कोरोना वायरस: कैसे काम करती है कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग? कितना सुरक्षित है इसमें हमारा डेटा
ब्रिटेन में तेज़ी से फैल रहे कोरोना वायरस संक्रमण को क़ाबू करने के लिए अब वहां के लाखों लोगों को अपनी गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए कहा जाएगा.
उन्हें जल्दी ही निर्देश दिए जा सकते हैं कि वे कहां जा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं इस पर ख़ुद ही नज़र रखें.
सरकार संक्रमण से पीड़ित लोगों के संपर्कों का पता लगाने यानी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए 18 हज़ार लोगों को तैनात करने जा रही है. इस प्रक्रिया में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को शामिल होने को कहा जाएगा.
भारत में भी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए तकनीक की मदद ली जा रही है. भारत सरकार ने दो अप्रैल को आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया है. यह ऐप कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है. आरोग्य सेतु ऐप 11 भाषाओं में उपलब्ध है. इसके ज़रिए लोग अपने आसपास कोरोना के मरीज़ों के बारे में भी जानकारी हासिल कर सकते हैं. सरकार की ओर से जारी नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया है कि ये ऐप यूजर्स की निजता को ध्यान में रखकर बनाया गया है.
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इसके अलावा पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा की सरकारों ने ऐसे मोबाइल ऐप शुरू किए हैं जिनके ज़रिए कोरोना वायरस कोविड 19 से संबंधित जानकारियां हासिल की जा सकती हैं.
साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि इन ऐप के ज़रिए कोरोना संक्रमित लोगों और होम क्वारंटीन पर रखे गए लोगों पर नज़र रखी जा रही है.
लेकिन आख़िर कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग क्या है? ये कैसे काम करता है? क्या आपको इस प्रक्रिया में शामिल होना ज़रूरी है. इसमें शामिल होने की स्थिति में आपके डेटा का क्या होगा?
क्या है कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग?
दरअसल कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का इस्तेमाल संक्रामक बीमारियों को फैलने की गति को कम करने के लिए किया जाता है.
अमूमन इसे सेक्शुअल हेल्थ क्लीनिकों में इस्तेमाल किया जाता है, जहां डॉक्टर संक्रमण के शिकार रोगियों से अपने संपर्क में आए लोगों से कॉन्टैक्ट करने को कहते हैं.
लेकिन कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के मामले में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का मक़सद उन लोगों का पता लगाना है, जो कोरोना वायरस से संक्रमित शख़्स के संपर्क में लंबे वक़्त तक रहे हैं, ताकि ऐसे लोगों को ख़ुद को आइसोलेट (Self Isolate) करने को कहा जा सके.
कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के दोस्तों और परिवार के लोगों को फ़ोन करके इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है. इसके लिए ऑटोमेटेड लोकेशन ट्रैकिंग मोबाइल ऐप का भी सहारा लिया जाता है.
हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर और जर्मनी समेत कोरोना वायरस से प्रभावित कई देशों में कॉन्टैक्ट ट्रैकिंग का इस्तेमाल पहले से ही हो रहा है.
ब्रिटेन भी अब मई के मध्य में कॉन्टैक्ट ट्रैकिंग ऐप और फ़ोन टीम के इस्तेमाल की योजना बना रहा है. ब्रिटेन को उम्मीद है कि कई हफ़्तों की सोशल डिस्टेंसिंग से संक्रमण के नए मामलों को ट्रैक करना अब आसान होगा.
ब्रिटेन में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का स्वरूप क्या होगा?
ब्रिटेन में इसके लिए 18 हज़ार लोगों की जो टीम बनेगी, उसमें 3 हज़ार सिविल सर्वेंट और हेल्थ वर्कर होंगे.
इनमें 15 हज़ार लोग कॉल हैंडलर होंगे यानी वे कोरोना वायरस मरीज़ों से उनकी हाल की गतिविधियों और संपर्कों के बारे में पूछेंगे. इसकी जानकारी लेने के बाद वे मरीज़ के संपर्क में आए लोगों से कॉन्टैक्ट करेंगे.
इसके लिए ट्रैसिंग ऐप और टेलीफ़ोन सिस्टम का मिला-जुला इस्तेमाल किया जाएगा. अगले कुछ सप्ताहों में इसे स्मार्टफ़ोन में डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध करा दिया जाएगा.
जैसे ही इस फ़्री ऐप के यूजर आपस में संपर्क करते हैं वैसे ही यह ब्लूटूथ का इस्तेमाल कर इसे ट्रैक कर लेता है. ट्रैकिंग शुरू होते ही इसका ऑटोमेटिक कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग प्रोसेस काम करना शुरू कर देता है.
यह कोरोना वायरस के लक्षण वाले यूजर पर है कि वह ऐप के ज़रिए यह जानकारी एनएचएस तक पहुंचने दे. उनकी जानकारी के बाद उन यूजर्स को ऐप एक अनाम अलर्ट भेज सकता है, जिनके संपर्क में ट्रैक किए जाने वाले यूजर रहे हैं.
इसके बाद ट्रैक किए जा रहे यूजर्स के संपर्क में आने वाले लोगों को क्वॉरंटीन में जाने के लिए कहा जा सकता है या उन्हें कोरोना टेस्ट की सलाह दी जा सकती है.
जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, उनकी कलाई पर ब्लूटूथ वाली पट्टी बांधी जा सकती है. वैसी ही पट्टी जो दूसरे देशों में लॉकडाउन के नियम तोड़ने वाले लोगों को रोकने लिए बांधी जाती है.
क्या इससे लॉकडाउन ख़त्म होने में मदद मिलेगी?
कई देशों में लॉकडाउन ख़त्म करने या इसमें छूट देने में कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग काफ़ी मददगार साबित हुई है. हालांकि इसके साथ और भी क़दम उठाए गए हैं.
दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान कभी भी लॉकडाउन लागू नहीं किया गया. दरअसल वहां शुरू से ही बड़े पैमाने पर ट्रेसिंग चालू हो गई थी. साथ ही बड़ी तादाद में लोगों की टेस्टिंग भी शुरू हो गई थी.
वहां लोगों से यह कहा गया कि वे याद करके बताएं कि वे कहां-कहां गए थे. इसके लिए क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन, सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल फोन ट्रैकिंग का इस्तेमाल किया गया.
इन सभी तरीक़ों के ज़रिए यह पता किया गया कि वे कहां-कहां गए थे. एक वक़्त वहां हर दिन 900 केस आ रहे थे लेकिन अब हर दिन बहुत कम मामलों का पता चल रहा है.
अगर ब्रिटेन में इस तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा तो लॉकडाउन को हल्का करने में यह काफ़ी हद तक मददगार साबित होगा. हालांकि ब्रिटेन में लोग ख़ुद को किस हद तक ट्रैक करने की इजाज़त देंगे, इसमें थोड़ा संदेह ही है.
ब्रिटेन में सरकार ने महामारी की शुरुआत में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की कोशिश शुरू कर दी थी ताकि संक्रमण के मामलों को फैलने से पहले ही काबू किया जा सके.
अब जबकि लॉकडाउन की वजह से लोगों का बाहर निकलना कम हो गया है तो संक्रमण के नए मामलों को ट्रैक करना अधिक आसान होगा.
फ़ोन ट्रेसिंग काफ़ी मेहनत और समय लेने वाला काम है. आयरलैंड में ट्रेसर हर संक्रमित शख्स से जुड़े 40 लोगों को फ़ोन कर रहे हैं.
मोबाइल ऐप से यह काम आसान हो जाता है. लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसका इस्तेमाल करें तभी वायरस को काबू किया जा सकता है.
एनएचएस को सलाह देने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए 80 फ़ीसदी स्मार्ट फ़ोन यूजर्स (कुल आबादी के 60 फ़ीसदी) को इसका सक्रिय तौर पर इस्तेमाल करना होगा. वैसे देखा जाए तो ब्रिटेन के 67 फ़ीसदी स्मार्ट फ़ोन यूजर वॉट्सऐप डाउनलोड कर चुके हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को लगता है कि अगर उनमें कोरोना वायरस संक्रमण के लक्षण दिख रहे हैं तो उन्हें ईमानदारी से एनएचएस को इसकी जानकारी देनी चाहिए.
सरकार मेरे डेटा का क्या करेगी?
सरकार की इस योजना से हर कोई ख़ुश नहीं क्योंकि लोगों के डेटा तक थर्ड पार्टी की पहुंच होगी. मानवाधिकार संगठन लिबर्टी ने कहा है कि सरकार को डेटा प्राइवेसी के जोखिम के सवाल को गंभीरता से लेना होगा.
वह लोगों को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकती है कि वे ऐप इन्स्टॉल करने के बाद ही लॉकडाउन के दायरे से बाहर या काम पर जा सकते हैं.
हालांकि हेल्थ सर्विस के डिज़िटल डेवलपमेंट विभाग एनएचएसएक्स ( NHSX) ने कहा है कि लाखों लोग इस ऐप पर भरोसा जताएंगे और इसकी सलाहों का पालन करेंगे.
इस ऐप के ज़रिए इकट्ठा जानकारी सिर्फ़ स्वास्थ्य और रिसर्च उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होंगी. इसके अलावा आप चाहें तो ऐप को किसी भी वक्त डिलीट कर सकते हैं.
ब्रिटेन का यह ऐप एक केंद्रीकृत मॉडल का इस्तेमाल करेगा. यानी इसकी मैचिंग प्रोसेस कंप्यूटर सर्वर पर ही होगा.
हालांकि ऐपल और गूगल ने एक डिसेंट्रलाइज्ड यानी विकेंद्रित मॉडल सुझाया है. जब लोग हैंडसेट पर बात करेंगे तो इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
इन दिग्गज टेक कंपनियों का कहना है कि उनके ऐप का वर्जन हैकरों को डेटा हैक नहीं करने देगा और न ही सरकार,प्रशासन या कोई दूसरी एजेंसी कंप्यूटर सर्वर लॉग का इस्तेमाल लोगों को ट्रैक करने या उन्हें पहचानने में कर सकती है.
लेकिन एनएचएक्स (NHSX) का कहना है कि इसके सेंट्रलाइज्ड सिस्टम से इस बात का गहराई से पता चल सकेगा कि आख़िर कोविड-19 कैसे फैल रहा है. इससे ऐप को भी ज़्यादा कारगर बनाने में मदद मिलेगी.












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