बिहार के इस गांव को क्यों दी जा रही है 'धरती के नर्क' की संज्ञा, जानिए पूरा मामला
बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था लचर होने की ख़बर आए दिन देखने को मिल रही है। वहीं अब एक ऐसी ख़बर सामने आई है जिसे पढ़ कर आपकी रूह कांप जाएगी।
पटना, 4 अप्रैल 2022। बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था लचर होने की ख़बर आए दिन देखने को मिल रही है। वहीं अब एक ऐसी ख़बर सामने आई है जिसे पढ़ कर आपकी रूह कांप जाएगी। रोहतास ज़िला में एक ऐसा गांव है जहां इंसान से लेकर जानवर तक के बच्चे गर्भ में ही दिव्यांग हो जाते हैं। बच्चे जब पैदा होते हैं तो उनकी हड्डियां आड़ी-तिरछी रहती हैं यही बच्चों की जन्मजात दिव्यांगता का कारण बनती है। इस तरह के बद से बदतर हालात की वजह से लोग इस गांव में अपनी बच्चियों की शादी तक नहीं कर रहे हैं। ज़्यादातर लोग इस गंभीर बिमारी की वजह से यहां से पलायन तक करने को मजबूर हो चुके हैं। इन्ही सब वजहों से यहां के लोग इस गांव को धरती का नर्क कहने से नहीं हिचकते हैं।

पानी में फ्लोराइड होने की वजह से बढ़ रही बीमारी
सासाराम अनुमंडल बरुआ गांव ( शिवसागर) के ज्यादातर लोगों दिव्यांग हैं। उनके दिव्यांग होने की सबसे बड़ी वजह पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज़्यादा है। बरुआ गांव में ऐसे हालात बन चुके हैं कि यहां इंसान से लेकर जानवर गर्भ में अपंग हो जा रहे हैं। पिछले पांच दशकों से लोग यहां के लोग इस खतरनाक बिमारी से जूझते हुए ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। यहां के पानी में फ्लोराइड मिला होने की वजह से लोगों की हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं। बचपन में कुछ लोग ठीक-ठाक थे भी लेकिन वक्त के साथ ऐसे हालात बने की कई लोग विकलांग हो गए। वहीं कई लोगों का चलना फिरना भी दुशवार हो गया।

वक़्त से पहले बूढ़े हो रहे हैं युवा
इस गांव (बरुआ) से रामराज प्रसाद फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ियों में शुमार किए जाते थे लेकि वक्त के साथ अब उनका हाल ऐसा हो गया है कि वह अपने पैरों पर खड़े तक नहीं हो पा रहे हैं। इन गांव के लोगों पर क़ुदरत का क़हर इस तरह से बरपा रही है कि वक़्त से पहले कई लोग बूढ़े होते चले जा रहे हैं। वहीं बच्चों का उम्र होने के बावजूद शारीरिक विकास नहीं हो पा रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि रेशम पांच साल की बच्ची है वह गर्भ में ही विकलांग हो गई थी। अब उसका ग्रोथ भी नहीं हो पा रहा है। कुसुम देवी की बेटी रेशम की उम्र 5 साल है लेकिन देखने में वह छह महीने की लगती है।

बहुत ज्यादा है दिव्यांग बच्चों की तादाद
बरुआ गांव में दिव्यांग बच्चों की तादाद बहुत ज्यादा है, इनमे तो बहुत से गर्भ से ही अपंग थे। कुछ बच्चे ठीक-ठाक जन्म ले भी लेते हैं तो कुछ सालों के बाद दिव्यांगता के शिकार बन जाते हैं। वहीं बच्चों के इलाज की सुविधा भी गांव में नहीं है। इसके साथ ही डॉक्टरों का ये कहना है कि पानी में सुधार नहीं होगा तो इलाज करवाने का कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि पानी पीने के बाद बच्चों में फिर से बिमारी पनपने लगा जाएगी। ग़ौरतलब है कि इस गांव में बड़े पैमाने पर वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया था। लेकिन सही से रखरखाव नहीं होने की वजह से वाटर फ्यूरीफिकेशन प्लांट कबाड़ बन कर रह गया है और यहां के निवासी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।

पलायन कर रहे हैं बरुआ के स्थानीय निवासी
शिवसागर के बरुआ गांव में पर्याप्त मात्रा चापाकल तथा नल जल योजना के नल लगे हैं, लेकिन पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से स्थानीय लोग इसी पानी को पी रहे हैं। ग्रामीणों ने कई बार आला अधिकारियों से वाटर प्लांट सुधार के लिए गुहार लगाई लेकिन आज तक सरकार की तरफ़ से कोई भी मदद के लिए आगे नहीं है। वहीं जो लोग थोड़ा बहुत भी पैसे से सक्षम है वह इस गांव को छोड़ चुके हैं और कई लोगों का लगातार पलायन भी जारी है। गरीब तबके के लोग जो पलायन नहीं कर पा रहे हैं तो वह बरुआ गांव में ही दूषित पानी पीकर कई पीढ़ी दर पीढ़ी बीमारी से जूझते हुए नर्क से भी बदतर ज़िदंगी जीने को मजबूर हैं।
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