Pawan Singh की घर-वापसी कर बीजेपी ने एक साथ ठाकुर-कुशवाहा समीकरण साधा, समझें इस सियासी चाल की रणनीति
Pawan Singh Rajput Vote Bank: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले बीजेपी अपने सभी समीकरणों को साधने में जुटी है। इसका असर है कि मंगलवार को दुर्गाष्टमी के मौके पर पवन सिंह की एनडीए में वापसी हुई है। पावर स्टार की वजह से ही उपेंद्र कुशवाहा लोकसभा चुनाव हारे थे। पहले उन्होंने कुशवाहा से मुलाकात की और फिर अमित शाह से भी मिले। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें भी टिकट मिल सकता है। बीजेपी की कोशिश है कि भोजपुरी फिल्मों के पावर स्टार के जरिए राजपूत वोटर्स को एकजुट रखे।
राजपूतों के साथ ही बीजेपी की कोशिश है कि एनडीए के सभी कोर वोट बैंक को एकजुट रखा जाए। उपेंद्र कुशवाहा और पवन सिंह दोनों में सुलह कराकर एक ही तीर से कुशवाहा और राजपूत दोनों वोटर्स को जोड़ने की कोशिश है। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि पवन सिंह या तो बीजेपी के टिकट पर या फिर कुशवाहा की पार्टी के चुनाव चिह्न से चुनाव लड़ सकते हैं। इसके अलावा, अपनी स्टार पावर का इस्तेमाल वह चुनावी सभाओं में भी करते दिखेंगे।

Pawan Singh को लाकर अमित शाह ने चला सधा हुआ दांव
-पवन सिंह भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार हैं और पूरे पूर्वांचल में उन्हें पावर स्टार का दर्जा है। काराकाट से जब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा, तो उन्हें राजपूतों का अच्छा समर्थन मिला। इसका नतीजा यह हुआ कि वह खुद तो नहीं जीत पाए लेकिन वोट कटने की वजह से उपेंद्र कुशवाहा भी हार गए।
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-अब राजपूतों की नाराजगी की खबरों के बीच बीजेपी ने पवन सिंह को एनडीए में शामिल कर लिया है। उपेंद्र कुशवाहा के साथ भी उनकी मुलाकात हुई है। बीजेपी की कोशिश है कि एनडीए के वोट बैंक को एकजुट रखा जाए, ताकि महागठबंधन और प्रशांत किशोर की चुनौती से सही तरीके से निपटा जा सके।
Bihar Chunav में राजपूत वोट हैं अहम
बिहार भाजपा में राजपूत विधायकों की संख्या 19 है। यह विधानसभा की कुल संख्या का लगभग 24 प्रतिशत है। फिर भी कहा जा रहा है कि भाजपा से राजपूत नाराज हैं। बिहार में मौजूदा सरकार में सर्वाधिक मंत्री इसी जाति से हैं। आयोग और बोर्डों में भी भरमार है। विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह इसी जाति से आते हैं। राज्य की कुल आबादी में इस जाति का 6 फीसदी के करीब आंकड़ा है। हालांकि, कई सीटों पर यह चुनावी हार-जीत तय करते हैं। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपने सवर्ण वोट बैंक को मजबूती से जोड़कर रखना चाहती है।
BJP ने राजपूतों को हमेशा दी है तरजीह
भाजपा को अक्सर ही बनिया-ब्राह्मण की पार्टी कहा जाता है, लेकिन बिहार में राजपूतों को भी बीजेपी ने खूब प्राथमिकता दी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 21 राजपूत प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से 16 जीत गए थे। बाद में दो विधायक वीआइपी से तोड़ लिए और एक उपचुनाव में जीत गए थे। कुल मिलाकर राजपूत विधायकों की संख्या 19 हो गई। भाजपा ने उत्तर बिहार से 13 राजपूतों को टिकट दिया। दो हार गए और 11 जीत गए। दक्षिण बिहार में भाजपा ने आठ राजपूत प्रत्याशी उतारे। तीन हारे और पांच जीते। राजपूतों को मिलने वाली तरजीह इससे समझ सकते हैं कि भाजपा में यादव और भूमिहार विधायकों की संख्या दोनों मिलाकर सिर्फ 15 है, जबकि अकेले राजपूतों की संख्या 19 है।
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