क्या ओवैसी बिहार का सियासत में करेंगे बड़ा खेला? क्यों मची है इंडिया ब्लॉक में खलबली?
Owaisi Bihar Visit: बिहार विधानसभा चुनाव में अब महज छह महीने का समय शेष बचा है और राज्य की सियासी फिजा भी धीरे-धीरे गरमाने लगी है। इसी कड़ी में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी दो दिवसीय दौरे पर बिहार पहुंचे हैं। उनका यह दौरा सीमांचल से शुरू होकर मिथिलांचल और सारण तक जाएगा, जिसे आगामी चुनावों के लिए एक निर्णायक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
असदुद्दीन ओवैसी आज यानी शनिवार 3 मई से बिहार में चुनाव अभियान का आगाज करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ओवैसी ने कहा है कि उनकी पार्टी पहले से ही बिहार में सक्रिय रूप से चुनावी तैयारी में जुटी हुई है और वो पहले से ज्यादा सीटें जीतेंगे। उन्होंने कहा था कि हम अच्छा लड़ेंगे और हमारे उम्मीदवार पिछली बार से भी ज़्यादा सफल होंगे। सीमांचल की जनता हमारे विधायकों को चुराने वालों को सबक सिखाएगी।

सीमांचल से मिशन की होगी शुरुआत
बता दें कि शुक्रवार को ओवैसी किशनगंज पहुंचे, जहां उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कीं। शनिवार को वे बहादुरगंज में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करेंगे। इसके बाद 4 मई को वे मोतिहारी के ढाका और गोपालगंज में जनसभाएं करेंगे। यह स्पष्ट संकेत है कि AIMIM इस बार सिर्फ सीमांचल तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी अपनी सियासी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
2020 में चौंकाया था, अब विस्तार की तैयारी
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में AIMIM ने पहली बार चुनाव लड़ा और सीमांचल की पांच सीटों पर जीत दर्ज कर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में AIMIM ने आरजेडी के MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को चुनौती दी थी। माना जाता है कि इन्हीं सीटों पर वोटों के बंटवारे ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया।
मिथिलांचल और सारण में एंट्री की तैयारी
इस बार ओवैसी की रणनीति और भी व्यापक है। वे न सिर्फ सीमांचल बल्कि मिथिलांचल और सारण जैसे नए क्षेत्रों में भी दस्तक देना चाहते हैं। मोतिहारी और गोपालगंज में होने वाली उनकी सभाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं। ओवैसी की नजर उन सीटों पर है जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। खास तौर पर मिथिलांचल में कुछ ऐसी सीटें हैं जहां AIMIM की एंट्री महागठबंधन के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है।
सारण की चुनौती और ओवैसी की रणनीति
सारण में भी ओवैसी की नजर है, हालांकि यहां उन्हें शहाबुद्दीन परिवार और लालू यादव के बीच फिर से बनी नजदीकियों की वजह से थोड़ी मुश्किलें आ सकती हैं। बावजूद इसके, छपरा, गोपालगंज और सिवान जैसे इलाकों में AIMIM उम्मीदवार उतार सकती है। गोपालगंज में ओवैसी की मीटिंग इसी रणनीति का हिस्सा है।
महागठबंधन के लिए सिरदर्द, NDA के लिए दोधारी तलवार
ओवैसी की पार्टी भले ही महागठबंधन के वोट बैंक में सेंधमारी करती हो, लेकिन इससे एनडीए को पूरी राहत नहीं मिलती। AIMIM का चुनावी एजेंडा धार्मिक मुद्दों को हवा दे सकता है, जो भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। खासतौर पर सीमांचल और मिथिलांचल जैसे इलाकों में, जहां जेडीयू के उम्मीदवार अधिक होते हैं, ओवैसी के सवाल नीतीश कुमार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
वक्फ एक्ट और अल्पसंख्यक राजनीति
बिहार पहला राज्य होगा जहां नए वक्फ एक्ट लागू होने के बाद विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में ओवैसी इस मुद्दे को लेकर भाजपा को सीधे घेर सकते हैं। उनकी रणनीति केवल सीट जीतने की नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक वोटर्स के बीच खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने की भी है।
क्या बिगाड़ेंगे ओवैसी महागठबंधन का खेल?
2020 में AIMIM ने 18 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 5 पर जीत दर्ज की थी। हालांकि बाद में इनमें से 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे, जिससे ओवैसी को झटका जरूर लगा, लेकिन इससे उनके जनाधार पर कोई खास असर नहीं पड़ा। अब AIMIM दोबारा अपनी सियासी जमीन तैयार कर रही है और नए इलाकों में विस्तार के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।












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