बिहार: बूढ़ी काली मंदिर में पूजा करने वाले अमित शाह पहले गृहमंत्री, मुस्लिम नवाब ने दी थी मंदिर के लिए जमीन
बिहार के किशनगंज ज़िले में मौजूद बूढ़ी काली मंदिर में श्रद्धालुओं की बहुत ही खास आस्था है। यहां के लोगों का मानना है कि अगर कोई इंसान अपनी मुराद लेकर इस मंदिर में आता है तो उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है।
किशनगंज, 24 सितंबर 2022। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह दो दिवसीय दौरे पर बिहार आए हुए हैं। शुक्रवार को उन्होंने पूर्णिया और किशनगंज में जनसभा को संबोधित किया। वहीं आज शनिवार को किशनगंज के 250 साल पुराने मंदिर में पूजा-अर्चना की। अमित शाह ने बूढ़ी काली मंदिर में 15 मिनट तक पूजा अर्चना की औक पंडितों का आशीर्वाद लेकर वहां से रवाना हुए। इस मंदिर में पूजा करने वाले देश के पहले गृहमंत्री अमित शाह हैं। इस मंदिर के लिए मुस्लिम नवाब ने ज़मीन दी थी। अमित शाह के पूजा-अर्चना के बाद इस मंदिर के इतिहास का कई लोग जानना चाह रहे हैं। आइए हम आपको बताते हैं, इस मंदिर का क्या इतिहास और मान्यता है ?
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मंदिर में श्रद्धालुओं की लगी रहती है भीड़
बिहार के किशनगंज ज़िले में मौजूद बूढ़ी काली मंदिर में श्रद्धालुओं की बहुत ही खास आस्था है। यहां के लोगों का मानना है कि अगर कोई इंसान अपनी मुराद लेकर इस मंदिर में आता है तो उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर में मां काली की शरण में जाने के बाद हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है। स्थानीय लोगों की मानें तो इस मंदिर में मुराद लेकर आया हुआ व्यक्ति कभी निराश नहीं हुआ है। यहां कई अनंत शक्ति का वास है। सच्चे मन से बूढ़ी काली मंदिर में पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं मां काली पूरा करती हैं।

मूर्ति दान के लिए कई साल करने पड़ता है इंतज़ार
बूढ़ी काली मंदिर में भक्तों में काफी श्रद्धा और विश्वास है, यही वजह है कि इस मंदिर में मूर्ति दान देने के लिए भक्तों को कई साल का इंतजार करना पड़ता है। मंदिर व्यवस्था समिति की मानें तो मंदिर में अगले 21 साल तक मूर्ति दान की बुकिंग हो चुकी है। आज की तारीख में अगर कोई इंसान इस मंदिर में मूर्ति दान की ख्वाहिश रखता है तो उसे 21 वर्षों तक का लंबा इंतज़ार करना होगा। मंदिर के मौजूदा पुरोहित मलय मुखर्जी ने बताया कि उनके पूर्वज यहां पूजा करते थे, तब से लेकर आज तक पूजा करने की यह पंरपरा कायम है।

1902 में हुई थी बूढ़ी काली मंदिर की स्थापना
मलय मुखर्जी (वर्तमान पुजारी) ने बताया कि मनोकामना पूर्ण होने पर यहां बलि भी दी जाती है। मां काली की प्रतिमा के पास स्थापित बलि वेदी में बलि दी जाती है। मनोकामनाएं पूरी होने पर श्रद्धालुओं ( भक्त) बलि देते हैं। इस मंदिर की स्थापना की तारीख 1902 बताई जाती है, लेकिन बुजुर्गों का कहना है यह मंदिर उससे भी ज्यादा पुराना है।

नवाब असद रज़ा ने दी थी मंदिर के लिए ज़मीन
बुज़ुर्गों की मानें तो मुस्लिम नवाब असद रज़ा ने 250 साल पहले इस मंदिर की स्थापना के लिए जमीन दी थी। नवाब असद रज़ा के ज़मीन दान करने के पीछे भी कई बातें बताई जाती है। नवाब असद रज़ा के बारे में बताते हैं कि वह किसी भी मामले में तुरंत ही संज्ञान लेते हैं। उस समय में जब उनसे कहा गया था कि मंदिर के लिए ज़मीन चाहिए तो उन्होंने तुरंत ज़मीन दे दी थी। इलाके के लोग उन्हे काफी मान सम्मान भी देते थे।
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