क्या बिहार में नीतीश कुमार लगातार अलोकप्रिय हो रहे हैं ?
पटना, 11 अगस्त। "नीतीश कुमार की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही है। पहले लोग उनके प्रति आदर और सम्मान की भावना रखते थे। अगर कोई नाखुशी भी रहती तो उसे अपनेपन के साथ कहते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनके प्रति यह धारणा बदल गयी है। अब वे नीतीश कुमार के प्रति वैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो अब तक विवादास्पद नेताओं के लिए प्रयोग किये जाते रहे हैं। बार-बार कम्बिनेशन बदलने से उनकी छवि पर आगे और भी असर पड़ेगा।

यह कहना कि नीतीश कुमार बिहार का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा है, बिल्कुल सही नहीं है। 2010 में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। लेकिन इसके बाद उनकी चुनावी जीत का ग्राफ लगातार गिरता चला गया। उन्हें 2010 में 115 सीटें मिलीं थीं। फिर 2015 में वे 71 पर आ गये। 2020 में और कम हुए और 43 पर पहुंच गये। ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार बिहार में सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं।" ये कथन प्रशांत किशोर के हैं। उनकी राजनीतिक समझ और विश्लेषण को आमतौर पर सटीक माना जाता है। प्रशांत किशोर का ये आंकलन उनकी जनसुराज यात्रा से मिले फीडबैक पर आधारित है। बिहार में दोबारा महागठबंधन की सरकार बनने के बाद उन्होंने अपनी ये राय जाहिर की है।

“नीतीश मन की थाह लेना मुश्किल”
महागठबंधन में फिर शामिल होने का फैसला, क्या नीतीश कुमार को रास आएगा ? इस सवाल के जवाब में सुशील कुमार मोदी का बयान महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा है, वो तो हम (भाजपा) थे कि निभा लिये। कोई दखलंदाजी नहीं। मर्यादा के साथ मिलकर काम किया। लेकिन राजद के स्वभाव को सभी लोग जानते हैं। हस्तक्षेप करना उनकी आदत रही है। उस दल में आरोपी नेताओं की कमी नहीं है। ऐसे में वो कैसे काम कर पाएंगे ? ये सरकार 2025 तक नहीं चल पाएगी। राजद को भी नीतीश कुमार से सावधान रहना चाहिए। भाजपा नेता सुशील मोदी, नीतीश कुमार के मित्र रहे हैं। लेकिन उनका कहना है, नीतीश कुमार के मन को समझना बहुत मुश्किल है। उनके मन में क्या चल रहा है, ये बात उनके नजदीकी लोग भी नहीं जानते। इसलिए ये कोई नहीं जानता कि वे कब किसके साथ धोखा करेंगे। गठबंधन तोड़ने के दो दिन पहले तक नीतीश कुमार गृहमंत्री अमित शाह से यही कहते रहे कि सब कुछ ठीक है। कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन फिर उन्होंने जो किया वो जगजाहिर है। अब राजद को भी सचेत रहना चाहिए।

क्या नरेन्द्र मोदी को नेता मानने की टीस साल रही थी ?
2017 में नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को मजबूरी में नेता माना था। कुर्सी कायम रखने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा। एक समय नरेन्द्र मोदी के नाम से चिढ़ने वाले नीतीश कुमार के लिए यह बहुत असहज स्थिति थी। प्रशासनिक रूप से तो वे नरेन्द्र मोदी के साथ आ गये लेकिन मन से कभी स्वीकार नहीं कर पाए। गठबंधन की मजबूरी में उन्हें जब तब नरेन्द्र मोदी की तारीफ भी करनी पड़ती थी। लेकिन उनके अंदर एक घुटन थी। इसलिए जैसे ही उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ा सबसे पहले नरेन्द्र मोदी पर ही हमला बोला। उनके अंदर की नाखुशी एकबारगी फूट कर बाहर आ गयी। उन्हें नरेन्द्र मोदी के नाम से भी परहेज हो गया। उनका नाम लेने की बजाय उन्हें '2014 वाले' कहने लगे। अभी एक महीना भी नहीं गुजरा है जब इसी नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को 'माननीय प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी' कहा था। बिहार विधानसभा शताब्दी वर्ष समापन समारोह (12 जुलाई) में नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी की जम कर तारीफ की थी। लेकिन 9 अगस्त 2022 को उनका असली रूप बाहर आ गया। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति विशेष श्रद्धा दिखायी और बिना नाम लिये नरेन्द्र मोदी की खुलेआम आलोचना की।

क्या नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी को रोक पाएंगे ?
भाजपा गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था, उनके नेता (जेपी नड्डा) कहते थे कि विपक्ष खतम हो जाएगा, लेकिन अब हम भी विपक्ष में आ गये हैं, देखते हैं कि कैसे खतम होता है। उन्होंने यहां तक कह दिया वे 2024 में पीएम नहीं रहेंगे। क्या नीतीश कुमार में इतनी राजनीतिक शक्ति है कि वे नरेन्द्र मोदी को रोक लेंगे ? नीतीश-लालू ने भले बिहार में भाजपा को रोक लिया हो लेकिन लोकसभा चुनाव में वे नरेन्द्र मोदी का सामना नहीं कर पाए हैं। 2014 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे। उन्होंने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा। 38 में जदयू सिर्फ दो सीट जीत पाया था। लालू यादव की पार्टी चार पर सिमट गयी थी। अगर 2024 नीतीश-तेजस्वी साथ रहेंगे तब न नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लडेंगे। सीट बंटवारे के समय ही इनकी असलियत सामने आ जाएगी। इस बार महागठबंधन में सात दल हैं। नीतीश कुमार किस-किस की डिमांड पूरी कर पाएंगे। अभी बिहार के राजनीतिक रंगमंच पर कई दृश्य उभरेंगे, जिसका इंतजार है।
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