Bihar Election: बिहार में दलित वोटर्स का मूड बदला-बदला सा! चुनाव में किसका देंगे साथ? सर्वे में खुली बड़ी बात
Bihar Election 2025 (survey): बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एक सर्वे में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। दलित और आदिवासी संगठनों के राष्ट्रीय महासंघ (NACDAOR) द्वारा कराए गए इस सर्वे से पता चला है कि बिहार के 58% से ज्यादा दलित मतदाता बेरोजगारी को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा मानते हैं। साथ ही, 27.4% दलित मतदाताओं ने साफ तौर पर कहा कि उन्हें भारत के चुनाव आयोग (ECI) पर भरोसा नहीं है।
यह सर्वे 10 जून से 4 जुलाई के बीच किया गया और इसमें बिहार के अलग हिस्सों से 18,581 अनुसूचित जाति (SC) मतदाताओं की राय ली गई। NACDAOR ने यह सर्वे द कंवर्जेंट मीडिया नाम की राजनीतिक परामर्श संस्था के सहयोग से कराया है। सर्वे को छह बड़े क्षेत्र-कोसी, मिथिलांचल, सीमांचल, भोजपुर, चंपारण और मगध-पाटलिपुत्र-के 49 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया है।

🔴 सर्वे: बिहार चुनाव में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा
सर्वे के मुताबिक 58% से अधिक दलित मतदाताओं ने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बेरोजगारी है। इससे साफ है कि राज्य में रोजगार की कमी से दलित समुदाय सबसे ज्यादा परेशान है।
🔴 क्या वोटर लिस्ट से नाम गायब हो सकता है?
जब मतदाताओं से पूछा गया कि क्या उन्हें डर है कि उनका नाम नई वोटर लिस्ट से हट सकता है, तो 71% लोगों ने कहा 'हां'। ये डर इसलिए भी बढ़ा क्योंकि चुनाव आयोग ने इसी दौरान बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया शुरू की थी।
🔴 चुनाव आयोग पर भरोसा कम
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा है, तो
- 27.4% ने कहा नहीं
- 51% ने कहा हां
- और 21% ने कहा पता नहीं
🔴 पसंदीदा नेता कौन?
राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं की लोकप्रियता के सवाल पर
- 47.5% ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंदीदा नेता बताया
- 40.3% ने राहुल गांधी को चुना
- बाकी लोगों ने अन्य नेताओं का नाम लिया
🔴 जाति जनगणना का श्रेय किसे?
इस सवाल पर भी राय बंटी नजर आई
- 33.15% लोगों ने श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी को दिया
- 30.81% ने राहुल गांधी को
- 27.57% ने तेजस्वी यादव को
🔴 नीतीश सरकार के कामकाज पर मत
- 48% ने कहा सरकार का कामकाज खराब है
- 45% ने कहा काम अच्छा है
🔴 दलितों की राय, दलितों की जुबानी
NACDAOR के चेयरमैन अशोक भारती ने बताया कि यह सर्वे खास इसलिए है क्योंकि इसे "दलितों के लिए, दलितों द्वारा" किया गया है। उन्होंने कहा, "लोग हमारे सर्वे पर ज्यादा भरोसा करते हैं, क्योंकि हम जमीन पर जाकर बात करते हैं, सिर्फ आंकड़ों से काम नहीं चलाते।
यह सर्वे इस बात की झलक देता है कि बिहार के दलित समुदाय में बेरोजगारी को लेकर गहरी चिंता है और संस्थागत भरोसे में भी कमी आई है। चुनावी रणनीतिकारों और राजनीतिक दलों के लिए यह सर्वे एक मजबूत संकेत है कि उन्हें किन मुद्दों को गंभीरता से लेना होगा।
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