‘कमांडो चाय अड्डा’, 2014 में ज्वाइन किया BSF, डिप्यूटेशन पर बने NSG, फिर चाय क्यों बेच रहे मोहित, जानिए

बिहार में अब एक कमांडो चाय बेच कर सुर्खियों में है। जिस तरह से ग्रेज्युएट चाय वाली ने पंच लाइन लिखा था पीना ही पड़ेंगा।

पटना, 4 जून 2022। बिहार में अब एक कमांडो चाय बेच कर सुर्खियों में है। जिस तरह से ग्रेजुएट चाय वाली ने पंच लाइन लिखा था पीना ही पड़ेंगा। उसी तरह कमांडो चाय अड्डा सुन कर ही लोगों में एक किक पैदा हो रही है। सोशल मीडिया पर यह चर्चा बना हुआ है कि कमांडो को तो अच्छी खासी सैलरी मिलती है फिर क्यों इस व्यक्ति ने कमांडो की नौकरी छोड़ कर चाय बेचना शुरू कर दिया। कमांडो चाय वाला की क्या कहानी है आईए जानते हैं।

2014 में हुए थे बीएसएफ़ में शामिल

2014 में हुए थे बीएसएफ़ में शामिल

गोपालगंज (बिहार) में सड़क पर चाय बेच रहे कमांडो से वन इंडिया हिंदी ने खास बातचीत की । चाय बेचने वाले शख्स का नाम मोहित है और वह मौनिया चौक (गोपालगंज) के पास ठेला लगाकर चाय बेच रहे हैं। मोहित ने बताया कि वह मोतिहारी जिले से ताल्लुक रखते हैं और रक्सौल ( रामगढ़वा थाना) के सिंहासिनी गांव के निवासी है। उन्होंने क़रीब एक सप्ताह पहले ही चाय का स्टार्ट अप शुरू किया है। समाहरणालय (मौनिया चौक) के पास चाय की दुकान लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2014 में बीएसएफ जॉइन किया था। कुछ दिन काम करने के बाद डेप्युटेशन पर एनएसजी कमांडो के तौर पर ड्यूटी किया। फिलहाल वह छुट्टियां लेकर 39 दिनों के लिए घर आए हुए हैं।

समाज को एक अलग संदेश देना चाहते हैं मोहित

समाज को एक अलग संदेश देना चाहते हैं मोहित

मोहित ने खास बातचीत में बताया कि मई 2021 में डेप्यूटेशन पर एनएसजी की ट्रेनिंग हुई। दिल्ली में ही 28 नवंबर 2021 को जॉइनिंग हुई। इस साल 7 मई को छुट्टी लेकर घर आए कुछ दिनों तक घर पर वक्त बिताने के बाद वह गोपालगंज चले आए और 25 मई को चाय की स्टॉल खोल दी। मोहित कहते हैं कि वह शुरू से ही कुछ अलग करना चाहते थे। यह मैसेज देना चाहते हैं कि कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता कुछ करने के लिए लाज और शर्म को किनारे कर के शुरुआत करनी चाहिए। तभी कोई इंसान बेहतर काम करते हुए अच्छा मुकाम हासिल कर सकता है। यही वजह है कि उन्होंने एक पॉज़िटिव मैसेज देने के लिए चाय की दुकान खोली है। वह जब भी छुट्टी में आते हैं तब भी कुछ अलग करते हैं।

बहुत कम उम्र मे ही पिता का उठ गया था साया

बहुत कम उम्र मे ही पिता का उठ गया था साया

मोहित ने बताया कि उनके पिता जितेंद्र पांडेय बीएसएफ में ही थे। 1996 में 11 अगस्त को ड्यूटी के दौरान उनकी मौत हो गई थी। मां के कंधों पर परिवार की सारी ज़िम्मेदारी आ गई थी। उस वक्त मैं सिर्फ़ दो साल और दो महीने का था, हम लोग एक बहन और दो भाई हैं। पिता की मौत के वक़्त सब छोटे थे। बड़ी बहन हैं और एक छोटा भाई दिव्यांग है। इसलिए मां ने ही सभी की ज़िम्मेदारी उठाई। मोहित ने बताया कि अनुकंपा पर साल 2014 में बीएसएफ में नौकरी हुई हुई थी। उसके बाद साल 2019 में मोहित की शादी हुई। अब मोहित खुद अपनी मां, पत्नी और भाई की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।

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