलयुग के श्रवण कुमार? जिसने 87 साल की मां को कंधे पर उठाया, फिर पूरी की बरसों पुरानी इच्छा

87 साल की मां अलेकुट्टी पॉल को कंधे पर उठाकर पहाड़ों की सैर पर निकला बेटा रोजन पॉल। पूरी की मां की बरसों पुरानी इच्छा। वीडियो शेयर करते ही सोशल मीडिया पर छाया इस श्रवण कुमार का किस्सा।

kerala Man Story

आपने श्रवण कुमार की कहानी तो सुनी ही होगी। जिसने अपने कंधों पर माता-पिता को उठाकर तीर्थयात्रा कराकर उनकी इच्छा पूरी की थी। लेकिन, इस कलयुग में ऐसे तमाम मामले देखने को मिलते हैं, जिसमें मां-बाप के लाठी पकड़ते ही बच्चे उन्हें किसी बेकार सामान की तरह घर के किसी कोने या वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं। लेकिन, स्विट्जरलैंड के निवासी 52 साल के रोजन पॉल ने कलयुग में भी श्रवण कुमार की तस्वीर को उकेर दिया है।

न ही सिर्फ रोजन पॉल ने अपनी 87 साल की मां अलेकुट्टी पॉल को कंधे पर उठाकर पहाड़ों की सैर कराई। बल्कि, उनका नीलकुरिंजी फूलों को देखने का सपना भी साकार किया, 12 साल में एक बार खिलते हैं। वह ठीक से न तो खड़ी हो पाती थीं और न ही चल पाती थीं। ऐसे में उनके बेटे रोजन पॉल ने उनकी बरसों पुरानी इच्छा को भी पूरा किया। इस दौरान रोजन पॉल के भाई जोसेफ पॉल भी साथ में मौजूद रहे। आइए मिलते हैं कलयुग के श्रवण कुमार से....

कौन है ये कलयुग का श्रवण कुमार ?

स्विट्जरलैंड में रहने वाले रोजन पॉल पेशे से एक वृद्धाश्रम में मेल नर्स के रूप में काम कर रहे हैं। वन इंडिया से खास बातचीत में रोजन पॉल बताते हैं कि 1992 से वृद्धाश्रम में काम कर रहे हैं। 2006 से नाइट शिफ्ट इंचार्ज हैं। यहां उन्होंने कई बुजुर्ग को देखा है, जो किसी न किसी समस्या के कारण वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। हम उनकी सेवा करते हैं और उनका भरपूर ख्याल रखते हैं। हालांकि, रोजन पॉल ने वृद्धाश्रम का नाम बताने से इनकार किया। लेकिन, उन्होंने बताया कि वो यहां साल 2002 से काम कर रहे हैं।

5 साल बाद मिले मां से, पूरी की इच्छा

रोजन पॉल बताते हैं कि कोविड के कारण 5 साल तक भारत लौटने का मौका नहीं मिला। लेकिन, जब लौटा तो मां के बाल सफेद हो गए और वो काफी कमजोर भी दिखीं। ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहीं थीं। इस बीच मां ने नीलकुरिंजी के फूल देखने की इच्छा जाहिर की, जो 12 साल में एक बार ही खिलते हैं। उसके बाद मां को कंधे पर उठाकर कार में बैठाया और केरल के इडुक्की में कालीपारा पहाड़ियों पर एक विशाल क्षेत्र में नीलकुरिंजी के फूलों को दिखाने ले गए। कार से उतारकर कंधे पर मां को सैर कराई। उस वक्त भाई साथ रहे।

मां के दुलारे हैं रोजन पॉल

7 भाई-बहनों में रोजन पॉल 5वें नंबर के हैं। रोजन पॉल बताते हैं कि पिता पीवीपॉल भारतीय सेना में पूर्व सूबेदार थे। 1996 में स्कूटर दुर्घटना में उनका निधन हो गया था। रोजन पॉल के सबसे बड़े भाई मिस्टर जॉर्ज पॉल भी भारतीय सेना (एएमसी) में थे। लेकिन, उन्हें छुट्टी दे दी गई और 1989 में ऑस्ट्रिया में बस गए। उन्हें मैन्चेस्टर में बसाया गया था। लेकिन, पिछले साल अक्टूबर माह में एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। उस वक्त उनकी उम्र 65 थी।

दूसरे नंबर पर बहन अन्नम्मा हैं। वहीं, तीसरे नंबर पर भाई जोसेफ पॉल एक पूर्व सैन्यकर्मी हैं, जो सैन्य इंजीनियर सेवा में तैनात रहे। चौथे नंबर पर भाई ऑगस्टिन पॉल (56) है, जो वियना ऑस्ट्रिया में ओल्ड एज होम में मेल नर्स के रूप में काम कर रहा है। छठे नंबर के भाई सोन सेबेस्टियन पॉल का 1997 में निधन हो गया। सातवें नंबर पर बहन एलिजाबेथ डार्ली(46) हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में नर्स भी हैं।

वायरल हुआ ये वीडियो

दरअसल, रोजन पॉल का अपनी मां अलेकुट्टी पॉल को कंधे पर उठाकर सैर कराते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया। जिसके बाद वीडियो तेजी से वायरल हो गया। इमोशनल स्टोरी वाले इस क्लिप को (@officialhumansofkeralam) ने आगे बढाया। जिसके बाद वीडियो पर लाइक्स की बहार छा गई।

वीडियो में छलका रोजन पॉल का दर्द

वीडियो के साथ कंटेंट में लिखा गया कि सालों पहले, मैं अम्मा को स्विट्जरलैंड ले गया था और उसे पूरे यूरोप में दिखाया था। नई जगहों को देखकर वह बहुत खुश हुई। लेकिन, इसके बाद मुझे कोविड के कारण 5 साल तक भारत लौटने का मौका नहीं मिला। अब जब वापस लौटा हूं तो अम्मा की हालत देखकर मेरा दिल बैठ गया। उनके बाल सफेद हो गए हैं और वो काफी कमजोर भी हो गई हैं। उन्हें ठीक से खड़े होने, चलने में परेशानी हो रही है।

उन्होंने मुझसे कहा कि वो सालों से चर्च नहीं गईं हैं। तब मैंने फैसला किया कि अम्मा को घुमाने ले जाऊंगा। मैंने उन्हें नहलाया और अपनी बहन की मदद से साड़ी पहनाई। फिर उन्हें कंधे पर उठाकर कार में बैठाया और घुमाने ले गया। इस दौरान अम्मा को कंधे पर उठाए हुए दूर तक सैर भी की। मुझे यकीन है कि इससे उन्हें खुशी मिली होगी।

क्या है नीलकुरिंजी ?

आपको बता दें कि नीलकुरिंजी या कुरिंजी दक्षिण भारत के पश्चिम घाट के 1800 मीटर से ऊंचे शोला घास के मैदानों में उगने वाला एक पौधा है। नीलगिरी पर्वत का नाम इन्हीं नीले कुरंजी के पुष्पों के कारण ही मिला है। यह पौधा 12 सालों में एक बार ही फूल देता है।

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