Bihar Chunav: चुनाव से पहले ही महागठबंधन में संग्राम, Tejashwi Yadav को भारी पड़ सकती हैं ये 3 कमियां
Bihar Chunav: बिहार में पहले फेज की वोटिंग 6 नवंबर को होने वाली है और उसके लिए नामांकन भी खत्म हो चुका है। हालांकि, अब तक औपचारिक तौर पर महागठबंधन में सीट शेयरिंग का ऐलान नहीं हुआ है। टिकट बंटवारे को लेकर सिर फुटव्वल साफ नजर आ रहा है। कुछ जगहों पर तो घटक दलों ने एक-दूसरे के खिलाफ ही उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन में चल रही तकरार का खामियाजा खास तौर पर आरजेडी और तेजस्वी यादव को भुगतना पड़ सकता है।
तेजस्वी यादव खुले तौर पर खुद को होने वाला सीएम बता रहे हैं और आरजेडी ही अलायंस में सीनियर पार्टनर है। जिस तरह की स्थिति बिहार में इस वक्त है उसमें एनडीए एकजुट और मजबूती से साथ खड़ी दिख रही है। महागठबंधन में चल रही तकरार का असर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं तक भी दिख रहा है।

Bihar Chunav में तेजस्वी यादव को भारी पड़ सकती हैं ये 3 चीजें
⦁ सीट बंटवारे का औपचारिक ऐलान नहीं होने का नतीजा यह है कि खुद आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के कार्यकर्ताओं में ही विश्वास की स्थिति बहाल होती नहीं दिख रही है। टिकट बंटवारे पर खुलकर असंतोष जाहिर किया जा रहा है और एक भ्रम की स्थिति नजर आ रही है।
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⦁ इसका असर मतदाताओं के मन पर भी पड़ सकता है, क्योंकि एनडीए में एक स्पष्ट नेतृत्व, उम्मीदवार और प्रचार रणनीति झलक रही है। दूसरी ओर महागठबंधन के घटक दलों में रुठने-मनाने का दौर ही जारी है। पार्टी के कार्यकर्ता भी मान रहे हैं कि इसका असर समर्थकों के मनोबल पर भी असर पड़ रहा है।
⦁ चुनाव पूर्व की इस तकरार का असर बूथ लेवल कार्यकर्ताओं पर सबसे ज्यादा पड़ता है। बीजेपी की ताकत इसका माइक्रो मैनेजमेंट है। बूथ लेवल पर किए प्रबंधन के दम पर बीजेपी ने हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बनाई है। कमजोर बूथ मैनेजमेंट का असर कांटे के मुकाबले को बड़े स्तर पर प्रभावित कर सकता है।
Tejashwi Yadav के लिए चुनाव में पहले ही कई चुनौतियां
तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव पहले ही आसान नहीं है। कांग्रेस ने उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और इससे आरजेडी के कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। दूसरी जगह वीआईपी चीफ मुकेश सहनी पल-पल बयान बदल रहे हैं और चुनाव नतीजों के बाद वह किस तरफ होंगे, इसका कोई आश्वासन नहीं दिया जा सकता है। इस अविश्वास का एक असर चुनाव के दिन वोट ट्रांसफर नहीं हो पाने के तौर पर भी हो सकता है।
इस बार जनसुराज भी मैदान में है और सीमांचल में मुस्लिम असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी आरजेडी के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाएगी। ऐसे हालात में तेजस्वी के लिए चुनाव में जीत दर्ज कर बहुमत का जादुई आंकड़ा छूना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।
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