बिहार के इस ज़िले में पहली बार हो रही Sticky Rice की खेती, जानिए क्या है चावल की ख़ासियत?
Sticky Rice Farming In Bihar: बिहार के किसान पारंपरिक खेती से अलग खेती में नया प्रयोग कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। वहीं अब विदेशी भी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से फ़सलों की खेती में प्रयोग कर रहे हैं। इसी कड़ी में पहली बार गया ज़िले में स्टिकी राइस की खेती का प्रयोग किया जा रहा है। भिक्षु वट लाओस बौद्ध मठ में रहने वाले थाईलैंड और लाओस के बौद्ध भिक्षु ने इसे शुरुआत की है।
संजय सिंह (केयर टेकर, वट लाओस बौद्ध मठ) ने बताया कि भिक्षु मगध यूनिवर्सिटी में अध्ययन करते हैं। उन्होंने पहली बार स्टिकी राइस की खेती का प्रयोग किया, उम्मीद है कि इसके पॉज़िटिव रिज़ल्ट मिलेंगे। आपको बता दें कि बोधगया में पूरे साल कंबोडिया, थाईलैंड सहित कई अन्य देशों के बौद्ध भिक्षु और विदेशी श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है।

बौद्ध भिक्षु और विदेशी श्रद्धालुओं को यहां खाने के लिए आसानी से स्टिकी राइस नहीं मिल पाता है। कोई उन्हें खाने में स्टिकी राइस दे देते तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। स्टिकी राइस यहां के खाने के रिवाज शामिल हो चुका है।
अपनी ज़रूरत के हिसाब से बौद्ध भिक्षु और श्रद्धालु थाईलैंड से स्टिकी राइस को फ्लाइट के ज़रिए से मंगवाते हैं, जो बोधगया पहुंचते-पहुंचे काफी मंहगा पड़ जाता है। इन्हीं परेशानियों से निजात पाने के लिए बौद्ध भिक्षुओं कुछ ज़मीन ने बोधगया में लीज़ पर ली है।
लीज़ पर ज़मीन लेकर स्टिकी राइस की खेती करने वाले लोगों में लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया के बौद्ध भिक्षु शामिल हैं। ग़ौरतलब है कि स्टिकी राइस की खेती के लिए यह लोग बोधगया के मज़दूरों से काम ज़रूर करवाते हैं। लेकिन पौधे की रोपाई खुद से ही करते हैं। इनके साथ थाईलैंड, लाओस और कम्बोडिया की महिलाएं और युवतियां जुड़ी रहती हैं।
Sticky Rice एक चिपचिपा चावल का प्रकार है, इसमें काफी मात्रा में डेक्सट्रिन और माल्टोस पाया जाता है। भाप मे पकाने की वजह से ज्यादा स्टार्च निकलता है, जिससे चाव में गोंद जैसी बनावट हो जाती है। इसलिए इसे स्टिकी राइस भी कहते हैं। इसका सेवन हड्डि रोगियों के लिए फायदेमंद है। इसके साथ ही सूजन में कमी और दिल के रोगी को भी फायदा मिलता है। यह बातचीत के आधार पर टिप्स है, इस्तेमाल करने से पहले आप अपनी डॉक्टर से मशवरा ज़रूर लें।












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