Bihar Chunav 2025: दीपावली की रात और चुनावी सीजन की ‘काली’ सियासत, नेताओं तक पहुंचा ‘हर पावर वाला उल्लू’
Bihar Chunav 2025: दीपावली की जगमगाहट के बीच राजधानी पटना में अंधविश्वास और सियासत का संगम देखने को मिला। दीपावली की अमावस्या की रात पटना सिटी और उसके आसपास दुर्लभ उल्लू और नेवले की तस्करी का काला खेल चला।
इन जीवों की खरीद-फरोख्त न केवल तंत्र-मंत्र के लिए, बल्कि चुनावी "सफलता" की चाह में नेताओं द्वारा भी कराई जा रही है। कुछ तस्करों ने कबूल किया कि उन्होंने हाल ही में तीन स्थानीय नेताओं को "हर पावर वाला उल्लू" सप्लाई किया है, क्योंकि चुनावी माहौल में इनकी मांग अचानक बढ़ गई है।

चुनावी भाग्य चमकाने की अंधविश्वासी दौड़
बिहार चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की परतें भी गहराती जा रही हैं। रिपोर्ट में सामने आया कि तस्कर अपने ग्राहकों को यह यकीन दिलाते हैं कि "20 उंगलियों वाला उल्लू" भाग्य बदल सकता है। एक तस्कर ने दावा किया, "नेता लोग पूजा में उल्लू चढ़वाते हैं ताकि कुर्सी पक्की हो।" यह कथन अपने आप में बताता है कि बिहार की सियासत में अंधविश्वास का बाजार कितना सक्रिय है।
पटना सिटी से लेकर नेपाल बॉर्डर तक फैला नेटवर्क
पटना में पत्थर की मस्जिद के आसपास के इलाकों में यह पूरा अवैध नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से चलता है। तस्करों ने स्वीकार किया कि उनके नेटवर्क की जड़ें नेपाल और उत्तराखंड तक फैली हैं। एक ने कहा कि, "बड़ा उल्लू जल्दी नहीं मिलता, लेकिन उसकी पूजा में असर ज्यादा होता है।" इससे ज़ाहिर है कि दीपावली के मौके पर यह कारोबार धार्मिक आस्था और लालच के बीच झूलता है।
कुबेर की सवारी बना नेवला, सियासी 'भाग्य' बदलने का जरिया
दीपावली पर नेवले की मांग भी बढ़ गई। एक तस्कर ने दावा किया, "नेवला कुबेर की सवारी है, इससे धन और भाग्य खुलता है।" उसने बताया कि कई "प्रभावशाली लोग" दीपावली से पहले ही नेवले की बुकिंग करा चुके हैं। माना जा रहा है कि तंत्र-मंत्र के ज़रिए राजनीतिक लाभ पाने की यह कोशिशें बिहार की सियासत में नए प्रतीकवाद की झलक है।
वन्यजीवों के नाम पर अपराध और अंधविश्वास का गठजोड़
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत उल्लू और नेवले जैसी प्रजातियों का व्यापार पूरी तरह प्रतिबंधित है। बावजूद इसके दीपावली के समय इनकी तस्करी चरम पर पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सियासी अंधविश्वास का हिस्सा बन चुका है। चुनावी माहौल में जहां नेता जनता को विकास और रोजगार का वादा करते हैं, वहीं कुछ गुपचुप तरीके से "उल्लू तंत्र" का सहारा ले रहे हैं।
बिहार चुनाव और अंधविश्वास की राजनीति
बिहार में राजनीति हमेशा से जाति, समाज और प्रतीकवाद के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अब इसमें "आध्यात्मिक तंत्र" की एक नई परत जुड़ गई है। दीपावली की रात जब आम जनता लक्ष्मी पूजन में व्यस्त थी, तब कुछ राजनीतिक खेमें "काले उल्लू" की पूजा से चुनावी सफलता पाने की उम्मीद में लगे थे। यह विडंबना है कि जिस राज्य ने समाज सुधार आंदोलनों को जन्म दिया, वहीं अब चुनावी जीत के लिए अंधविश्वास का सहारा लिया जा रहा है।इस बार का मुकाबला दिलचस्प होने वाला है।
रोशनी के पर्व में अंधविश्वास की परछाई
दीपावली का अर्थ होता है अंधकार पर प्रकाश की विजय, लेकिन पटना की गलियों में इस बार कुछ और ही कहानी लिखी जा रही थी। नेताओं और तांत्रिकों की यह गुप्त साझेदारी बताती है कि सियासत में अंधविश्वास अब "रणनीति" बन चुका है। जब तक समाज जागरूक नहीं होगा और प्रशासन ऐसे नेटवर्क पर शिकंजा नहीं कसता, तब तक बिहार में चुनावी उल्लू और नेवले की यह काली कहानी हर दीपावली पर दोहराई जाती रहेगी।












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