Bihar election result: क्या महिला वोटरों ने नीतीश से मुंह मोड़ा, इसलिए 28 सीटों पर हार गई JDU?

पटना- बिहार के चुनाव नतीजे बताते हैं कि चिराग पासवान ने नीतीश कुमार को बीजेपी का छोटा भाई बना देने में बहुत ही बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, जमीनी हालात बताते हैं कि अकेले चिराग ने ही जदयू की जीत में पलीता नहीं लगाया है, पिछले चुनाव की तरह महिलाएं पुरुषों से 5 फीसदी ज्यादा वोट डालने तो जरूर निकली हैं, लेकिन इस बार उन्होंने सुशान बाबू के पक्ष में उस तरह का योगदान शायद नहीं दिया है। जबकि, नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि शराब बंदी की वजह से उनकी 'साइलेंट' वोटर इस बार फिर कमाल कर दिखाएंगी। इस चुनाव में एनडीए की सत्ता में वापसी के बावजूद जेडीयू की सीटें 71 से घटकर 43 रह गई हैं।

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    2015 के चुनाव में 1962 के बाद महिलाओं ने बिहार में पहली बार रिकॉर्ड 60.4 फीसदी वोटिंग की थी। जबकि, तब सिर्फ 53.32 पुरुषों ने ही वोट डाले थे। एक्सपर्ट्स ने माना की महिलाओं की सात फीसदी ज्यादा वोटिंग नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के लिए हुई है। इसका कारण ये था कि नीतीश ने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना के तहत 40 लाख लड़कियों को स्कूल जाने के लिए मुफ्त में साइकिल देकर और स्कूली छात्राओं को अप्रैल 2014 में सैनिटरी नैपकिन बांटकर पुरुष प्रधान 'बिहारी समाज' में अपना एक 'साइलेंट वोट बैंक' के तैयार कर लिया था।

    महिलाओं में अपना जनाधार और मजबूत करने के लिए उन्होंने राजद के साथ सरकार चलाते हुए 1 अप्रैल, 2016 को बिहार में पूर्ण शराब बंदी की घोषणा कर दी। तब उनका तर्क था कि उन्होंने बिहार की महिलाओं से वादा किया है कि शराब की वजह से उनके घरों में होने वाली मुश्किलों से वह उन्हें मुक्त कराएंगे। इसके तहत शुरू में पहली बार इस कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए पांच साल की सजा का प्रावधान किया गया। बाद में इस सख्त सजा को कम करते हुए पहली बार के दोषी के लिए जुर्माने का प्रावधान किया। लेकिन, लगता है कि महिलाओं को हमेशा के लिए अपना वोट बैंक बनाने के लिए उन्होंने जिस फैसले से सिर्फ उस साल करीब 4,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाया, इस चुनाव में वही उनके खिलाफ चला गया है।

    मसलन, मुजफ्फरपुर की एक महिला वोटर ने कहा था, 'राज्य में गैरकानूनी तरीके से अभी शराब बेची जाती है। जो इसकी बिक्री कर रहे हैं और अमीर होते जा रहे हैं और जो इसे पीते हैं वह बर्बाद हो रहे हैं। लगभग हर घर में शराब का इस्तेमाल हो रहा है। परिवार तबाह होते जा रहे हैं। इसमें पुलिस भी शामिल है। वह सीमा से शराब आने देती है। मेरा बेटा शराब पीता है और जितना भी कमाता है सब उसपर बर्बाद कर देता है। शराब पर कोई पाबंदी नहीं है।' इस बदले नजरिए का नतीजा ये हुआ है कि 2015 में जिन महिला वोटरों ने परिवार के पुरुषों की अनिच्छा के बावजूद चुप्पा वोटर (साइलेंट वोटर) बनकर तीर का बटन दबाया था, इस बार फिर से परिवार के प्रभावी पुरुष सदस्यों के फैसले के मुताबिक शायद मतदान करने को मजबूर हुईं। उस महिला ने कहा था, 'मैं उसको वोट दूंगी जिसको मेरा बेटा देने को कहेगा। मेरे परिवार के पास 40 वोट हैं और हम सब एक ही पार्टी को वोट करेंगे।'

    इस बार बिहार के युवाओं के एक वर्ग में जातिवाद से ऊपर उठकर तेजस्वी यादव में उम्मीद दिख रही थी। क्योंकि, उन्होंने सबसे वादा किया था कि सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट मीटिंग में ही 10 लाख सरकारी नौकरी का आदेश पास होने वाला है। अपने बच्चों की सोच का असर शायद महिलाओं पर भी रहा। क्योंकि, शराब बंदी के बावजूद ना तो घरेलू हिंसा में उन्होंने कोई कमी महसूस की और ना ही उनकी गरीबी में बदलाव ही हुआ। एक महिला ने कहा था, 'जरूरी सामानों और सब्जियों के दाम बढ़ रहे हैं। मेरा पति और बेटा मुश्किल से 300 रुपया कमाता है और वह सब शराब पर उड़ा देते हैं। इस सब की वजह से मैं रोती रहती हूं और हम पर कर्ज बढ़ता ही जा रहा है। पिछली बार मैंने नीतीश कुमार को वोट दिया था, यह सोचकर कि वह कुछ करेंगे। लेकिन, हमारी जिंदगी तो खराब हो गई है।'

    बिहार पुलिस और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से भारतीय शराब कंपनियां राज्य सरकार को खत लिखकर कह चुकी हैं कि शराब बंदी से वहां अपराध नहीं रुके हैं। बल्कि, इसके चलते गैर-कानूनी शराब की बिक्री बढ़ गई है और शराब माफिया इससे 400 गुना मुनाफा कमा रहे हैं। यही नहीं, इसके चलते राज्य में नकली शराब की खपत बढ़ने और ड्रग के केस में इजाफे की भी रिपोर्ट हैं। ऊपर से मुजफ्फरपुर शेल्टर होम की घटना और सुपौल गैंगरेप जैसी वारदातों ने महिलाओं के एक वर्ग का मोहभंग किया है।

    मसलन, महिलाओं को जीवन के बेहतर मौके उपलब्ध कराने के लिए चल रहे जीविका केंद्र की एक लाभार्थी ने कहा था, 'लॉकडाउन के दौरान हमारे परिवार को बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पुरुष शहरों में फंस गए थे और उनका वापस आना मुश्किल था। जब किसी तरह से लौटे तो उनके लिए यहां कोई काम नहीं था। शराब बंदी की मुख्यमंत्री की योजना भी सिर्फ कागज पर है।' मतलब, 2015 में महिलाओं का वोट शेयर अगर यह बताता है कि वो नीतीश कुमार के पक्ष में जातीयों के बंधन को मिटाकर जेंडर के आधार पर एकजुट हुई थीं तो 2020 के वोट शेयर से लगता है कि जाति से ऊपर वाली वह एकजुटता खत्म हुई है और महिलाएं फिर से पुरुष प्रधान परिवार के फैसले के मुताबिक वोट डालकर आई हैं।

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