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कोरोना वैक्सीन से क्या गर्भपात होता है और फ़र्टिलिटी कम हो जाती है?

गर्भावस्था
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'कोविड-19 वैक्सीन के कारण फ़र्टिलिटी पर असर पड़ता है और इससे गर्भपात हो जाता है.' ऐसे झूठे दावे सभी सबूतों के बावजूद अभी भी ऑनलाइन फैलाए जा रहे हैं.

डॉक्टर गर्भावस्था के दौरान किसी चीज़ की सलाह देने से पहले काफ़ी सचेत रहते हैं. इसी कारण अब तक गर्भवती महिलाओं के लिए कोरोना वायरस के टीकाकरण को नज़रअंदाज़ किया गया था.

लेकिन अब सुरक्षा को लेकर काफ़ी डेटा मिलने के बाद इस सलाह को बदल दिया गया है और टीकाकरण को लेकर काफ़ी प्रोत्साहित किया जा रहा है क्योंकि कोविड गर्भावस्था को भी ख़तरे में डाल सकता है.

हमने कुछ बेहद मज़बूत दावों को देखा है और बताया है कि सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावे क्यों ग़लत हैं.

वैक्सीन अंडाशय में जमा हो जाती है?

अंडाशय में वैक्सीन जमा होने के दावे की अफ़वाह एक जापानी शोध को ग़लत तरीक़े से पढ़ने के कारण फैली थी.

इस शोध में चूहों को इंसानों को दी जाने वाली ख़ुराक़ से कई गुना अधिक (1,333 गुना अधिक) ख़ुराक़ दी गई थी.

इंजेक्शन दिए जाने के 48 घंटे के बाद केवल 0.1% डोज़ उनके अंडाशय में पाई गई.

इसके उलट इंजेक्शन देने के एक घंटे के बाद 53% और 48 घंटे के बाद 25% में वैक्सीन सिर्फ़ इंजेक्शन दिए जाने वाली जगह (आमतौर पर इंसानों में जिसे बांह पर दिया जाता है) पर पाई गई.

इसके अलावा एक दूसरी आम जगह लिवर (48 घंटों के बाद 16% में) थी जो कि शरीर से ख़राब पदार्थों को निकालने में मदद करता है.

वैक्सीन वसा का इस्तेमाल करके बनाई गई है जिसमें वायरस के जेनेटिक पदार्थ शामिल होते हैं जो कि शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय कर देते हैं.

वास्तव में जो लोग इस बात को लेकर झूठे दावे फैला रहे हैं वो असल में वसा को ही लेकर है, जो कि अंडाशय में पाई गई है.

इंजेक्शन के 48 घंटों के बाद अंडाशय में वसा का स्तर बढ़ जाता है क्योंकि वैक्सीन इंजेक्शन देने वाली जगह से पूरे शरीर में पहुंचती है.

लेकिन अभी भी ऐसे कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य नहीं हैं जो यह बता सकें कि इसमें वायरस के जेनेटिक पदार्थ भी होते हैं. इसके साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि यह शोध 'लीक' हुआ है जबकि यह तथ्य सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन मौजूद है.

वैक्सीन से हो जाता है गर्भपात?

सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी पोस्ट्स हैं जिनमें गर्भपात की ओर ध्यान दिलाया गया है और इसका हवाला वैक्सीन-मॉनिटरिंग स्कीम के ज़रिए दिया गया है. इनमें अमेरिका की वैक्सीन एडवर्स इवेंट रिपोर्टिंग सिस्टम (VAERS) और ब्रिटेन की येलो कार्ड स्कीम भी शामिल हैं.

टीकाकरण के बाद कोई भी अपने लक्षणों या स्वास्थ्य की स्थिति को इन पर रिपोर्ट कर सकता है. हर कोई इस पर रिपोर्ट करने के बारे में नहीं सोचेगा क्योंकि यह ख़ुद से चयन किया जाने वाला एक डेटाबेस है.

इस डेटाबेस में गर्भपात की घटनाओं को रिपोर्ट किया गया था, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण सामान्य घटनाएं थीं. इसका यह अर्थ नहीं है कि यह टीकाकरण के कारण हुई थी.

एक शोध में यह पाया गया है कि टीकाकरण के बाद जितने लोगों में गर्भपात के मामले सामने आए हैं वो आम जनता में होने वाले गर्भपात की 12.5% की दर के अनुरूप ही हैं.

इंपीरियल कॉलेज लंदन में प्रजनन प्रतिरक्षा विज्ञानी डॉक्टर विक्टोरिया मेल कहती हैं कि सामान्य साइड इफ़ेक्ट्स के मुक़ाबले वैक्सीन के कारण जो दुर्लभ साइड-अफ़ेक्ट्स सामने आते हैं उनके लिए ये रिपोर्टिंग सिस्टम काफ़ी अच्छे हैं, जैसा कि एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन के कारण एक ख़ास तरह के ख़ून के थक्के जमने का पता चला था.

अगर आप टीका लेने वाले लोगों में कोई असामान्य लक्षण पाते हों तो यह चेतावनी जारी करता है.

आम लोगों में सामान्य तौर पर पाए जाने वाले साइड इफ़ेक्ट्स जैसे कि माहवारी में परिवर्तन, गर्भपात और हृदय संबंधी समस्या जैसे लक्षणों पर निगरानी रखने को लेकर ये सिस्टम काफ़ी अच्छे नहीं हैं. डेटा में अगर देखें तो आपको वैक्सीन लेने वालों या न लेने वालों में भी यह लक्षण दिखना आम बात है, इसलिए इस पर चेतावनी भी जारी नहीं की जाती.

अगर हम टीका न लेने वाले लोगों के मुक़ाबले इसमें अधिक गर्भपात के मामले आते हैं तो यह डेटा जांच के संकेत देगा.

कुछ लोगों ने ऐसे ग्राफ़ भी शेयर किए हैं जिनमें पिछले सालों की तुलना में किसी और वैक्सीन या दवा के मुक़ाबले अधिक लोगों ने अपने अनुभव साझा किए हैं.

इससे यह दावा किया गया कि कोविड वैक्सीन कम सुरक्षित है, लेकिन डेटा में उछाल हमें यह नहीं बताता है कि कुल आबादी के एक बड़ी हिस्से का टीकाकरण किया जा चुका है.

गर्भनाल पर हमला कर सकती है वैक्सीन?

विज्ञान के एक शोधकर्ता माइकल ईडन के एक तर्क को काफ़ी साझा किया जा रहा है जिसमें दावा किया गया है कि फ़ाइज़र और मॉडर्ना वैक्सीन में कोरोना वायरस का जो स्पाइक प्रोटीन है वो syncytin-1 प्रोटीन के जैसा है जो कि गर्भनाल विकसित करने में शामिल होता है.

उन्होंने अनुमान लगाया था कि इसके कारण एंटीबॉडीज़ वायरस पर हमले के साथ-साथ गर्भावस्था की प्रक्रिया पर भी हमला कर सकती हैं.

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड वैक्सीन के कारण फ़र्टिलिटी पर नुक़सान के दावे की थ्योरी इसी से पैदा हुई थी.

वास्तव में syncytin-1 और कोरोना वायरस का स्पाइक प्रोटीन उसी तरह से एक जैसे प्रोटीन हैं जैसे कि बाकी होते हैं. अगर शरीर इतनी आसानी से इसमें उलझ सकता है तो वो हर बार संक्रमण होने पर अपने ही अंगों पर हमला करेगा और एंटीबॉडी बनाएगा.

लेकिन अब ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं जो इस थ्योरी को झूठा साबित करते हैं.

अमेरिका के फ़र्टिलिटी डॉक्टर रेंडी मॉरिस इन दावों की ख़ुद ही जांच करना चाहते थे तो इसके लिए उन्होंने अपने यहां आईवीएफ़ ट्रीटमेंट के लिए आने वाले मरीज़ों की निगरानी करनी शुरू की. वो यह जानना चाहते थे कि क्या एक सफल गर्भावस्था पर टीकाकरण का कोई असर पड़ता है.

डॉक्टर मॉरिस ने टीका लगवा चुकी, बिना टीके वाली और पहले कोरोना से संक्रमित हुई 143 महिलाओं पर शोध किया और पाया कि उनकी गर्भावस्था की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई.

यह शोध छोटा है, लेकिन इसमें दूसरे बड़े साक्ष्यों के हिस्से मौजूद हैं.

डॉक्टर मॉरिस इस ओर भी लोगों का ध्यान दिलाते हैं कि इसको लेकर कोई विस्तारपूर्वक जवाब नहीं देता है कि अगर वैक्सीन से पैदा हुई एंटीबॉडी फ़र्टिलिटी को नुक़सान पहुंचा सकती है तो एक सामान्य संक्रमण से पैदा होने वाली एंटीबॉडी ऐसा क्यों नहीं करेगी.

वास्तव में समस्या यह है कि वैज्ञानिक लोगों को संतुष्ट करने के लिए साक्ष्य मुहैया कराने की कोशिश कर रहे होते हैं और जब तक वे अपनी जांच को रिपोर्ट करते हैं तब तक सोशल मीडिया पर लोग दूसरे मुद्दे पर पहुंच चुके होते हैं.

डॉक्टर मॉरिस कहते हैं, "अफ़वाहों के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि आप उसे जल्द से जल्द ख़ारिज करे दें, तब आप उस गोलपोस्ट को बदल देते हैं."

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