Bihar Election 2025 Phase 2: जिसका सीमांचल उसका बिहार! दूसरे चरण में 122 सीटों पर सीधी टक्कर, समझिए पूरा गणित?
Bihar Election 2025 Phase 2 Voting: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान से पहले प्रचार अभियान का शोर अब थम गया है। अब सभी की निगाहें 11 नवंबर को होने वाले मतदान पर टिकी हैं। इस चरण में राज्य के 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे। इनमें पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर, बांका, जमुई, नवादा, गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, अरवल, कैमूर और रोहतास जैसे अहम जिले शामिल हैं।
इस चरण को बिहार की सत्ता की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है, क्योंकि सीमांचल और दक्षिण बिहार के कई राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाके इसी चरण में मतदान के दायरे में हैं। खासकर सीमांचल और महिला मतदाताओं के पास इस बार "किंगमेकर" बनने का मौका है।

सीमांचल में सियासी मुकाबला सबसे दिलचस्प
बिहार चुनाव का दूसरा चरण सीमांचल और दक्षिण बिहार के कई अहम जिलों को कवर करता है। 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने इस क्षेत्र की 67 सीटें जीती थीं, जबकि महागठबंधन के खाते में 50 सीटें गई थीं। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) ने सीमांचल में 5 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया था।
इस बार भी सीमांचल की सभी 24 सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प बना हुआ है। मुस्लिम बहुल इलाकों में बनने वाले नए समीकरणों ने राजनीतिक दलों की रणनीतियों को और पेचीदा बना दिया है। एआईएमआईएम इस बार भी पूरी ताकत के साथ मैदान में है और उसने 15 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।
सीमांचल का राजनीतिक महत्व
सीमांचल का इलाका - किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार - बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। माइनॉरिटी कमीशन के आंकड़ों के मुताबिक, किशनगंज में मुस्लिम आबादी 67%, कटिहार में 42%, अररिया में 41% और पूर्णिया में 37% है। यही कारण है कि इन जिलों में किसी भी दल की रणनीति बिना मुस्लिम वोटरों के अधूरी मानी जाती है।
यही कारण है कि ओवैसी की पार्टी सीमांचल की 15 सीटों पर चुनाव लड़ रही है - जिनमें किशनगंज और पूर्णिया की चार-चार, कटिहार की पांच और अररिया की दो सीटें शामिल हैं। पार्टी मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ओवैसी के प्रचार में यह बात बार-बार कही जा रही है कि "राजद और कांग्रेस ने मुसलमानों को केवल वोट बैंक समझा, लेकिन कभी नेतृत्व का मौका नहीं दिया।"
AIMIM के नेता यह सवाल उठा रहे हैं कि जब "दो प्रतिशत आबादी वाला समुदाय" उपमुख्यमंत्री बन सकता है, तो 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी में से कोई मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता?
2020 में AIMIM का प्रदर्शन और 2025 की नई चुनौती
2020 में एआईएमआईएम ने सीमांचल की राजनीति में अप्रत्याशित प्रभाव दिखाया था। पार्टी ने अमौर, बहादुरगंज, बायसी, जोकीहाट और कोचाधामन जैसी सीटों पर जीत दर्ज कर महागठबंधन के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई थी। लेकिन 2025 में हालात अलग हैं।
Oneindia Hindi की एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, सीमांचल के पढ़े-लिखे मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के साथ नजर आ रहे हैं। क्योंकि ओवैसी फिलहाल तो किसी भी तरह से बिहार में सरकार बनाने के लिए फीट नहीं दिख रहे हैं ऐसे में इन वोटर्स का कहना है कि सत्ता NDA के हांथ में जाए इससे अच्छा है कि उनका वोट राजेडी के लिए हो। वहीं इस बार ओवैसी को नई चुनौती मिल रही है प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी से, जो सीमांचल में "विकास, शिक्षा और सुशासन" के मुद्दों पर जोर दे रही है।
जनसुराज बनाम AIMIM: किसका होगा पलड़ा भारी?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सीमांचल में जनसुराज और AIMIM दोनों ही महागठबंधन के वोट बैंक को कमजोर करने का काम कर रहे हैं। जहां ओवैसी धार्मिक पहचान के आधार पर मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं प्रशांत किशोर युवाओं, किसानों और ग्रामीण इलाकों में वैकल्पिक राजनीति का संदेश फैला रहे हैं।
प्रशांत किशोर का "गांव-गांव जनसंवाद" अभियान सीमांचल के छोटे कस्बों और गांवों में लोकप्रिय हो रहा है। वहीं, AIMIM अपनी पारंपरिक वोटर बेस को बनाए रखने के लिए धार्मिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व की बात को केंद्र में रखे हुए है।
महिला और युवा वोटरों की भूमिका निर्णायक
इस बार महिला मतदाताओं और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं की संख्या भी काफी ज्यादा है। माना जा रहा है कि ये वर्ग किसी भी दल के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। महिला वोटरों की बड़ी संख्या एनडीए के लिए राहत बन सकती है, जबकि युवा वर्ग रोजगार और शिक्षा के मुद्दों पर जनसुराज या महागठबंधन की ओर झुक सकता है।
बिहार चुनाव 2025 का दूसरा चरण न सिर्फ सीमांचल की राजनीतिक दिशा तय करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि एआईएमआईएम और जनसुराज जैसी नई ताकतें राज्य की पारंपरिक राजनीति को कितना प्रभावित कर पाती हैं। 11 नवंबर को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि सत्ता की कुंजी सीमांचल के वोटरों के हाथ में रहती है या एक बार फिर पारंपरिक दलों के पास लौट जाती है।
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