Chandan Hatyakand: दोस्ती,प्यार और बदले की त्रिकोणीय कहानी! चंदन मिश्रा की हत्या के पीछे लव स्टोरी का ट्विस्ट

Chandan Mishra Hatyakand: बिहार के अपराध जगत में चंदन मिश्रा और शेरू सिंह उर्फ ओंकारनाथ की जोड़ी कभी खौफ की पहचान हुआ करती थी। इन दोनों की दोस्ती एक समय बक्सर की गलियों में आतंक की कहानी कहती थी, एक बाइक, दो हथियार, और बेमुरव्वत हत्याएं। लेकिन वक्त बदला, रिश्ते बदले और एक प्रेम कहानी ने इन दो 'दोस्तों' को दुश्मन बना दिया।

20 की उम्र में 8 हत्याएं, फिर भी मजबूत थी दोस्ती
चंदन और शेरू का रिश्ता अपराध की दुनिया में 'जय और वीरू' जैसा था। उन्होंने रंगदारी और गैंगवार में कदम साथ रखा। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, महज 20 साल की उम्र में दोनों ने मिलकर 8 से अधिक हत्याएं की थीं। लेकिन इस आपराधिक दोस्ती में एक लड़की की वजह से दरार आई।

Chandan Hatyakaand

प्रेम बना दुश्मनी की वजह
बताया जाता है कि शेरू की नजर चंदन की बहन पर पड़ी। यह प्रेम कहानी एक ब्राह्मण लड़की और राजपूत लड़के के बीच थी, जो जल्द ही समाज के साथ-साथ चंदन के लिए भी अस्वीकार्य बन गई। रिश्तों का यह टकराव जातीय और पारिवारिक गरिमा से टकराया, और वही से दुश्मनी की इबारत लिखी गई।

जेल में बनी प्यार, अपमान और बदले की पटकथा
समय के साथ चंदन ने अपराध से दूरी बनाने की कोशिश की, लेकिन शेरू के ज़हन में अब बदले की आग जल रही थी। सूत्रों के अनुसार, इस हत्याकांड की साजिश बिहार की जेल में रची गई थी और इसका संचालन बंगाल के पुरुलिया जेल से शेरू कर रहा था।

पारस अस्पताल में हुआ 'फिल्मी अंदाज' में कत्ल
14 जुलाई 2025 को पटना के बहुचर्चित पारस अस्पताल में जब 5 हथियारबंद शूटर दूसरी मंजिल के कमरा नंबर 209 में दाखिल हुए, तो वहां इलाजरत चंदन मिश्रा पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई गईं। महज कुछ सेकंड में बक्सर का 'पुराना शेर' हमेशा के लिए ज़मीन पर गिर पड़ा।

शेरू ने किया कबूल, अब चेन से निकलेगी बाकी कड़ियां
बिहार पुलिस की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। शेरू ने पूछताछ में न केवल साजिश स्वीकार की, बल्कि कई अन्य सहयोगियों के नाम भी बताए हैं। अब पुलिस उसके बिहार स्थित शागिर्दों से पूछताछ की तैयारी में है।

सिर्फ एक हत्या नहीं, यह थी दोस्ती, इश्क और वर्चस्व की त्रासदी
यह कहानी बिहार के अपराध इतिहास में सिर्फ एक कत्ल नहीं, बल्कि दोस्ती, वफ़ादारी, प्यार और जातीय टकराव का जीवंत उदाहरण है। बक्सर के जिन दो नामों से लोग कांपते थे, आज उनमें एक मिट्टी में समा चुका है और दूसरा सलाखों के पीछे पहुंच गया।

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