बिहार में सम्राट अशोक के बहाने कैसे नीतीश के कुर्मी-कोयरी फॉर्मूले पर चोट करेगी बीजेपी? जानिए
बिहार में नीतीश कुमार की राजनीति कोयरी-कुर्मी वोट बैंक पर टिकी रही है। लेकिन, भारतीय जनता पार्टी ने उनके आधार वोट बैंक को टारगेट कर दिया है। उसने इसके लिए बड़ी रणनीति बनाई है।

बिहार में लालू-नीतीश के गठबंधन की वजह से बीजेपी को वहां नए सिरे से जातीय समीकरण तैयार करनी पड़ रही है। इसके लिए वह नीतीश कुमार के लव-कुश वाले जनाधार को ही टारगेट कर रही है और काफी हद तक उसे इसमें सफलता भी मिलती नजर आ रही है। इसी कड़ी में पार्टी सम्राट अशोक की जयंती बड़े पैमाने पर आयोजित करने जा रही है। खुद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह इस मौके के गवाह बनने जा रहे हैं। सम्राट अशोक अखंड भारत के इतिहास का सबसे बड़ा नाम है; और आज की तारीख में बिहार की राजनीति में उनकी अहमियत और भी बढ़ गई है।

नीतीश के लव-कुश फॉर्मूला बिहार बीजेपी का लक्ष्य
बिहार में नीतीश कुमार ने जब से भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ा है, बीजेपी ने अति-पिछड़ा वोट बैंक पर फोकस किया है और उपचुनावों में उसे इसका काफी फायदा भी मिला है। अब पार्टी ने ओबीसी वोट बैंक पर अपना फोकस और बढ़ा दिया है। इसमें से पहले नंबर पह हैं कुशवाहा या कोयरी। कोयरी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जातिगत लव-कुश फॉर्मूले के सबसे बड़े आधार हैं और उनकी करीब तीन दशकों की राजनीति इन्हीं के भरोसे टिकी रही है। एक बड़े जनाधार वाले कुशवाहा नेता सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने अपना इरादा पहले ही जाहिर कर दिया है।

भगवान राम की उपासक बीजेपी के पास आएंगे 'लव-कुश'- सम्राट चौधरी
बीजेपी 2 अप्रैल को सासाराम में सम्राट अशोक की जयंती बड़े पैमाने पर मनाने जा रही है। इसके लिए खुद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक दिन पहले ही बिहार पहुंच रहे हैं। सम्राट अशोक को कुशवाहा समाज अपना पूर्वज मानता है। इसके बारे में सम्राट चौधरी ने ईटी को बताया है, 'सम्राट अशोक की जयंती के मौके पर भाजपा एक बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित कर रही है, उन्हें कुशवाहा अपना पूर्वज मानते हैं। अब लव-कुश गठबंधन जिनके साथ कुमार (नीतीश कुमार) ने बंधुआ मजदूरों की तरह बर्ताव किया, बीजेपी के साथ जाएंगे, जो कि भगवान राम की उपासक है।'

आरजेडी के साथ जाने से नीतीश का फॉर्मूला हुआ कमजोर
बिहार की राजनीति में कुर्मी-कोयरी या जिसे लव-कुश गठबंधन कहा जाता है, उनकी आबादी 15% से कम ही बताई जाती है। नीतीश कुमार खुद कुर्मी हैं; और तीन दशकों से वही इस गठबंधन के सबसे प्रभावशाली नेता बने हुए हैं। उन्होंने यह जातिगत समीकरण अपने पुराने राजनीतिक विरोधी लालू यादव के मुस्लिम-यादव गठबंधन के खिलाफ तैयार किया था। लेकिन, वह फिर से जिस तरह से लालू के पाले में गए हैं, उनके अपने जातीय समीकरण की डोर कमजोर पड़ी है। कोयरी जाति के एक और प्रभावशाली नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ऐसे ही आरोप लगाकर जेडीयू से बाहर हो चुके हैं।
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'कोयरी जाति को अपने साथ प्रमुखता से जोड़ना चाह रही है भाजपा'
बिहार की राजनीति पर नजदीकी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ ने वनइंडिया से खास बातचीत में कहा है कि 'कोयरी-कुर्मी में पहले की जनसंख्या काफी ज्यादा है, लेकिन वह छिटपुट हैं। जबकि, कुछ विधानसभा सीटों पर कुर्मियों की बहुलता की वजह से धारणा बनती है कि कुर्मी ज्यादा तादाद में हैं। उपेंद्र कुशवाहा भले ही बीजेपी में नहीं गए हैं, लेकिन इससे उनके समाज में सत्ता की अभिलाषा तो पैदा जरूर होगी। उसका फायदा बीजेपी उठाएगी। वहीं सम्राट चौधरी मजबूत कुशवाहा नेता हैं। मुंगेर इलाके में उनका अच्छा जनाधार है।' उनका यह भी कहा है कि कोयरी समाज में भाजपा का प्रभाव पहले से भी रहा है। अब वह उन्हें प्रमुखता से अपने साथ जोड़ना चाह रही है। हालांकि, उन्होंने बताया की कुर्मी जाति पर अभी भी नीतीश ने अपनी पकड़ बरकरार रखी है।

बिहार के जातीय समीकरण में फिट होना चाहती है बीजेपी
बिहार की जातीय राजनीति बीजेपी के लिए हमेशा से कमजोर कड़ी रही है। वहां का सामाजिक समीकरण ऐसा है कि पार्टी को अपना हिंदुत्व वाला नरेटिव सेट करना उतना आसान नहीं रह पाता, जितना कि वह यूपी में करने में माहिर चुकी है। यही वजह है कि उसने अबकी बार वहां वही जातीय समीकरण को पकड़ने की शुरुआत की है, जिसकी वजह से वह लालू और नीतीश के एक साथ आने पर उनसे पिछड़ जाती है। लेकिन, अब पार्टी नए प्रदेश अध्यक्ष और सुनील ओझा और भीखूभाई दलसानिया जैसे प्रभारियों द्वारा तैयार रणनीति पर चलकर इस राजनीतिक चुनौती को भी टक्कर देने के लिए तैयार है। दोनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ काम कर चुके हैं। ओझा को सह-प्रभारी बनाया गया है, जबकि दलसानिया प्रदेश के संगठन मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं।












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