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जानिए कौन हैं छठी मइया और क्यों मनाया जाता है छठ का महापर्व?

पटना। लोक आस्था का महापर्व छठ की शुरुआत नहाय-खाय से हो चुकी है। प्रदेश भर में छठ व्रती आज नहाए खाए से छठ माता की आराधना में लग चुकी हैं तो दूसरी तरफ छठ पर्व को लेकर राज्य भर में श्रद्धालुओं की श्रद्धा और भक्ति देखने को मिल रही है। आज से 4 दिनों तक चलने वाला आस्था का महापर्व छठ को लेकर राज्यभर में काफी उत्साह का माहौल है। मंगलवार को छठ व्रती नहाने के बाद शुद्ध घी में बना भोजन ग्रहण करती है और कल खरना के बाद उगते और डूबते हुए सूरज को नमस्कार कर भगवान से कुशल मंगल रहने की कामना करती है। आइए अब हम आपको बताते हैं इस छठ पर्व को लेकर कुछ खास बातें। आखिरकार क्यों उगते और डूबते हुए सूरज को नमस्कार किया जाता है और पूरे प्रदेश में क्यों इस पर्व को आस्था का पर्व माना जाता है।

छठी मइया और सूरज की पूजा

छठी मइया और सूरज की पूजा

सबसे पहले आपको बताते चलें कि छठ पर्व हर साल दो बार मनाया जाता है जिसमें छठी मइया और सूरज की पूजा होती है। पहली बार इसे चैत महीने में मनाया जाता है तो दूसरी बार कार्तिक मास में। कार्तिक महीने में होने वाली इस महापर्व का विशेष महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि हिंदू धर्म में कोई भी पर्व की शुरुआत स्नान करने के बाद होती है और इस पर्व की भी शुरुआत नहाय खाय से ही होती है। नहाय खाय के दिन सबसे पहले छठ व्रती पूरे घर को साफ सफाई करने के बाद शुद्ध गंगा जल से स्नान करती हैं, फिर पूरी तरह साफ कपड़े पहन कर छठ माता की प्रसाद बनाती हैं जिसमें चने की दाल, लौकी की सब्जी और बासमती चावल तथा घी और सेंधा नमक अहम होता है। इससे बने हुए प्रसाद को वह भगवान गणेश और सूरज देव को भोग लगाते हुए ग्रहण करती हैं। इसके बाद पूरे परिवार को इसे प्रसाद के रूप में दिया जाता है। चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व में घर में किसी भी तरह की अशुद्धि नहीं होती है।

चार दिनों का महापर्व

चार दिनों का महापर्व

सबसे पहले आपको बताते चलें कि 24 अक्टूबर को नहाय खाय की शुरुआत हो चुकी है जिसमें छठ व्रती गंगा जल में स्नान कर शुद्ध कपड़े पहनकर प्रसाद बनाती हैं और इसे भगवान को भोग लगाते हुए पूरे परिवार को प्रसाद के रूप में देती हैं। नहाय खाय के बाद दूसरे दिन 25 अक्टूबर को शुरू होता है खरना जिसमें छठ व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखती है और शाम को गंगा जल से स्नानकर नए कपड़े पहनते हुए मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाती हैं जिसमें शुद्ध दूध में खीर और घी में बनी हुई रोटी भगवान पर भोग लगाया जाता है। फिर हवन करने के बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है तथा इस प्रसाद को सभी लोगों को दिया जाता है खासकर उन लोगों को जिनके घर में छठ का व्रत नहीं होता है। इसके बाद छठ व्रती निर्जला रहकर 26 अक्टूबर को डूबते हुए सूरज को नमस्कार करने के लिए पूरे परिवार के साथ छठ घाट पर जाकर लोक गीत के साथ नदी के किनारे फल-फूल और पकवान लेकर छठी मइया की पूजा करती हैं और डूबते हुए सूरज को अर्घ्य देती हैं। फिर चौथे दिन सुबह 27 अक्टूबर को व्रती उगते हुए सूरज अर्घ्य देकर छठी मइया और दीनानाथ से आशीर्वाद मांगती हैं। जिसके बाद वह अपना निर्जला व्रत तोड़ती हैं । इस पर्व को लेकर ऐसा कहा जाता है कि यह लोगों की जिंदगी में खुशियों और उनकी आस्था की प्रतीक है जिसे एक साथ पूरा परिवार मिलकर मनाता है।

षष्ठी देवी को कहते हैं छठी मइया

षष्ठी देवी को कहते हैं छठी मइया

आपको बताते चलें कि इस पर्व को यूं तो आस्था का पर्व कहा जाता है लेकिन लोगों के मन में कई तरह के सवाल खड़े हो जाते हैं आखिरकार इस महापर्व का नाम छठ क्यों पड़ा? कौन थी छठी मइया? इस पर्व का नाम छठ है लेकिन इसमें सूरज की ही क्यों उपासना की जाती है? तो आइए आज हम आपको बताते हैं इस पर्व में क्यों सूरज की उपासना की जाती है। अगर पौराणिक ग्रंथों की माने तो श्‍वेताश्‍वतरोपनिषद् में बताया गया है कि परमात्‍मा ने सृष्‍ट‍ि रचने के लिए स्‍वयं को दो भागों में बांटा जिसमें दाहिने भाग में पुरुष और बाएं भाग में प्रकृति का रूप सामने आया। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में बताया गया है कि सृष्‍ट‍ि की अधिष्‍ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्‍ठी है और पुराण के अनुसार के सभी देवी मनुष्य की रक्षा करती है तथा उन्हें लंबी आयु प्रदान करती हैं।

सूरज देव को अर्घ्य

सूरज देव को अर्घ्य

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार हर देवी- देवता की पूजा के लिए अलग-अलग तिथि निर्धारित की गई है जिसमें गणेश की पूजा चतुर्थी को तो विष्णु की पूजा एकादशी को किया जाता है। उसी तरह सूरज की पूजा सप्तमी को की जाती है। सूर्य सप्‍तमी, रथ सप्‍तमी जैसे शब्‍दों से यह स्‍पष्‍ट है लेकिन छठ में सूर्य का षष्‍ठी के दिन पूजन अनोखी बात है। सूर्यषष्‍ठी व्रत में ब्रह्म और शक्‍त‍ि दोनों की एक साथ पूजा की जाती है इसलिए छठ व्रत करने वालों को दोनों की पूजा का फल मिलता है, यही बात इस पूजा में सबसे खास मानी जाती है।

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