Vijay Sinha vs JDU: NDA में 'साफ बोल' बनाम 'गहरी खामोशी' का खेल, क्या टूट की कगार पर है गठबंधन?
Vijay Sinha vs JDU: बिहार में एक बार फिर सत्ताधारी NDA के भीतर आपसी खींचतान ने जोर पकड़ा है। उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा की तीखी टिप्पणियां और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुप्पी, यह विरोधाभास अब महज़ गठबंधन की 'आंतरिक बात' नहीं रह गई है, बल्कि विधानमंडल के मानसून सत्र से बाहर निकलकर सीधे चुनावी राजनीति के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।
सियासी गलियारों में यह चर्चा का विषय बन चुकी है। वहीं सवाल उठ रहे हैं कि क्या विजय सिन्हा गठबंधन धर्म की याद दिला रहे हैं या दबाव की राजनीति कर रहे हैं? नीतीश कुमार की चुप्पी रणनीतिक है या यह संकेत है कि जेडीयू अब BJP के आरोपों से थक चुकी है?

गठबंधन अब 'सहज' नहीं
इस बार बहस सिर्फ एक कार्यक्रम में विधायक प्रहलाद यादव को नहीं बुलाने या ग्लोबल टेंडरिंग की प्रक्रिया को लेकर नहीं है, बल्कि BJP के भीतर उपमुख्यमंत्री पद पर बैठे नेता की जेडीयू के मंत्रियों से नाराज़गी और बार-बार सार्वजनिक रूप से उठाई जा रही आपत्तियां इस ओर इशारा कर रही हैं कि गठबंधन अब 'सहज' नहीं रहा।
जेडीयू नेता अशोक चौधरी के जवाब ने जहां बीजेपी विधायकों को नाराज किया, वहीं विजय सिन्हा का दो टूक लहजा ने इसे और धार दे गया। तेजस्वी यादव ने भ्रष्टाचार और 'हर घर नल का जल' घोटाले की बात उठाकर इस तकरार को विपक्षी हथियार बना दिया है। 2025 विधानसभा चुनाव में एनडीए को इसका नुकसान हो सकता है।
NDA में पहले भी कई बार दरार की आहटें मिल चुकी हैं:
मार्च 2021: विशेष सशस्त्र पुलिस अधिनियम पर विधानसभा में हंगामा
मार्च 2022: सरस्वती पूजा पर कोविड उल्लंघन को लेकर तनातनी
अगस्त 2022: महागठबंधन के साथ नीतीश की नई सरकार, विजय सिन्हा का स्पीकर पद से इस्तीफा
दिसंबर 2024: विजय सिन्हा की "अटल का सपना अधूरा" टिप्पणी
तेजस्वी के लिए संकेत क्या हैं?
NDA की अंतर्कलह तेजस्वी यादव और महागठबंधन के लिए एक राजनीतिक अवसर बनती दिख रही है। तेजस्वी जिस तरह भ्रष्टाचार और नीतीश की चुप्पी को निशाने पर ला रहे हैं, वो उनकी "साफ-साफ और उग्र" विपक्षी रणनीति को दिखाता है। अगर NDA की यह खींचतान सार्वजनिक रूप लेती रही, तो तेजस्वी को सत्ताविरोधी लहर की लहरतार गति मिल सकती है।
किसका नफा, किसे नुकसान?
विजय सिन्हा की मुखरता और नीतीश कुमार की खामोशी अब NDA के भीतर अनबन का सार्वजनिक प्रदर्शन बन चुकी है। तेजस्वी यादव के लिए यह एक सुनहरा मौका है, लेकिन सवाल है, क्या NDA समय रहते इस टकराव को संभाल पाएगा या 2025 का चुनावी मैदान महागठबंधन के लिए और आसान हो जाएगा?












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