Bihar Election 2025: तीन बार मिली सत्ता, लेकिन हर बार था छोटा कार्यकाल, जानें बिहार के पहले दलित सीएम की कहानी
Bihar First First Dalit CM: बिहार राजनीति का चुनावी इतिहास हमेशा से ही बेहद दिलचस्प रहा है। यहां चुनावी माहौल कब किधर बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता और ऐसा ही कुछ देखने को मिला था साल 1967 से 1969 के बीच। जब मात्र 28 महीनों में सात मुख्यमंत्री बदल गए, और लगभग हर सीएम का कार्यकाल महज चार महीने तक का ही रहा।
इसी दौर में मिला था बिहार को उसका पहला दलित CM, भोला पासवान शास्त्री जो तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन एक साल से भी कम समय तक इस पद पर बनें रहे। हालांकि इस दौरान उन्हें राजनीति का वो दौर देखने को मिला जो इतिहास बन गया। आइए जानते हैं कैसा रहा था उनका सियासी सफर....

कुछ ऐसा रहा प्रारंभिक जीवन
भोला पासवान शास्त्री का जन्म ब्रिटिश भारत में बिहार और ओडिशा प्रांत के बैरगाची गांव में हुआ। उनके पिता दरभंगा के शाही परिवार में कार्यरत थे।
पढ़ाई-लिखाई में रुचि रखने वाले भोला पासवान ने छात्र राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले बनारस के काशी विद्यापीठ से संस्कृत में बीए की डिग्री हासिल की। इस वजह से उनके नाम के आगे 'शास्त्री' जुड़ गया। 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल जाने के बावजूद उनकी राजनीतिक समझ ने उन्हें बिहार के कई नेताओं के नज़दीक ला दिया।
कांग्रेस की आंतरिक कलह और सत्ता की ओर पहला कदम
1947 में स्वतंत्रता के बाद श्रीकृष्ण सिन्हा के नेतृत्व वाली सरकार में शास्त्री संसदीय कार्य मंत्री बने। 1952 से लगातार उन्होंने चुनाव जीतते हुए विभिन्न मंत्रिमंडलों में स्थान बनाया। 1967 में पूर्णिया की कोढ़ा सीट से जीतने के बाद वे विपक्ष के नेता बने। हालांकि उन्हें सक्रिय राजनीति का मौका मिला 1968 में। जब बिहार में बीपी मंडल सरकार गिरी और उसके बाद कांग्रेस के भीतर फूट पड़ा।
बीपी मंडल की सरकार विधानसभा में विश्वास मत साबित नहीं कर पाई और इस्तीफा दे दिया। इस अवसर पर भोला पासवान शास्त्री को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव बिनोदानंद झा के बागी गुट ने रखा। 22 मार्च 1968 को शास्त्री पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार केवल 95 दिन तक चली। उनके मंत्रियों की इस्तीफों की धमकियों और रामगढ़ के राजा की अस्वीकार्य मांगों के कारण उन्होंने स्वयं इस्तीफा दे दिया और राज्यपाल से राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की।
दूसरी बार संभाली सत्ता की कमान
फरवरी 1969 के मध्यावधि चुनाव के बाद शास्त्री को पुनः मुख्यमंत्री बनाया गया। इस बार उनका कार्यकाल महज 12 दिन का रहा। जनसंघ और गठबंधन के अन्य दलों के समर्थन वापस लेने के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
उसके बाद 1971 में कांग्रेस (आर) और अन्य दलों के समर्थन से शास्त्री तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार उनका कार्यकाल 198 दिन रहा। कांग्रेस (आर) के नेताओं के विरोध और दल-बदल की राजनीति के चलते उन्होंने 27 दिसंबर 1971 को इस्तीफा दे दिया। इस दौरान उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी सलाह लेने के लिए बुलाया गया।
राजनीति में ऐतिहासिक विरासत
भोला पासवान शास्त्री बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री थे और उन्होंने दलित नेतृत्व को नए आयाम दिए। तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे कभी लंबे समय तक सत्ता में टिक नहीं पाए, लेकिन उनकी राजनीति ने दल-बदल और गठबंधन की राजनीति के जटिल पक्ष को दर्शाया।
1972 से 1982 तक वे राज्यसभा के सांसद और नेता प्रतिपक्ष भी रहे। भोला पासवान शास्त्री की कहानी बिहार की राजनीति के उतार-चढ़ाव और दलित नेतृत्व के संघर्ष का प्रतीक मानी जाती है। उनके नेतृत्व और संघर्ष ने राज्य की राजनीतिक दिशा को हमेशा प्रभावित किया।
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