22 साल बाद गांव में अवतरित होंगें भगवान भास्कर, मुगलों के डर से छिपाया गया था तहखाने में
छठ पर्व या छठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी से कार्तिक शुक्ल सप्तमी तक मनाया जाने वाला चार दिनों तक चलने वाला लोक पर्व है। यह पर्व दिवाली के 6 दिन बाद मनाया जाता है। लेकिन इस बार की छठ पूजा बिहार के भोजपुर के लिए कुछ खास होने वाली है। वजह है बिहार के एक ऐसे मंदिर की कहानी जिसमे 22 साल बाद देव वरुणार्क रूप में भगवान भास्कर अवतरित होंगे और उनको अर्घ्य प्रदान किया जाएगा। वर्ष 1999 के बाद 22 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद यह पहला मौका होगा जब जिले के तमाम लोग इस ऐतिहासिक पल के साक्षी होंगे। 30 अक्टूबर से लेकर 5 नवंबर तक आयोजित विधिवत पूजा पाठ के समारोह के बाद उनको मंदिर में स्थापित किया जाएगा

मुगलों के डर से इस मूर्ति को तहखाने में छिपा दिया गया था
आपको बता दें की यह मंदिर बिहार के भोजपुर ज़िले में स्तिथ है। भोजपुर जिले के तरारी प्रखंड के देव गांव स्थित यह मंदिर समुद्रगुप्त के ज़माने का बना हुआ है। इस मंदिर से जुडी एक ऐतिहासिक कहानी है जो की अपनेआप में ही दिलचस्प है। बताया जाता है कि मुगल काल में मुगलों के डर से इस पाषाण कालीन मूर्ति को तहखाने में छिपा दिया गया था ताकि उनकी नजर इन प्रतिमाओं पर न पड़े, क्योंकि मंदिर में स्थापित भगवान की प्रतिमा और मंदिर को मुग़ल खंडित कर देना चाहते थे। समय के चलते यह तहखाना जमीन में दबता चला गया पर बाद में जब इस मंदिर के अंदर खुदाई की गई तो फिर रहित भगवान भास्कर की दुर्लभ प्रतिमा प्राप्त हुई। लोगों का कहना है की ना जाने कब से सूरज भगवान कारखाने में ही विराजमान थे। लेकिन इस वर्ष बन रहे विग्रह योग के बाद उनको मुख्य मंदिर में स्थापित किया जाएगा। ग्रामीण इसके लिए जोरदार तरीके से तैयारी में लगे हुए हैं।

साथ सात घोड़ों से युक्त रथ भी होगा
तहखाने से भगवान भास्कर की पुरानी प्रतिमा को निकालकर मखमल की चादर में लिपटा कर उनकी प्रतिमा को नवनिर्मित मंदिर में स्थापित किया जाएगा। भगवान भास्कर के सारथी और उनके साथ सात घोड़ों से युक्त रथ भी होगा। पिछले कई वर्षों से ग्राम वासी समेत तमाम इलाके के लोग भगवान भास्कर के इस दिव्य अलौकिक रूप के दर्शन को लालायित थे और अब उनकी यह मनोकामना पूर्ण होती दिख रही है। 30 अक्टूबर से लेकर 5 नवंबर तक आयोजित विधिवत पूजा पाठ के समारोह के बाद लाखों लोग इस ऐतिहासिक पल के साक्षी होंगे। सभी लोग उस पल का इंतजार कर रहे हैं जब भगवान भारत की प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया जाएगा।

आस्था, पवित्रता व सूर्य उपासना का महापर्व
छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की पूजा व उन्हें अर्घ्य देने का विधान है। छठ भारत मे वैदिक काल से ही मनाए जाने वाला बिहार का प्रसिद्ध पर्व है। षष्ठी तिथि के प्रमुख व्रत को मनाए जाने के कारण इस पर्व को छठ कहा जाता है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
छठ पूजा के अनुष्ठानों का उद्देश्य ब्रह्मांडीय सौर-ऊर्जा जलसेक के लिए भक्त के शरीर और दिमाग को प्रेरणा देता है। केवल सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान ही अधिकांश मनुष्य सुरक्षित रूप से सौर ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि छठ पूजा के त्योहार में देर शाम और सुबह जल्दी सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है।
प्राचीन काल में, ऋषि उसी तरह की प्रक्रिया का उपयोग कर रहे थे जैसे हम छठ पूजा के दौरान किसी भी प्रकार के ठोस या तरल आहार के बिना करते थे। उसी तरह की प्रक्रिया की मदद से, वे भोजन और पानी के बजाय सीधे सूर्य से जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा को अवशोषित करने में सक्षम थे।












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