Bihar Chunav 2025: JMM की दावेदारी, महागठबंधन के लिए मजबूरी या मज़बूती? समझिए सीट शेयरिंग का पूरा गणित
Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, और इसी के साथ राज्य की सियासत में उबाल आने लगा है। इस बार मुकाबला केवल NDA और महागठबंधन (I.N.D.I.A bloc) के बीच नहीं है, बल्कि खुद महागठबंधन के भीतर भी तालमेल और सीट बंटवारे को लेकर खींचतान तेज हो गई है।
ताज़ा मामला झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का है, जिसने बिहार में 12 सीटों की ठोस दावेदारी कर दी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या राष्ट्रीय जनता दल (RJD) इस 'राजनीतिक वापसी उपहार' को स्वीकार करेगी या इसके चलते गठबंधन में दरार आ सकती है?

झारखंड में RJD को JMM ने दिया था सहयोग
2024 के झारखंड विधानसभा चुनावों में JMM ने RJD को 6 सीटें दी थीं और एक मंत्री पद भी। अब JMM नेता यह कह रहे हैं कि "अब बारी आपकी है", यानी बिहार में उन्हें उतनी ही राजनीतिक हिस्सेदारी चाहिए। JMM की दलील है कि हमने झारखंड में सहयोग किया, अब बिहार में वापसी चाहिए।
JMM की बिहार में क्या है पकड़?
बिहार में JMM की राजनीतिक पकड़ सीमित है, लेकिन सीमांचल और अंग क्षेत्र की कुछ सीटों पर आदिवासी वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जैसे: टारापुर, बेलहर, झाझा, कटोरिया, JMM इन्हीं सीटों पर दावेदारी कर रही है और आदिवासी पहचान के नाम पर समर्थन जुटाने की रणनीति पर है। ये सीटें संथाल और अन्य आदिवासी समुदायों से प्रभावित मानी जाती हैं, जहां JMM सहानुभूति लहर के सहारे पैर जमाने की कोशिश में है।
सीट शेयरिंग को लेकर पहले से ही रस्साकशी
महागठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर पहले से ही रस्साकशी जारी है। कांग्रेस 70 से अधिक सीटों की मांग कर रही है, वामपंथी दल अपने परंपरागत गढ़ों को छोड़ने को तैयार नहीं, और अब VIP (विकासशील इंसान पार्टी) भी 40 से 60 सीटों की दावेदारी के साथ मैदान में है। ऐसे में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की 12 सीटों की मांग इस समीकरण को और जटिल बना रही है।
मुख्य पार्टी RJD खुद करीब 110 से 120 सीटों पर दावा करना चाहती है, क्योंकि वही गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि सभी सहयोगी दलों की मांगों को जोड़ दिया जाए, तो कुल सीटों की संख्या 243 से काफी ऊपर चली जाती है, जो व्यावहारिक नहीं है।
अब अगर JMM को 12 सीटें दी जाती हैं, तो जाहिर है कि यह किसी और की हिस्सेदारी घटेगी। इससे कांग्रेस और वामपंथी दलों की नाराज़गी तय है। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव किसे कितना संतुष्ट कर पाते हैं, और किन मांगों को किनारे रखेंगे। यह केवल सीटों का मामला नहीं, बल्कि गठबंधन की एकता और भविष्य की रणनीति का भी सवाल बन चुका है।
हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी भी एक फैक्टर
JMM प्रमुख हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी को आदिवासी समुदाय "राजनीतिक प्रतिशोध" के रूप में देख रहा है। ऐसे में JMM इसका भावनात्मक लाभ बिहार की आदिवासी बेल्ट में लेने की कोशिश कर रहा है। यह केवल सीटों की मांग नहीं, बल्कि JMM की बिहार में राजनीतिक पहचान स्थापित करने की नींव भी है।
गठबंधन के लिए डबल एज: देना भी जोखिम, न देना भी
अगर सीटें दी गईं: कांग्रेस या वामपंथी दल नाराज़ हो सकते हैं।
अगर मना किया गया: JMM अकेले भी चुनाव लड़ सकती है, जिससे महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लग सकती है।
तेजस्वी यादव के लिए यह एक 'Catch-22' सिचुएशन है, किसी को भी नाराज़ करना नुकसानदेह साबित हो सकता है। बिहार चुनाव से पहले JMM की यह मांग तेजस्वी यादव के सामने एक कूटनीतिक चुनौती बनकर उभरी है। क्या वह गठबंधन के संतुलन को साध पाएंगे? या क्या यह अंदरूनी खींचतान NDA के लिए एक मौका है?
महागठबंधन की एकता की असली परीक्षा
हर दल की मांग मान ली जाए, तो कुल सीटों की संख्या 243 से कहीं अधिक हो जाती है। इसका मतलब है कि महागठबंधन को किसी न किसी मोर्चे पर कटौती या समझौता करना ही होगा। RJD को जहां गठबंधन का नेतृत्व करते हुए अपनी स्थिति बनाए रखनी है, वहीं कांग्रेस और वाम दल अपने गढ़ों को छोड़ने को तैयार नहीं। ऐसे में VIP और JMM जैसी सहयोगी पार्टियों की बढ़ती मांगें महागठबंधन की एकता की असली परीक्षा बन सकती हैं।












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