ठाकुर-ब्राह्मण विवाद को भड़काने के पीछे कौन, बिहार को 1990 के दौर में ले जाने की साजिश?
लालू यादव की पार्टी आरजेडी के सांसद मनोज झा ने संसद के विशेष सत्र में 'ठाकुर का कुआं' कविता पढ़कर पार्टी की जो भी राजनीतिक हित साधने की कोशिश की हो, लेकिन उसके चलते बिहार में एक बार फिर से जातीय तनाव वाला माहौल पैदा होने की आशंका बढ़ गई है।
झा ने भले ही 'ठाकुर' शब्द का इस्तेमाल कथित सामंतवाद पर निशाना साधने के लिए किया हो, लेकिन पूर्व सांसद और गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया की हत्या के गुनाहगार आनंद मोहन ने इसे राजपूत जाति से जोड़कर अपनी विलुप्त हो चुकी राजनीति में नई जान फूंकने की कोशिश की है।

राजनीति चमकाने के लिए बिहार में बवाल की साजिश?
अब क्योंकि राजद सांसद 'झा' (मैथिल ब्राह्मण) हैं, इसलिए आनंद मोहन (राजपूत) को अपनी सियासी दाल गलाने में आसानी महसूस हो रही है। हालांकि, आज की तारीख में बिहार में राजपूतों के बीच उनकी कितनी पकड़ रह गई है, यह कह पाना फिलहाल मुश्किल है। वैसे एक तथ्य ये है कि आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद खुद ही लालू यादव की पार्टी के ही विधायक हैं।
इसके अलावा एक तथ्य ये भी है कि आनंद मोहन जेडीयू-आरजेडी सरकार का आशीर्वाद पाकर ही जेल से जल्द छूटकर बाहर निकले हैं। इन सबके बीच सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि अभी बिहार की राजनीति में इन दोनों सवर्ण जातियों का झुकाव ज्यादातर बीजेपी के पक्ष में माना जाता है और ये दोनों ही राजद के स्वाभाविक वोटर नहीं माने जाते।
मनोज झा को लालू का साथ
जहां तक मनोज झा की बात है तो अब खुद लालू यादव उनके साथ खड़े हो गए हैं। उन्होंने आनंद मोहन के बारे में कहा है कि उनकी 'जितनी बुद्धि है उतना ही बोलेंगे..... अपनी अक्ल और शक्ल देखें...'। जब विवाद बढ़ा है तो पार्टी ने आनंद मोहन के बेटे और पार्टी विधायक चेतन आनंद को शांत रहने की हिदायत दी है। लालू ने उनकी अक्ल पर भी सवाल उठाने की कोशिश की है।
विवाद के पीछे राजद का हाथ- बीजेपी नेता
आगे बढ़ने से पहले एक बात और तथ्यात्क है कि आनंद मोहन को 'ठाकुर का कुआं' कविता में राजपूत जाति खोजने में कई दिन लगे हैं। वनइंडिया ने इस विवाद की वजहों को लेकर बीजेपी के लोगों से बात की तो उनका कहना है कि इसके पीछे सत्ताधारी राजद के नेताओं का हाथ है।
'लालू यादव की रणनीति है कि जातीय उन्माद पैदा करना'
मसलन, बिहार बीजेपी के नेता आनंद झा ने कहा है, 'ये विवाद मनोज झा और आनंद मोहन का नहीं है.....आरजेडी योजनाबद्ध तरीके से सनातन समाज में मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रही है। जब लालू-राबड़ी की सरकार थी, तो जातीय उन्माद पैदा किया गया था....कई नरसंहार हुए थे......यह आरजेडी और लालू यादव की रणनीति है कि जातीय उन्माद पैदा करके, जातियों में लड़ाकर.....फूट डालो और शासन करो....अपनी सत्ता पर काबिज होने की ये योजना है।'
उन्होंने ये भी कहा कि 'अभी दुनिया में जो सनातन के संरक्षण की बात हो रही है, गौरव गान किया जा रहा है, उस चीज को कमजोर करने के लिए ये सब चल रहा है....वामपंथियों की तो ये सब योजना रही है.....'
मनोज झा ब्राह्मणों के नेता नहीं- भाजपा के ब्राह्मण नेता
वहीं भाजपा के एक और ब्राह्मण नेता ने नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर बताया है कि 'लालू यादव ने मनोज झा को इसी तरह से समाज में विवाद पैदा करने कि लिए तो रखा ही है।' उन्होंने कहा, 'मनोज झा कभी भी ब्राह्मण नेता नहीं रहे हैं और अभी भी नहीं हैं। पूरा ब्राह्मण समाज उनसे नफरत करता है। अगर इनके खिलाफ ठाकुरों का संघर्ष शुरू हुआ तो सारा ब्राह्मण समाज ठाकुरों के साथ खड़ा होगा....।'
अगर बिहार में 1990 की दशक और 2000 की शुरुआती दौर की बात करें तो कई जातीय नरसंहार हुए थे, जिसमें सैकड़ों लोगों की जानें गई थीं। कुछ कुख्यात नरसंहारों में सेनारी गांव, बथानी टोला, मियांपुर, शंकर बिगहा और लक्ष्मणपुर बाथे जैसों की चर्चा वैश्विक स्तर तक पर भी हो चुकी है।












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