VIDEO: सैकड़ों साल पहले समुद्र में मिली थी जलपरी, अमर होने के लिए लोग खा गए, फिर मंदिर में रखी ममी
नई दिल्ली: पृथ्वी पर जीवों की करोड़ों प्रजातियां हैं, जिनके बारे में इंसानों को भी ठीक से नहीं पता। कई प्रजातियां तो हजारों साल पहले खत्म हो गईं, लेकिन आज भी शोध के दौरान उनके अवशेष मिलते हैं। करीब 280-90 साल पहले भी एक जीव का अवशेष मिला था, जिसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है, लेकिन इसके बारे में आज तक वैज्ञानिकों को कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई। (वीडियो-नीचे)

जापानी तट के पास मिली थी
जिस जीव की हम बात कर रहे उसे लोग जलपरी कहते हैं। उसका चेहरा इंसानों की तरह था, जबकि निचला हिस्सा मछली की तरह। उसके नुकीले दांत थे और दो हाथ भी, जबकि माथे वाले हिस्से पर भी काफी बाल थे। दावा है कि साल 1736 और 1741 के बीच जापानी तट से कुछ दूर प्रशांत महासागर में इसे पकड़ा गया था। इसके बाद इसे असाकुची शहर के एक मंदिर में रखा गया।

मांस खाने वाला होगा अमर?
इसको लेकर अजीबोगरीब कहानियां हैं। कुछ लोगों का दावा है कि ये जलपरी है, जिसके मांस को खाने से इंसान अमर हो जाता है। इसी वजह से उस दौरान लोगों ने इसके मांस का सेवन किया था। अभी भी विशेष लेप लगाकर इस ममी को रखा गया है। कुराशिकी विज्ञान और कला विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इसके रहस्यों को जानने के लिए ममी का सिटी स्कैन किया है।

800 साल तक जिंदा रही महिला
इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हिरोशी किनोशिता ने कहा कि ममी का धार्मिक महत्व हो सकता है। जापानी संस्कृति में जलपरियों से जुड़ी कई कहानियां हैं। इसमें कहा जाता है कि अगर आपने किसी जलपरी का मांस खा लिया, तो आपकी मौत कभी भी नहीं होगी। जापान के कई हिस्सों में एक कहानी प्रचलित है कि एक महिला ने गलती से जलपरी का मांस खा लिया था, जिसके बाद वो 800 साल तक जीवित रही। कुछ लोग इसे कोरोना महामारी से भी जोड़ते हैं। उनका दावा है कि जलपरी ने एक संक्रामक बीमारी की भविष्यवाणी की थी।

मालिक ने कही थी ये बात
ममी के पूर्व मालिक ने 1903 में एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा कि कोच्चि प्रान्त के पास समुद्र में मछली पकड़ने वाले जाल में एक जलपरी को पकड़ा गया। इसे पकड़ने वाले मछुआरे नहीं जानते थे कि ये जलपरी है, लेकिन वो इसे ओसाका ले गए और इसे असामान्य मछली की तरह बेच दिया। मेरे पूर्वजों ने इसे खरीदा और इसे पारिवारिक खजाने के रूप में रखा। हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि ममी असाकुची के एनजुइन मंदिर में कैसे या कब आई, लेकिन पुजारी का कहना है कि करीब 40 साल पहले इसे यहां पर लोगों को दिखाने के लिए रखा गया था।

डीएनए टेस्ट से पता चलेगी सच्चाई
शोध में शामिल एक एक्सपर्ट के मुताबिक उन्हें नहीं लगता ये जलपरी है। उनको लगता है कि इसे निर्यात करने के लिए जानवरों की मदद से बनाया गया था। फिलहाल वो सीटी स्कैन या फिर डीएनए टेस्ट के जरिए इसकी पहचान करेंगे।












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