Bihar News: ट्रैक्टर के बाद, ब्लूटूथ..,बिहार में निवास प्रमाण पत्र पर मज़ाक क्यों बनती जा रही सरकारी प्रक्रिया
Bihar News: बिहार में सरकारी प्रमाण पत्र प्रणाली की साख एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पटना के बाढ़ अनुमंडल से आया नया मामला ना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल गवर्नेंस के नाम पर चल रहे प्रयासों की जमीनी हकीकत क्या है। इस बार एक ब्लूटूथ डिवाइस - जिसे कान में लगाया जाने वाला एयरपॉड कहा जा सकता है - का निवास प्रमाण पत्र बना दिया गया है।
मामला क्या है?
बाढ़ अनुमंडल के अधिकारियों द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र में "ब्लूटूथ (नॉइज)" को व्यक्ति के रूप में मान्यता दी गई है, जिसके पिता "ईस्टवुड ब्लूटूथ" और माता "ईस्टवुड" बताई गई है। पता भी बाकायदा दर्ज है, गांव: अगवनपुर, वार्ड संख्या-16, थाना: बाढ़, जिला: पटना।

यह प्रमाण पत्र 12 जुलाई को सरकारी पोर्टल पर अपलोड हुआ। मामला सामने आते ही इसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, और एक बार फिर बिहार के प्रशासन की कार्यशैली पर लोग व्यंग्य कसने लगे।
पहले भी हुए हैं ऐसे मामले:
यह कोई पहली घटना नहीं है। मधेपुरा में एक महिला के मतदाता पहचान पत्र पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर छप गई थी। मुंगेर में एक ट्रैक्टर के नाम पर निवास प्रमाण पत्र जारी किया गया था। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति बताती है कि यह कोई इक्का-दुक्का गलती नहीं, बल्कि व्यवस्थागत खामी है।
उठ रहे कई सवाल:
डेटा एंट्री पर कौन नजर रख रहा है? अगर किसी भी व्यक्ति को "ब्लूटूथ" का नाम भर देने पर सिस्टम मान्यता दे दे रहा है, तो क्या नाम, जाति, पते की वैधता की कोई जांच नहीं होती? ऑनलाइन प्रक्रिया में कोई फिल्टर क्यों नहीं है?, डिजिटल इंडिया के तहत प्रमाण पत्र प्रक्रिया को ऑनलाइन किया गया है, लेकिन क्या फॉर्म वेरिफिकेशन और ऑटोमैटिक रिव्यू सिस्टम जैसी बुनियादी चीजें नहीं लगाई गईं?
क्या कर्मचारियों की ट्रेनिंग पर्याप्त है?
सरकारी बाबुओं की लापरवाही और 'बस काम निपटाओ' मानसिकता से आम जनता के जरूरी काम मज़ाक बनते जा रहे हैं। जब ब्लूटूथ, ट्रैक्टर और मुख्यमंत्री की तस्वीर जैसे मामले सामने आते हैं, तो असली दस्तावेजों की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आ जाती है।
जनता क्या कह रही है?
सोशल मीडिया पर आम लोगों ने इसे "सरकारी मज़ाक", "डिजिटल भ्रष्टाचार" और "प्रशासनिक तमाशा" करार दिया है। कई लोगों ने सीएम नीतीश कुमार से इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। वहीं लोग तीन जरूरी सुधार की मांग कर रहे हैं।
AI आधारित वेरिफिकेशन सिस्टम: गलत डेटा एंट्री रोकने के लिए टेक्नोलॉजी का जिम्मेदार उपयोग होना चाहिए।
स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय हो: जिस कर्मचारी की लापरवाही से प्रमाण पत्र बना, उस पर सीधी कार्रवाई हो।
जनता को रियल-टाइम ट्रैकिंग की सुविधा: ताकि नागरिक यह देख सकें कि उनका प्रमाण पत्र कौन बना रहा है और उसमें क्या डिटेल्स डाली जा रही हैं।
सरकारी कार्यशैली पर सवाल
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ सरकारी प्रमाण पत्र नौकरी, स्कॉलरशिप, राशन कार्ड और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा होता है। वहां इस तरह की लापरवाहियां सिर्फ मज़ाक नहीं, सामाजिक और प्रशासनिक लचर व्यवस्था की पोल खोल रही है। सरकार को यह तय करना होगा कि वह डिजिटल सिस्टम के नाम पर सिर्फ फॉर्म भरवाने की प्रक्रिया चलाना चाहती है या असल में पारदर्शी और भरोसेमंद प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना चाहती है।












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