PM मोदी का पूर्णिया दौरा: सीमांचल की 24 सीटों पर क्यों है NDA का फोकस? क्या है जातीय समीकरण, पढ़ें पूरी पड़ताल
PM Modi Purnia Visit (Bihar Chunav 2025): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बार फिर बिहार दौरा सुर्खियों में है। इस बार उनका फोकस राज्य के सीमांचल इलाके पर है। पीएम मोदी 15 सितंबर को पूर्णिया दौरे पर हैं, जहां वे करीब 36,000 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं की सौगात दी। लेकिन यह सिर्फ विकास का एजेंडा नहीं है, इसके पीछे 2025 के विधानसभा चुनाव की रणनीति भी साफ झलक रही है। सवाल यह है कि आखिर सीमांचल ही क्यों और इस क्षेत्र की 24 सीटों पर एनडीए इतना जोर क्यों लगा रहा है?
पीएम मोदी का पूर्णिया दौरा सिर्फ योजनाओं का उद्घाटन नहीं बल्कि 2025 के चुनावी अभियान की एक बड़ी शुरुआत है। सीमांचल की 24 सीटें जिस पार्टी की झोली में जाएंगी, सत्ता की कुर्सी उसी के करीब मानी जा रही है। यही वजह है कि इस बार बिहार की सियासत का सबसे बड़ा खेल इसी इलाके में खेला जाएगा।

🔵 विकास का पैकेज या चुनावी रणनीति?
पूर्णिया दौरे के दौरान पीएम मोदी एयरपोर्ट के नए टर्मिनल का उद्घाटन करेंगे, चार नई ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे और नेशनल मखाना बोर्ड से लेकर नदी जोड़ो प्रोजेक्ट तक कई अहम योजनाओं का एलान करेंगे। यह सब उस समय हो रहा है जब बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने ही वाला है। जानकार कहते हैं कि इन प्रोजेक्ट्स का मकसद सिर्फ कनेक्टिविटी बढ़ाना या इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना नहीं, बल्कि वोटरों के बीच एनडीए की छवि को मजबूत करना भी है।
🔵 सीमांचल: बिहार की सियासत का गेमचेंजर, 24 सीटों का गणित समझिए
BJP Seemanchal 24 Seats: सीमांचल यानी कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज-यह चार जिले बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। यहां कुल 24 विधानसभा सीटें हैं और यही वजह है कि हर चुनाव में इस इलाके पर सभी पार्टियों की नजर रहती है। 2020 के चुनाव में भाजपा को यहां 8 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस, जेडीयू और आरजेडी ने भी अपनी-अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। कांग्रेस को 5, जेडीयू को 4, भाकपा माले और राजद को एक-एक सीट मिली थी। AIMIM ने तो चौंकाते हुए 5 सीटें जीत ली थीं, हालांकि बाद में उसके चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए।
2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 4 में से एक सीट अररिया की भाजपा के खाते में गई थी। वहीं दो सीट किशनगंज और कटिहार कांग्रेस को और पूर्णिया की सीट निर्दलीय की झोली में चली गई थी।
2015 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया था, जहां आरजेडी को 9, जेडीयू को 5 और कांग्रेस को 5 सीटों पर जीत मिली थी। इसके उलट बीजेपी सिर्फ 5 सीटों तक ही सिमट गई थी। हालांकि, 2020 के चुनाव में तस्वीर बदल गई। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के उभार ने 'इंडिया' गठबंधन का समीकरण बिगाड़ दिया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को अप्रत्याशित रूप से मिल गया।

🔵 सीमांचल मुस्लिम बहुल इलाका और जातीय समीकरण
सीमांचल की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत इसका जातीय और धार्मिक संतुलन है। किशनगंज की 68%, अररिया की 43%, कटिहार की 45% और पूर्णिया की करीब 39% आबादी मुस्लिम है। ऐसे में यहां के नतीजे मुस्लिम वोटों की दिशा तय करती है। यही वजह है कि कांग्रेस और आरजेडी लंबे समय से इस क्षेत्र पर पकड़ बनाए हुए हैं। लेकिन AIMIM की एंट्री ने समीकरण बदल दिए और भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा मिला।
🔵 AIMIM और नई चुनौतियां
2020 में ओवैसी की पार्टी ने यहां मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करके कई सीटें जीतीं। इस बार भी पार्टी ने अकेले लड़ने की तैयारी दिखाई है, जिससे मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सकता है। यह स्थिति भाजपा और एनडीए के लिए फायदे की हो सकती है। वहीं, प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी धीरे-धीरे अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में है, जो आने वाले चुनाव में महागठबंधन के लिए चुनौती खड़ी कर सकती है।

🔵 NDA की जातीय रणनीति
भाजपा जानती है कि मुस्लिम वोट बैंक उसके पक्ष में आसानी से नहीं आएगा। इसलिए वह दलितों, अति पिछड़े वर्गों (EBC) और प्रवासी मजदूरों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल का गृह जिला किशनगंज है, जिससे पार्टी इस इलाके में विशेष मेहनत कर रही है। जेडीयू भी इस रणनीति का हिस्सा है और एनडीए मिलकर सीमांचल में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
🔵 मोदी की रैली से बढ़ी हलचल, जारी हो सकता है चुनावी अधिसूचना
PM Modi Bihar Rally: 15 सितंबर को पूर्णिया में मोदी की रैली चुनावी अधिसूचना जारी होने से पहले की आखिरी बड़ी सभा मानी जा रही है। माना जा रहा है कि यहीं से एनडीए चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत करेगा। दरभंगा की सभा में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के तीखे हमलों के जवाब की उम्मीद भी इसी मंच से की जा रही है। यही वजह है कि इस रैली पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई हैं।

🔵 विपक्ष का पलटवार
महागठबंधन इस दौरे को "चुनावी गिफ्ट" बताकर हमला कर रहा है। उनका कहना है कि मोदी सरकार ने बिहार को हमेशा नजरअंदाज किया और अब चुनावी फायदे के लिए प्रोजेक्ट्स का एलान कर रही है। कांग्रेस और आरजेडी इस इलाके में मुस्लिम मतदाताओं के सहारे अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सीमांचल का राजनीतिक माहौल और भी दिलचस्प होता जा रहा है।
🔵 क्यों खास है सीमांचल? कैसे बदल रहा यहां का चुनावी समीकरण?
सीमांचल का महत्व सिर्फ जातीय समीकरण तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र भौगोलिक और आर्थिक रूप से भी अहम है। नेपाल और बंगाल की सीमा से सटा यह इलाका रणनीतिक तौर पर संवेदनशील माना जाता है। साथ ही, प्रवासी मजदूरों और युवाओं की बड़ी संख्या होने के कारण यहां रोजगार और विकास के मुद्दे चुनाव को निर्णायक बना सकते हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सीमांचल एक ऐसी रणभूमि बन चुका है जहां हर पार्टी अपना दांव आजमा रही है। भाजपा और जेडीयू विकास के मुद्दे पर, कांग्रेस और आरजेडी अल्पसंख्यक वोटों पर, AIMIM अपनी अलग पहचान पर और जनसुराज पार्टी नए विकल्प के तौर पर मैदान में हैं। नतीजा चाहे जो भी हो, इतना तय है कि 2025 का चुनाव सीमांचल के बिना अधूरा रहेगा।












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