नीतीश कुमार करें तो ठीक, चिराग करें तो गलत कैसे ?

पटना, 14 जून। सियासी तूफान के थपेड़ों से अब लोजपा के चिराग की लौ थरथरा रही है। पांच सांसदों की बगवात किसी चक्रवात से कम नहीं है। जब तक रामविलास पासवान (बड़े साहब) का संरक्षण था लोजपा का बंगला चिराग से रौशन था। लेकिन रामविलास पासवान गुजर क्या गये, लोजपा की सियासी फिजां बदलने लगी। बड़े साहब के सभी फैसलों को आंख मूंद कर मानने वाले पशुपति कुमार पारस, प्रिंस राज को चिराग में कमी नजर आने लगी।

bihar political crisis ljp If Nitish Kumar does it right, if chirag paswan done then how is it wrong

लोजपा में दबी हसरतों की चिनगारी को जदयू ने कुछ इस कदर भड़काया कि बगावत हो गयी। चिराग को बेदखल कर पशुपति कुमार पारस खुद लोजपा संसदीय दल के नेता बन गये। उनका कहना है कि लोजपा को बचाने के लिए ऐसा करना जरूरी था। लेकिन जिस तरह से वे नीतीश कुमार की तारीफों के पुल बांध रहे हैं क्या उससे लगता है कि वे लोजपा की स्वतंत्र पहचान कायम रख पाएंगे ? रामविलास पासवान दलित राजनीति के एक स्तंभ थे। वे लोजपा की राजनीति के लिए न तो कभी लालू यादव के सामने झुके और न ही कभी नीतीश कुमार से समझौता किया। क्या लोजपा जदयू के 'रिवेंज गेम' का शिकार हो गयी ?

भतीजे के अपमान पर उतर आये चाचा !

भतीजे के अपमान पर उतर आये चाचा !

जब रामविलास पासवान ने 2013 में 31 साल के चिराग पासवान को लोजपा संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया था तब तो किसी ने चूं न की थी। 2019 में तो पशुपति कुमार पारस ने खुद चिराग को लोजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पेश किया था । उस समय पारस, चिराग की जोरशोर से तरफदारी कर थे। लेकिन अब उन्हें चिराग में रोशनी ही नजर नहीं आती। 2020 के विधानसभा चुनाव में जब चिराग ने जदयू के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला लिया था तब रामविलास पासवान ने इसका समर्थन किया था। तब तो पशुपति कुमार पारस ने इसका विरोध नहीं किया था। पहले चरण के चुनाव के ठीक पहले जब रामविलास पासवान का निधन हो गया तो लोजपा की राजनीति बदलने लगी। अब रामविलास पासवान के नहीं होने का मतलब समझ में आ रहा है। पशुपति कुमार पारस ने एक झटके में चिराग को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका। बात ऐसी बिगड़ी को चिराग को अपमान भी झेलना पड़ा। जब चिराग पासवान अपने चाचा पशुपति कुमार पारस के घर मिलने पहुंचे तो उन्हें इंट्री के लिए बहुत इंतजार करना पड़ा। मुश्किलों के बाद बंगले का गेट खुला। चिराग को कार में बैठ कर ही चाचा की राह देखनी पड़ी। ऐसी भी क्या तल्खी कि उन्हें घर के अंदर आने की इजाजत नहीं मिली ? क्या यह सब लोजपा को बचाने के लिए किया गया ?

जदयू का कभी लोजपा से चुनावी तालमेल न हुआ

जदयू का कभी लोजपा से चुनावी तालमेल न हुआ

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोजपा जदयू के रिवेंज गेम का शिकार हो गयी। विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने जदयू को नुकसान पहुंचाया था। अब जदयू ने चिराग को डैमेज करने के लिए पशुपति कुमार पारस को मोहरा बनाया। लेकिन पारस को ये बात याद रखनी चाहिए कि चुनावी राजनीति में जदयू कभी भी उनके लिए मददगार नहीं रहा। जदयू के नेता बार-बार इस बात को कहते रहे हैं कि उनका कभी लोजपा से तालमेल नहीं हुआ। विधानसभा चुनाव में लोजपा को कभी नीतीश कुमार के नाम का भी फायदा नहीं मिला। पशुपति पारस 2015 में नीतीश-लालू प्रभाव के कारण ही विधानसभा का चुनाव हारे थे। वो तो एनडीए में रहने की वजह से जुलाई 2017 में उनकी लॉटरी लग गयी थी। तब बिना किसी सदन का सदस्य रहते हुए उन्हें नीतीश सरकार में मंत्री बनाया गया था। यह नीतीश कुमार के अकेले की कृपा नहीं थी बल्कि एनडीए के सामाजिक समीकरण का भी असर था।

लालू यादव से क्यों अलग हुए थे नीतीश कुमार ?

लालू यादव से क्यों अलग हुए थे नीतीश कुमार ?

चिराग पासवान ने लोजपा की स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए अगर विधानसभा चुनाव अलग लड़ा तो क्या यह अपराध है ? क्या किसी राजनीतिक दल को यह अधिकार नहीं है कि वह खुद को मजबूत करे ? जदयू को ये बात नागवार क्यों लगी ? चुनाव के समय तो जदयू के नेता चिराग को बहुत हल्का आंक रहे थे। लेकिन जब जबर्दस्त नुकसान हो गया तो अब वे चिराग पर भड़ास निकाल रहे हैं। अगर कोई नेता खुद की हैसियत बनाने के लिए अलग रास्ता अख्तियार करता है तो क्या वह गलत है ? अगर ये गलत हैं तो ये गलती नीतीश कुमार ने भी की है। 1993 तक लालू यादव और नीतीश कुमार एक साथ जनता दल की राजनीति कर रहे थे। नीतीश कुमार ने खुद लालू यादव को अपना नेता माना था। 1988 में जब लालू यादव बिधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने तो उस समय नीतीश कुमार सिर्फ एक विधायक थे। बल्कि नीतीश कुमार ने खुद लालू यादव को यह पद दिलाने में मदद की थी। लेकिन 1994 में लालू यादव और नीतीश कुमार में दूरिया बढ़ने लगीं। जनता दल में रहते हुए नीतीश कुमार ने कुर्मी महारैली को अपना समर्थन दिया था। फिर नीतीश कुमार ने अपने राजनीति उत्थान के लिए जनता दल छोड़ कर समता पार्टी बना ली।

नीतीश करें तो ठीक, चिराग करें तो गलत कैसे ?

नीतीश करें तो ठीक, चिराग करें तो गलत कैसे ?

लालू यादव की छत्रछाया से मुक्त होने के लिए नीतीश कुमार ने अगर अलग राह चुनी तो वह ठीक है ? अगर यही काम चिराग पासवान कर रहे हैं तो गलत कैसे है ? वे भी तो भविष्य की राजनीति कर रहे थे। 1995 में नीतीश कुमार की समता पार्टी ने 310 सीटों पर चुनाव लड़ कर केवल सात सीटें जीती थीं। तो क्या उस समय समता पार्टी ने वोट काटने के लिए चुनाव लड़ा था ? नीतीश कुमार का सात सीटों से शुरू हुआ सफर आखिरकार अपनी मंजिल पर पहुंचा। लेकिन चिराग पासवान के नजरिये को गलत बताने की पुरजोर कोशिश हो रही है। अलग चुनाव लड़ने के फैसले को लेकर उनहें बलि का बकरा बना दिया गया। लेकिन सवाल ये है कि क्या पशुपति कुमार पारस चिराग पासवान को दरकिनार कर लोजपा की राजनीति कर पाएंगे ? रामविलास पासवान के समर्थकों की अदालत में वे कैसे इसे सही साबित कर करेंगे ?

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