Bihar Politics: बिहार में महागठबंधन से CM का चेहरा कौन होगा, कांग्रेस ने RJD को क्यों दिया झटका? 5 वजह

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में इस समय महागठबंधन के नेतृत्व को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा के बयान ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि बिहार में महागठबंधन के जीतने पर मुख्यमंत्री पद का फैसला कांग्रेस नेता राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लेंगे।

उन्होंने यह भी कह दिया है कि महागठबंधन में जिस भी दल को ज्यादा सीटें मिलेंगी, उसी का सीएम होगा। मतलब, कांग्रेस इतनी ज्यादा सीटों पर लड़ने के उम्मीद में है, जिसके आधार पर वह खुद के लिए आरजेडी से भी ज्यादा सीटें जीतने की संभावना देख रही है। लेकिन,कांग्रेस एमएलए का यह बयान राजद (RJD) को असहज करने वाला साबित हो रहा है।

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Bihar Political news: कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा ने तेजस्वी और आरजेडी को लेकर कहा क्या है?

भागलपुर से कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा ने कहा है, "महागठबंधन की सरकार इस बार बनेगी... इंडिया गठबंधन की सरकार बनेगी। खैर अगर उनकी (RJD) पार्टी सबसे ज्यादा सीट जीतेगी तो निश्चित तौर पर (तेजस्वी) मुख्यमंत्री होंगे, लेकिन ये राहुल गांधी, खड़गे साहब और सोनिया गांधी तय करेंगे।"

अगर गहराई में जाएं तो महागठबंधन में विवाद की वजह बनने का दम रखने वाले कांग्रेस विधायक के इस बयान के पीछे 5 मुख्य वजहें हो सकती हैं-

Bihar Politics: 1. ज्यादा सीटों पर दावेदारी और बार्गेनिंग का खेल

महागठबंधन में कांग्रेस पिछली बार 243 में से 70 सीटों पर लड़ी थी और इस बार भी वह इतनी ही सीटों की दावेदारी कर रही है। हालांकि, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव कांग्रेस की इस मांग को लेकर शुरू से असहज रहे हैं।

आरजेडी, जो खुद को महागठबंधन का सबसे बड़ा दल मानती है, कांग्रेस को इतनी सीटें देने के मूड में नहीं है। क्योंकि, पिछली बार कांग्रेस मात्र 19 सीटें ही जीत सकी थी और आरजेडी 144 पर लड़कर 75 सीटें जीतने में सफल रही थी। कुछ चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि अगर कांग्रेस को ज्यादा सीटें न देकर राजद और ज्यादा सीटों पर लड़ती तो उसकी सरकार भी बन सकती थी।

शायद यही वजह है कि कांग्रेस नेता का बयान अभी से ज्यादा से ज्यादा सीटें झटकने के लिए लिए दबाव बनाने की रणनीति लग रही है।

Bihar Elections: 2. कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहती है

बिहार में कांग्रेस का जनाधार चौपट हो चुका है। ऐसे में वह अपने पुराने दलित-मुस्लिम वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगी हुई है। राहुल गांधी इस साल दो बार बिहार का दौरा कर चुके हैं, जिससे साफ संकेत मिलता है कि कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।

बिहार के कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु भी इस बात को स्पष्ट कर चुके हैं कि पार्टी खुद को 'ए टीम' के रूप में स्थापित करना चाहती है।

Bihar Chunav: 3. दिल्ली के नतीजों को देखने के बाद सियासी ब्लैकमेलिंग की कोशिश?

दिल्ली चुनाव में कांग्रेस इंडिया ब्लॉक में रहते हुए भी आम आदमी पार्टी (AAP) से अलग चुनाव लड़ी। कांग्रेस ने जरूर हार का हैट्रिक बनाया, लेकिन उसकी वजह से करीब दर्जन भर सीटों पर 'आप' का पत्ता जरूर साफ हुआ, यह चुनाव विश्लेषकों की राय रही है।

ऐसे में यह भी हो सकता है कि कांग्रेस को लगता है कि अगर वह इस चुनाव में अपने दम पर अकेले कुछ खास नहीं भी कर पायी, लेकिन दिल्ली की तरह आरजेडी के रास्ते में ब्रेक जरूर लगा सकती है। उसे लगता है कि इस वजह से कांग्रेस को साथ में रखना लालू-तेजस्वी के लिए मजबूरी बन चुकी है और इसकी कीमत पार्टी ज्यादा से ज्यादा सीटें मांग कर वसूल सकती है।

Bihar News: 4. इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व को लेकर बढ़ा तनाव

लालू प्रसाद यादव ने हाल ही में इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व के सवाल पर ममता बनर्जी की पैरवी की थी, जिससे कांग्रेस नेतृत्व खासा नाराज है। कांग्रेस को लग रहा है कि लालू यादव ने जानबूझकर यह बयान दिया ताकि गांधी परिवार को बैकफुट पर लाया जा सके।

शायद यही वजह है कि कांग्रेस अब आरजेडी के साथ अधिक आक्रामक तेवर में दिख रही है और वह जैसे को तैयार वाला तेवर दिखाना चाह रही है।

5. कांग्रेस नेताओं का नंबर बढ़ाने वाला गेम?

कांग्रेस विधायक के बयान पर आरजेडी प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने एक टीवी चैनल से कहा है, "ये तय करने का काम अजीत शर्मा का थोड़े ही है। अजीत शर्मा विधायक हैं...अपना विधानसभा देखेंगे। विधायक के बयान को हम कितना लेंगे, जब पार्टी के अध्यक्ष ने एक बार बोल दिया...कि तेजस्वी जी के नेतृत्व में हैं..तो इनके बोलने का क्या मतलब रह जाता है..."

ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस विधायक ने कहीं पार्टी नेतृत्व के सामने अपना नंबर बढ़ाने के लिए ऐसा बयान तो नहीं दे दिया है? लेकिन,इससे चुनावी साल में महागठबंधन को क्या फायदा होगा, इसका तो पता नहीं लेकिन चुनौती जरूर बढ़ सकती है।

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