Sweets Of Bihar: शुद्ध खोवे से तैयार पेड़ा की प्रदेश ही नहीं, विदेशों में भी बढ़ रही डिमांड
Sweets Of Bihar: बिहार में भी मावा या खोआ से बनी मिठाइयां लोग काफी पंसद करते हैं। खोवा और मावे से बने पेड़े की बिहार ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी डिमांड है।

Bihar Sweet: बिहार के लिट्टी चोखा की तरह अब पेड़ा की भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डिमांड बढ़ रही है। नालंदा जिला के एक छोटा सा कस्बा में शुद्ध खोवा से पेड़ा तैयार किया जा रहा है। इस मिठाई की मांग, प्रदेश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हो रही है।
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नालंदा जिला मुख्यालय बिहार शरीफ से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एकंगसराय प्रखंड से पेड़ा का सप्लाई अमेरिका, बांगलादेश और सऊदी अरब तक हो रहा है। सिलाव खाजा के बाद निश्चलगंज का पेड़ा लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है।
आप नालंदा घूमने जाएं तो बिहार शरीफ से एकंगरसराय स्टेट हाइवे पर छोटे से कस्बे से आप पेड़ा ज़रूर खरीदें। पेड़ा का जायका लेने पर आप भी तारीफ़ ज़रूर करेंगे। सफर के दौरान इस रूट पर लोगों को निश्चलगंज के पेड़े काफी पसंद आते हैं।
आगंतुकों को बसों से लेकर छोटी कारों में भी वेडर द्वारा पेड़ा बेचा जाता है। यहां से गुज़रने वाले लोग कुछ मशहूर चीज़ के नाम पर पेड़े को ही संदेश के तौर पर खरीद कर ले जाते हैं। मिलावट के दौर में भी यहां दर्जनों दुकानें हैं जो पूर्वजों से क्वालिटि मेंटेंन करते आ रहे हैं। दर्जनों परिवार का गुज़ारा पेड़ा ही बेचकर हो रहा है।
पेड़ा व्यवसाय दिनेश प्रसाद की मानें तो गाय और भैंस के दूध से पेड़े बनाए जाते हैं। पेड़ा बनाने में मावा और भूरा का इस्तेमाल होता है। पेड़ा बनाने में दानेदार मावा का इस्तेमाल ज़ायका बरकरार रखने के लिए किया जाता है। पेड़ा बनाते वक्त मावा को काफी भूना जाता है ताकि पेड़ा की क्वालिटि अच्छी हो।
पेड़ा व्यवसाय ने बताया कि मावा को जितना ज्यादा भूनेंगे पेड़े की गुणवत्ता उतनी ज्यादा अच्छी होगी। मावा भूनने के वक्त बीच-बीच में थोड़ा दूध या फिर घी भी डाला जाता है। इससे भूनने वक्त मावा जलता नहीं है और मावा का रंग हल्का भूरा हो जाता है। आपको बता दें कि यहां पेड़ा का पेड़ा 180 रुपये प्रति किलो से लेकर 360 रुपये प्रति किलो तक बिकता है। यह पेड़ा सभी राजकीय मेले से लेकर राज्यस्तरीय कार्यक्रमों तक मशहूर है।












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