क्या सच में 2024 में पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष का चेहरा बन पाएंगे नीतीश, जानिए क्या हैं राह में रोड़े
पटना, 11 अगस्त। जिस तरह से महाराष्ट्र और बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ उसके बाद देश की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। महाराष्ट्र और बिहार दोनों प्रदेशों को मिला लिया जाए तो यहां से लोकसभा की कुल 88 सीटें हैं, लिहाजा यह भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के लिए काफी अहम राज्य हैं। 2019 में जिस तरह से शिवसेना ने भाजपा के साथ गठबंधन को खत्म करके कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार का गठन किया उसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि प्रदेश की महाविकास अघाड़ी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी।

महाराष्ट्र-बिहार में बदलाव की राजनीति
गौर करने वाली बात है कि 2019 में शिवसेना और भाजपा के गठबंधन ने चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल किया था। बिहार में भाजपा, जदयू और एलजेपी ने लोकसभा की सभी सीटों पर क्लीनस्वीप किया था। वहीं महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना ने मिलकर लोकसभा की 41 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि विपक्ष महाराष्ट्र में सिर्फ 7 सीटों पर जीत दर्ज कर पाया था, जबकि बिहार में कांग्रेस को 1 और राजद को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी।

क्या नीतीश के अलग होने से बढ़ेगी भाजपा की मुश्किल
लेकिन हाल के बदले समीकरण के बाद स्थिति पूरी तरह से बदल गई है। नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद भाजपा के लिए मुश्किल थोड़ी जरूर बढ़ गई है। नीतीश के भाजपा से अलग होने के बाद यह संदेश जरूर गया है कि भाजपा का अब कोई दोस्त नहीं है और भाजपा अपने सहयोगी दलों को खत्म करना चाहती है। 2019 के बाद भाजपा के बड़े सहयोगी पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना और बिहार में जदयू ने साथ छोड़ दिया है।

विपक्ष के सामने 2024 में एकजुट होने की चुनौती
हालांकि महाराष्ट्र और शिवसेना में बदले समीकरण के बाद विपक्ष अपने आप को मजबूत दिखाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके बाद भी सवाल खड़ा होता है कि क्या 2024 में भाजपा के खिलाफ विपक्ष एकजुट होकर सामने आ पाएगा और पीएम मोदी को चुनौती दे पाएगा। क्या विपक्ष किसी एक चेहरे पर मुहर लगा पाएगा, क्या नीतीश कुमार को विपक्ष अपना चेहरा बनाएगा जो नरेंद्र मोदी को चुनौती दे पाएं। बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश विपक्ष को एकजुट करने में सफल होते हैं या विफल।

कई चेहरों के बीच जंग
केंद्र में भाजपा के बाद कांग्रेस को विकल्प के तौर पर देखा जाता है। लेकिन नेतृत्व के अभाव की वजह से कांग्रेस को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस पहले ही ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव, शरद पवार जैसे नेताओं को विपक्ष का चेहरा स्वीकार करने से इनकार कर चुकी है। लेकिन अहम बात यह है कि इन सभी नेताओं की अपने राज्य में लोकप्रियता कांग्रेस के कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि कोई भी दूसरा नेता अपने से इतर दूसरे नेता के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

क्या विपक्ष को चेहरे की जरूरत?
केंद्र में मोदी के उदय के बाद यूपीए, एनडी-1 में नए बदलाव देखने को मिले हैं। देश में राजनीतिक हालात 2004, 1996, 1989 से बिल्कुल अलग हैं। पूरे देश में अब भारतीय जनता पार्टी मुख्यधारा की राजनीति में है। जिस तरह से नरेंद्र मोदी सफलतापूर्वक अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं उसने देश के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह से बदल दिया है। विपक्ष में जो प्रभावी नेतृत्व हैं उनका मानना है कि एक चेहरे को आगे बढ़ाने और चुनाव पूर्ण गठबंधन से भाजपा को चुनौती दी जा सकती है। इनका मानना है कि मोदी के खिलाफ विपक्ष के पास कोई ऐसा चेहरा सामने नहीं आ रहा है जो पूरे देश में लोगों को अपनी ओर खींचे।

कितना सार्थक होगा नीतीश पर दांव
नीतीश कुमार की बात करें तो वह 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, कुछ समय के लिए 2014-15 में जीतन राम मांझी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। नीतीश कुमार के समर्थक और आलोचक दोनों का मानना है कि वह प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना चाहते हैं। नीतीश कुमार की छवि समाजवादी नेता के तौर पर रही है और बिहार में उनका रिकार्ड भी काफी अच्छा रहा है। उनकी छवि भी सेक्युलर नेता के तौर पर है और वह प्रदेश में जातिवादी समीकरण को अच्छे से समझते हैं। हिंदी पट्टी में नीतीश कुमार काफी प्रभावी नेता हैं। हिंदी पट्टी में भाजपा ने विपक्षी दलों को बुरी तरह से मात दी, लेकिन बावजूद इसके नीतीश कुमार की छवि पर कोई दाग नहीं लगा है।

विपक्ष में चेहरे की लड़ाई
लेकिन जिस तरह से नीतीश कुमार ने दल-बदल किया है उसके बाद से उनकी छवि को जरूर नुकसान पहुंचा है। 2017 के बाद से नीतीश कुमार ने जिस तरह से राजनीतिक फेरबदल किए हैं उसके चलते उनपर सवाल जरूर खड़े होते हैं। इसके अलावा दक्षिण और पूर्वोत्तर में नीतीश कुमार की लोकप्रियात लगभग नगण्य है। इसके अलावा नीतीश कुमार को लेकर अरविंद केजरीवाल ममता बनर्जी ने चुप्पी साध रखी है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी की ओर से भी नीतीश कुमार को लेकर कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि शरद पवार ने यह जरूर कहा है कि नीतीश कुमार ने अच्छा कदम उठाया है।

क्या नीतीश पर बन पाएगी एक राय?
डीएमके और टीआरएस ने जरूर नीतीश को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने भी ट्वीट करके लिखा, बिहार में जो हुआ उसने मुझे सोचने पर मजबूर किया जब जनता दल परिवार एक था। जनता दल ने तीन प्रधानमंत्री दिए। मैं अब अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में हूं, लेकिन अगर युवा पीढ़ि फैसला लेती है तो वह अच्छा विकल्प दे सकती है। गौर करने वाली बात है कि कांग्रेस, ममता बनर्जी, शरद पवार, केसीआर सभी ने विपक्ष को एकजुट होने की बात कही है। लेकिन किसी भी नेता ने एक विशेष नेता का नाम नहीं लिया। यहां तक कि केजरीवाल ने विपक्ष से खुद को अलग कर रखा है, इसकी बड़ी वजह है कि हर नेता अपने आपको नेता समझता है।

नीतीश के अलावा विकल्प
ममता बनर्जी को भरोसा है कि टीएमसी पश्चिम बंगाल में क्लीन स्वीप कर सकती है, पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने 42 सीटों पर जीत दर्ज की। टीएमसी के कुछ नेताओं का मानना हैकि कांग्रेस आने वाले समय में और भी खराब प्रदर्शन करेगी। जबकि ममता बनर्जी एक बेहतर उम्मीदवार हो सकती हैं। वहीं टीआरएस का कुल 17 लोकसभा सीटों पर ही प्रभाव है, लिहाजा वह एक सहयोगी की ही भूमिका में नजर आ सकते हैं। शरद पवार की बात करें तो वह 81 साल के हैं और वह अपनी राजनीति के चरम पर नहीं है। खुद पवार का मानना है कि बिना कांग्रेस के कोई विपक्ष संभव नहीं है।

पिछड़ती कांग्रेस
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि कांग्रेस इन सब में कहां खड़ी है। राहुल गांधी का मानना है कि गांधी परिवार को पार्टी के नेतृत्व से रणनीतिक तौर पर पीछे हटना चाहिए। वह खुद पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनने देना चाहते हैं क्योंकि इससे उन्हें सीधे पीएम मोदी से चुनौती मिलेगी और वह इससे बचना चाहते हैं। यहीं तक कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के चयन में कांग्रेस ने खुद को पीछे रखा और क्षेत्रीय दलों ने इसकी अगुवाई की। यहां तक कि कांग्रेस इस बात के लिए भी तैयार नजर आ रही है कि गैर कांग्रेसी नेता एक बड़े यूपीए का नेतृत्व करे। लेकिन जिस तरह से ममता बनर्जी ने गोवा में एंट्री की और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन में नेतृत्व किया उससे कांग्रेस खुश नजर नहीं आ रही है।

कहां है कांग्रेस का दावा
हालांकि नीतीश कुमार ने बुधवार को कहा है कि पीएम पद पर उनकी कोई दावेदारी नहीं है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा को यह याद रखना चाहिए 2014 भूतकाल है, अब उन्हें 2024 की चिंता करनी चाहिए। कांग्रेस के एक वर्ग को भी लगता है कि राष्ट्रपति उम्मीदवार के चयन में कांग्रेस पार्टी अन्य दलों के चंगुल में फंस गई। लेकिन पार्टी को उम्मीद है कि 3500 किलोमीटर की कन्याकुमारी से कश्मीर की पदयात्रा उसके लिए जरूर बदलाव लेकर आएगी। यह यात्रा 7 सितंबर से शुरू होने जा रही है। ऐसे में बिहार में सियासी समीकरण बदलने के बाद स्थिति साफ है कि विपक्ष में अभी भी भाजपा के खिलाफ चेहरे को लेकर जंग पहले की तरह जारी है।












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