ज़मीन पर जन्नत का अनुभव कराती है घरों पर हुई ये पेंटिंग, तस्वीरें देख आपको भी करेगा घूमने का मन

ख्वाबों की दुनिया में हम जन्नत की सैर कर सकते हैं लेकिन धर्ती पर भी स्वर्ग का अनुभव आपको झारखंड के उन इलाकों में होता है जहां के घरों में शानदार सोहराय पेंटिंग की झलक दिखती है।

रांची, 4 जून 2022। ख्वाबों की दुनिया में हम जन्नत की सैर कर सकते हैं लेकिन धर्ती पर भी स्वर्ग का अनुभव आपको झारखंड के इलाकों में होता है। यहां के घरों में शानदार सोहराय पेंटिंग की झलक दिखती है। जब आप उन इलाकों में घूमेंगे तो दीवार पर हुई पेंटिंग आपको जंगल में होने का अहसास कराएगी। आपको इस तरह की अद्भुत कलाकृतियां देखने को मिलेंगी की आप भी कहेंगे की ज़मीन पर अगर कहीं जन्नत है तो यहीं है। झारखंड के आदिवासी इलाकों में आज भी घरों पर अद्भूत कलाकृतियां बनाई जाती हैं। लेकिन धीरे-धीरे अब इसका चलन ख़त्म होते जा रहा है। झारखंड की सदियों पुरानी विरासत सोहराय कला बचाने का बीड़ा आदिवासी महिलाओं ने उठाया है।

आदिवासी महिलाएं अपने घरों में तैयार करती हैं रंग

आदिवासी महिलाएं अपने घरों में तैयार करती हैं रंग

आदीवासी महिलाओं की कोशिश ने झारखंड की कई ऐसी दीवारों का नक्शा बदल दिया जहां आप देखना भी पसंद नहीं करते। लेकिन महिलाओं ने उन दीवारों को सोहराय कला से इस तरह से सजा दिया है कि आपकी निगाहें दीवारों पर ही ठहर जाएंगी। सोहराय कला सदियों पुरानी कला होने के साथ ही सभी कला से अलग है। ग़ौरतलब है कि इसे सभी प्राकृतिक रंगों मिट्टी से बनाया जाता है। आदिवासी महिलाएं खुद अपने घरों में इन रंगों को तैयार करती हैं। आपको बता दें कि इस कला में इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी को भी गांव की महिलाएं घर लाकर पीस कर तैयार करती हैं।

हड़प्पा संस्कृति के समकालीन है सोहराय पेंटिंग

हड़प्पा संस्कृति के समकालीन है सोहराय पेंटिंग

सोहराय कला के बारे में स्थानीय बताते हैं कि झांरखंड के गमुला प्रखंड सिसई में कई राजाओं के किला बना हुआ है। राजाओं के किला की दिवारों पर सोहराय कलाकृती बनी हुई है। वहां की महिलाएं दीवारों को देख कर धीरे-धीरे चित्र बनाने लगी। जो भी चीज़ आस-पास दिखी जैसे मोर, गाय,मुर्गी उन्हें देख कर दीवारों पर तस्वीर बनाने लगी। तस्वीर बाने के बाद उसमे रंग भरना शुरू कर दिया। इस तरह से यह शौक आदिवासी महिलाओं में शुरू हुआ और उन्होंने साहराय कला को बचाने का ज़िम्मा उठा लिया। इस कला को भित्ती चित्र भी कहा जाता है,सोहराय पेंटिंग की कला को हड़प्पा संस्कृति के समकालीन माना गया है।

कई जनजातियों में लोकप्रिय है सोहराय पेंटिंग

कई जनजातियों में लोकप्रिय है सोहराय पेंटिंग

संथाल, मुंडा, गोंड, कोरमा, असुर तथा बैगा जनजातियों के बीच यह कला सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। अफसोस की बात यह है कि झारखंड पर्यटन स्थल होकर भी यहां कोई ऑर्ट म्यूजियम नहीं है। यही वजह है कि सैलानी यहां की कई कलाओं से अनजान रह जाते हैं। सोहराय को लोकप्रिय बनाने के लिए स्तभं नामक संस्था कोशिश में जुटी है। संस्था की जय श्री बताती हैं कि वह सोहराय पेंटिंग के जरिए गांव की महिलाओं और युवतियों को रोजगार से जोड़ने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि पहले हर घर में ये कला थी पर जैसे जैसे पक्के मकान बनने लगे वैसे वैसे मिट्टी के घरों की संख्या भी कम हो गयी।

ख़त्म होते जा रहे हैं मिट्टी के घर

ख़त्म होते जा रहे हैं मिट्टी के घर

जय श्री ने बताया कि पहले लोग मिट्टी के घरों के दिवार पर सोहराय पेंटिग कर घर को सजाते थे। खास दिवाली के मौके पर गांव का हर घर हरा भरा सा दिखता था। उन्होंने बताया कि वे सिसई लोहरदगा, लातेहार पलामू, गुमला जैसी बिहड़ जगहों पर जाकर महिलाओं को अपने साथ जोड़ रही हैं और सोहराय कला सिखा रही हैं। सोहराय कला सिखाने में क़रीब 100 परिवारों से भी ज्यादा महिलाएं मदद कर रही हैं। उनका कहना है कि गांवों में भी मिट्टी के घर धीरे-धीर खत्म होते जा रहे हैं, इसलिए उनकी संस्था इसे अब कंक्रीट की दीवारों पर ही उकेरती है। इस संस्था की महिलाओं ने झारखंड की गंदी दीवारों को खूबसूरत बनाने का बीड़ा उठाया है।

सोहराय कला को प्रमोट करने की कोशिश

सोहराय कला को प्रमोट करने की कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2015 में हजारीबाग रेलवे स्टेशन के उद्घाटन के समय दीवारों पर सोहराय पेंटिंग को देखा था.इसकी खूबसूरती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने जनवरी 2016 में 'मन की बात' कार्यक्रम में सोहराय पेंटिंग का जिक्र किया. यानी लगभग एक वर्ष बाद भी उनके जेहन में उक्त कला की स्मृतियां जीवंत थी.उसके बाद से सोहराय कला को शहर में बी प्रमोट करने की कोशिश हो रही है इसके लिए सरकार ने इन महिलाओं को सभी जिलों के सरकारी घरों और दप्तरों के दिवारों पर सोहराय पेंटिग करने की इजाज्त दी है। आदिवासीयों के हर घर में दिखती है आज भी सोहराय अगर हम झारखंड के सुदूर इलाकों में चले जाये तो हर घर के दावारों पर सोहराय की झलक देखने को मिलती है। महिलाएं खुद से रंगों को तैयार करती हैं और अपना काम निपटाने के बाद घर के दिवारों को सजाने में लग जाती हैं।

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