पति चाहे तलाक, पत्नी को रहना है साथ, कोर्ट कंफ्यूज

नई दिल्ली। तलाक के लिए दोनों पक्षों की मंजूरी ही अहमियत रखती है। लेकिन बात उस वक्त उलझ जाती है जब एक तलाक चाहे और दूसरा साथ रहने के लिए लालायित हो। ऐसा ही केस सामने आया, जहां सुप्रीम कोर्ट के सामने भी कानूनी उलझन पैदा हो गई।

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हिंदी वेबसाइट नवभारत की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट उस कंफ्यूज हो गया , जब एक शख्स केरल फैमिली कोर्ट से तलाक के आदेश ले आया और उसकी पत्नी मुंबई के एक कोर्ट से साथ रहने का आदेश। लिहाजा, मामला सुलझाने के लिए कोर्ट ने एक सीनियर एडवोकेट को मशवरा के लिए नियुक्त किया है। मामला यहीं पर खत्म नहीं होता। महिला ने खुद की पैरवी करते हुए बताया कि बांद्रा कोर्ट ने 2 दिसंबर 2009 को उसे साथ रहने आदेश दिया था, जबकि उसके पति ने 2013 को केरल के एक कोर्ट से तलाक का आदेश हासिल कर लिया।

महिला ने बताया कि, केरल के कोर्ट ने सिर्फ एकतरफा बयान सुनकर पति के पक्ष में फैसला सुना दिया। जबकि उसके पति के वकील ने कहा कि उस शख्स ने काफी पहले तलाक की अर्जी दे दी थी। लिहाजा, कोर्ट का तलाक का फैसला बिल्कुल जायज है। महिला ने दलील दी कि, कोर्ट के पास मेरे पति की याचिका के आधार पर हमारी शादी तोड़ने का अधिकार भी नहीं था।

जस्टिस रंजना पी. देसाई और एन.वी. रमन की बेंच ने विरोधाभासी आदेशों को देखते हुए सीनियर ऐडवोकेट वी. गिरी को इस मामले में परामर्शदाता नियुक्त करते हुए समाधान ढूंढने के लिए कहा है। गिरी ने बताया कि सही यही रहेगा कि सुप्रीम कोर्ट पत्नी को केरल हाई कोर्ट में अपील करने की इजाजत दे। लेकिन महिला ने तलाक के आदेश को चुनौती देने से इनकार कर दिया। उसने कहा, 'मैं केरल जाने की इच्छुक नहीं हूं।'

आपको बता दें, इस मामले में पिछले दो सालों से कोर्ट जूझ रहा है। कोर्ट ने गिरी से कहा कि ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिससे दोनों पक्षों के हितों का ध्यान रखा जा सके और खासकर उस महिला का, जिसका इस शादी से बेटा भी है।

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