बिहार वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन: EC के 11 दस्तावेजों ने खड़ी की नई चुनौती, एक भी जुटाना क्यों हो रहा मुश्किल

Bihar Voter List Revision 2025: बिहार में चुनाव आयोग (EC) ने मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण (वोटर लिस्ट रिवीजन) शुरू किया है। चुनाव आयोग ने 24 जून को निर्देश दिया कि जो भी व्यक्ति 2003 की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं - जो लगभग 2.93 करोड़ लोग हैं - उन्हें वोटिंग की पात्रता साबित करने के लिए 11 दस्तावेजों में से कम से कम एक दस्तावेज देना होगा। लेकिन बिहार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखते हुए इन दस्तावेजों को जुटाना आसान नहीं है।

चुनाव आयोग ने 24 और 30 जून को बयान जारी कर इस कदम के कारण बताए - जैसे कि अवैध विदेशी नागरिकों का नाम जुड़ना, बार-बार होने वाला पलायन, युवा नागरिकों का वोटिंग की उम्र में आना और मृत व्यक्तियों की जानकारी नहीं मिलना। चुनाव आयोग ने कहा है कि मांगे गए 11 दस्तावेज केवल एक संकेत हैं, पूरी सूची नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' के अनुसार, वोटर लिस्ट बनाने का अधिकार चुनाव रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) को है, और EC केवल दिशा-निर्देश जारी करता है। अंतिम फैसला ईआरओ को करना होता है कि दस्तावेज स्वीकार किए जाएं या नहीं।

Bihar Voter List Revision 2025

बिहार की बड़ी आबादी के लिए इन दस्तावेजों को जुटाना आसान नहीं है। यह प्रक्रिया उनके लिए परेशानी भरी हो सकती है, खासकर जिनके पास न शिक्षा प्रमाणपत्र हैं, न जमीन, न नौकरी और न सरकारी कागजात। आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं क्यों?

Bihar voter List verification: चुनाव आयोग के मांगे गए 11 दस्तावेजों को जुटाना क्यों है मुश्किल?

🔴 1. सरकारी पहचान पत्र या पेंशन ऑर्डर (केवल सरकारी कर्मचारी या पेंशनधारी के लिए)

बिहार जातिगत जनगणना 2022 के अनुसार, सिर्फ 20.49 लाख लोग सरकारी सेवा में हैं -यह राज्य की कुल आबादी का सिर्फ 1.57% है।

🔴 2. 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में सरकार/स्थानीय प्राधिकरण/बैंक/डाकघर/एलआईसी/पीएसयू द्वारा जारी कोई भी सरकारी पहचान पत्र/दस्तावेज

इसमें स्थानीय निकायों द्वारा जारी प्रमाणपत्र या नौकरी से संबंधित प्रमाण भी शामिल हैं, लेकिन उपलब्ध डेटा नहीं है।

🔴 3. जन्म प्रमाणपत्र

जन्म प्रमाण पत्र स्थानीय जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए जाते हैं, जिन्हें जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (आरबीडी) अधिनियम, 1969 के तहत राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। ग्रामीण इलाकों में यह पंचायत, ब्लॉक और हेल्थ सेंटर के जरिये जारी होता है; शहरी क्षेत्रों में नगर निगम करता है। 2000 में बिहार में सिर्फ 1.19 लाख जन्म रजिस्टर्ड हुए थे -अनुमानित जन्मों का सिर्फ 3.7%। बिहार में जन्म पंजीकरण दर में लगातार बढ़ोतरी हुई है लेकिन 2007 में भी केवल 7.13 लाख जन्म रजिस्टर्ड हुए थे, जबकि उस वर्ष जन्म लेने वाले लोग 18 वर्ष के हो जाएंगे और 2025 में मतदान करने के पात्र होंगे

🔴 4. पासपोर्ट

बिहार में कुल पासपोर्ट धारकों की संख्या 2023 तक केवल 27.44 लाख है - यानी महज 2% आबादी के पास ही पासपोर्ट है।

🔴 5. मैट्रिक या कोई अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र

मैट्रिक परीक्षा सीबीएसई, आईसीएसई और बिहार राज्य बोर्ड जैसे बोर्ड द्वारा आयोजित की जाती है। बिहार जाति सर्वेक्षण 2022 के मुताबिक बिहार में केवल 14.71% लोग 10वीं पास हैं। यह संख्या कम है क्योंकि राज्य में ड्रॉपआउट रेट भी ज्यादा है (कक्षा 6-8 में 26%)।

🔴 6. स्थायी निवास प्रमाणपत्र (डोमिसाइल)

इसे डोमिसाइल सर्टिफिकेट कहा जाता है, यह प्रमाणित करता है कि आवेदक एक स्थायी निवासी है। इसके लिए आवेदन करने के लिए आवेदक को आधार, राशन कार्ड, वोटर आईडी आदि जरूरी होते हैं। प्रक्रिया में 15 दिन या उससे ज्यादा समय लग सकता है। कागजात के सत्यापन से प्रक्रिया में देरी हो सकती है।

🔴 7. वन अधिकार प्रमाणपत्र (Forest Rights Certificate)

जनजातीय मामलों के मंत्रालय के 1 जून 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक अब तक बिहार को वन अधिकार अधिनियम के तहत केवल 4,696 आवेदन आए और सिर्फ 191 को मंजूरी मिली। 4,496 दावे खारिज कर दिए गए।

🔴 8. जाति प्रमाणपत्र (OBC/SC/ST)

बिहार जाति सर्वेक्षण 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में बिहार की कुल जनसंख्या 13.07 करोड़ थी। इसमें से ओबीसी 3.54 करोड़ (27%) और ईबीसी 4.70 (36%), अनुसूचित जाति 2.6 करोड़ (20 प्रतिशत), अनुसूचित जनजाति (एसटी) 22 लाख (1.6%) थे। हालांकि, इन समुदायों के कितने लोगों को अपना प्रमाण पत्र मिला, इसका कोई कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है।

🔴 9. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)

बिहार में लागू नहीं है, इसलिए यह विकल्प उपलब्ध नहीं है।

🔴 10. परिवार रजिस्टर (राज्य/स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा तैयार)

परिवार रजिस्टर एक आधिकारिक दस्तावेज होता है, जिसे ग्राम पंचायत या नगर निकाय जैसे स्थानीय प्रशासन द्वारा तैयार किया जाता है। इसमें हर परिवार का पूरा विवरण दर्ज होता है जो उस क्षेत्र में रहता है। इसमें आमतौर पर परिवार के मुखिया का नाम, परिवार के सभी सदस्यों के नाम, उम्र, लिंग और उनका संबंध, स्थायी और वर्तमान पता, जाति/वर्ग (सामान्य/OBC/SC/ST), पेशा या आजीविका से जुड़ी जानकारी, आधार नंबर या वोटर आईडी (अगर जुड़ा हो) और कभी-कभी राशन कार्ड या अन्य सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी होती है।

अगर कोई परिवार रजिस्टर में शामिल नहीं है या नया-नया उस क्षेत्र में आया है, तो उसे पंचायत या नगर कार्यालय जाकर एक फॉर्म भरना होता है। इसमें कारण बताना होता है जैसे -नया बसना या पिछली गणना में छूट जाना। इसके साथ कुछ जरूरी दस्तावेज भी देने होते हैं, जैसे
आधार, राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, विवाह प्रमाणपत्र। इसके बाद, संबंधित अधिकारी एक फील्ड विजिट (जांच) करता है। अगर सब कुछ सही रहता है तो आमतौर पर 15 दिनों या उससे अधिक समय में नाम जुड़ जाता है।

🔴 11. सरकारी जमीन/मकान आवंटन प्रमाणपत्र

अगर सरकार ने किसी को कोई जमीन या घर आवंटित किया हो तो उसका प्रमाण पत्र एक जरूरी दस्तावेज माना जाता है। लेकिन बिहार में यह दस्तावेज बहुत कम लोगों के पास है। 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के अनुसार, बिहार के ग्रामीण इलाकों के 1.78 करोड़ परिवारों में से 65.58% के पास अपनी जमीन नहीं है। यानी अधिकांश लोग किराए पर रहते हैं या किसी और की जमीन पर बसे हैं।

परिवार रजिस्टर में नाम जुड़वाना या सरकारी भूमि/घर आवंटन प्रमाण पत्र प्राप्त करना आसान नहीं है। इससे वोटर वेरिफिकेशन जैसे अभियानों में आम लोगों को दस्तावेज जुटाने में काफी परेशानी हो सकती है।

अगर कोई व्यक्ति इन 11 में से कोई दस्तावेज नहीं दे पाता है, तो चुनाव आयोग की गाइडलाइन के अनुसार, संबंधित अधिकारी उसे "संदिग्ध विदेशी नागरिक" के तौर पर रिपोर्ट कर सकता है -जो नागरिकता अधिनियम के तहत गंभीर मामला बन सकता है।

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