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Bihar का नया पॉलिटिकल समीकरण! अगर महागठबंधन के साथ आती है AIMIM, तो सीमांचल में RJD को कितना फायदा

Bihar election 2025: बिहार की राजनीति हमेशा से देश के लिए 'सेंटर ऑफ अट्रैक्शन' रही है, जहां चुनावी समीकरण कब करवट बदल लें, कहना मुश्किल होता है। जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव 2025 नजदीक आ रहे हैं, सियासी माहौल गर्माने लगा है और गठबंधनों की रणनीतियों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है।

इस बार फिर राज्य की राजनीति एक नए मोड़ पर आ खड़ी हुई है। खासकर सीमांचल क्षेत्र को लेकर महागठबंधन के सामने एक बड़ी राजनीतिक चुनौती उभरती दिख रही है। इस बीच, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने राजेडी सुप्रीमो लालू यादव को एक चिट्ठी लिखी है।

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इसमें उन्होंने कहा है कि वह महागठबंधन (INDIA Bloc) के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते है। ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि क्या AIMIM की यह साझेदारी RJD के लिए चुनावी फायदे का सौदा साबित होगी या फिर यह कदम बनेगा राजनीतिक जोखिम का कारण? सीमांचल की सियासत और मुस्लिम वोट बैंक की अहमियत को देखते हुए यह फैसला आने वाले चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

सीमांचल में मुस्लिमों 'वोटों की पिच' पर दांव तेज

बिहार की सीमांचल पट्टी - खासतौर पर किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया - में मुस्लिम आबादी 40% से ज्यादा है। यह इलाका हमेशा से मुस्लिम मतदाताओं के रुझान का केंद्र रहा है, और यही कारण है कि यहां के वोटों पर राजद, कांग्रेस, JDU और AIMIM की नजर बनी रहती है।

2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल में चौंकाने वाला प्रदर्शन किया था। पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और 5 सीटों पर जीत दर्ज की। ये सीटें थीं: अमौर, बहादुरगंज, बायसी, जोकीहाट और कोचाधामन। AIMIM को कुल 5,23,279 वोट मिले, जो कि 1.30% वोट शेयर था। हालांकि, बाद में इनमें से चार विधायक टूटकर राजद में शामिल हो गए, लेकिन AIMIM की जमीनी पकड़ को नकारा नहीं जा सकता।

महागठबंधन के लिए दोधारी तलवार बनी Owaisi की पेशकश

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने बार-बार संकेत दिए हैं कि वे महागठबंधन का हिस्सा बनना चाहते हैं। उनका तर्क है कि "सेक्युलर वोटों का बंटवारा BJP को फायदा पहुंचाता है"। उन्होंने यह भी कहा कि अगर गठबंधन में शामिल नहीं किया गया तो पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी और कम से कम 100 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।

हाल ही में ओवैसी ने कहा कि "हम नहीं चाहते कि बिहार में BJP या NDA की सरकार फिर से बने। अब फैसला महागठबंधन के नेताओं के हाथ में है।" इस बयान से साफ है कि AIMIM ने गेंद अब INDIA गठबंधन के पाले में डाल दी है।

यहां समझने वाली बात ये है कि ओवैसी की ये गुगली राजद और कांग्रेस के सामने बेहद दुविधाजनक स्थिति खड़ी करेगी। यदि AIMIM को महा गठबंधन में शामिल किया जाता है, तो सीमांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों पर पकड़ मजबूत हो सकती है और मुस्लिम वोटों के बंटवारे से बचा जा सकता है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से NDA को होने वाला फायदा रोका जा सकता है।

हालांकि, AIMIM की छवि को लेकर 'कट्टरपंथी' टैग का खतरा भी बना रहेगा, जो गठबंधन के अन्य वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, सीटों के बंटवारे को लेकर महागठबंधन के भीतर खींचतान और असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका असर चुनावी प्रदर्शन पर भी दिख सकता है।

वहीं, अगर AIMIM को गठबंधन से बाहर रखा जाता है, तो सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम वोटों का बंटवारा होना तय है। AIMIM इन वोटों में सेंध लगा सकती है, जिससे इसका सीधा फायदा NDA को मिल सकता है। हालांकि, AIMIM को दूर रखने से महागठबंधन अपनी उदार और धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रख सकता है और 'कट्टरपंथी ताकतों से गठजोड़' के आरोपों से बच सकता है।

हालांकि, RJD के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि "इस बार भी कोई सेक्युलर वोट कहीं और नहीं जाएगा... बिहार की जनता इस बार पूरी तरह तैयार है, और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनाएगी। बिहार चुनाव के नतीजों के बाद केंद्र सरकार की उलटी गिनती शुरू हो जाएगी।" इतना ही नहीं उन्होंने ओवैसी पर आरोप लगाते हुए कहा कि AIMIM का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने हमेशा बीजेपी की बी-टीम की तरह काम किया है और बीजेपी को फायदा पहुंचाने का ही काम किया है। लेकिन इस बार कोई उनके बहकावे में नहीं आने वाला है।"

क्या AIMIM सिर्फ सीमांचल तक सीमित है?

2024 के लोकसभा चुनाव में AIMIM ने 8 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 3,82,660 वोट हासिल किए। वोट शेयर गिरकर 0.9% रह गया। हालांकि जीत दर्ज नहीं हो सकी, लेकिन ओवैसी ने साफ कर दिया है कि पार्टी अब सीमांचल से आगे पूरे बिहार में विस्तार करना चाहती है।

किशनगंज दौरे पर ओवैसी ने कहा था कि "हम 100 सीटों पर लड़ेंगे और 24 सीटें जीतने का लक्ष्य है।" यह बयान सीधे तौर पर तेजस्वी यादव और राजद को एक चेतावनी भी माना गया। AIMIM के विधायक अख्तरुल ईमान ने लालू प्रसाद यादव को पत्र लिखकर कहा कि "सेक्युलर वोटों को बंटने से बचाने के लिए AIMIM को महागठबंधन में शामिल करना जरूरी है।" यह पत्र एक राजनीतिक अपील है और रणनीतिक दवाब भी। अब देखना यह होगा कि लालू यादव और तेजस्वी यादव AIMIM को गठबंधन में लेकर सीमांचल को साधने की कोशिश करते हैं या फिर अपनी सॉफ्ट सेक्युलर इमेज बनाए रखने के लिए ओवैसी से दूरी बनाए रखते हैं।

सीमांचल की चाभी से खुलेगा बिहार की जीत का ताला?

बिहार में मुस्लिम वोटर हमेशा से 'किंगमेकर' रहे हैं और सीमांचल इस वोट बैंक का गढ़ है। AIMIM की मौजूदगी वहां किसी भी गठबंधन का खेल बना और बिगाड़ सकती है। अगर महागठबंधन AIMIM को साथ लेता है तो यह एक सियासी मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है, लेकिन अगर सीटों को लेकर आपसी मनमुटाव हुआ, तो यह 2020 की पुनरावृत्ति भी बन सकता है।

अब 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है -क्या सीमांचल को साधने के लिए ओवैसी को गले लगाएंगे या फिर राजनीति में 'सेक्युलर दूरी' बनाए रखेंगे? उत्तर जितना भी राजनीतिक हो, इसका परिणाम सीधे तौर पर सत्ता को प्रभावित करेगा।

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